भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 756
७४६* मत्स्यपुराण *

| निर्मांसरुधिरत्वक् च कुन्दशङ्खेन्दुसप्रभः।<br>अस्थिशेषोऽभवच्छर्वं देवं वै चिन्तयन्नपि॥ १९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे देवी व्यज्ञापयत शङ्करम्॥ २० | इस प्रकार वह मांस, रुधिर और चमड़ेसे रहित हो अस्थिमात्र अवशेष रह गया, जो कुन्द, शङ्ख और चन्द्रमाके समान चमक रहा था। इतनेपर भी वह भगवान् शंकरका ध्यान कर ही रहा था। इसी बीच पार्वती देवीने भगवान् शंकरसे निवेदन किया॥ १४—२०॥ | | देव्युवाच<br>उद्यानं पुनरेवेदं द्रष्टुमिच्छामि सर्वदा।<br>क्षेत्रस्य देव माहात्म्यं श्रोतुं कौतूहलं हि मे।<br>यतश्च प्रियमेतत् ते तथास्य फलमुत्तमम्॥ २१<br>इति विज्ञापितो देवः शर्वाण्या परमेश्वरः।<br>सर्वं पृष्टं ते यथातथ्यमाख्यातुमुपचक्रमे॥ २२<br>निर्जगाम च देवेशः पार्वत्या सह शङ्करः।<br>उद्यानं दर्शयामास देव्या देवः पिनाकधृक्॥ २३ | देवीने कहा— देव! मैं इस उद्यानको पुनः देखना चाहती हूँ। साथ ही इस क्षेत्रका माहात्म्य सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि यह आपको परम प्रिय है और इसके श्रवणका फल भी उत्तम है। इस प्रकार भवानीद्वारा निवेदन किये जानेपर परमेश्वर शंकर प्रश्नानुसार सारा प्रसंग यथार्थरूपसे कहनेके लिये उद्यत हुए। तदनन्तर पिनाकधारी देवेश्वर भगवान् शंकर पार्वतीके साथ वहाँसे चल पड़े और देवीको उस उद्यानका दर्शन कराते हुए बोले॥ २१—२३॥ | | देवदेव उवाच<br>प्रोत्फुल्लनानाविधगुल्मशोभितं<br>लताप्रतानावनतं मनोहरम्।<br>विरूढपुष्पैः परितः प्रियङ्गुभिः<br>सुपुष्पितैः कण्टकितैश्च केतकैः॥ २४<br>तमालगुल्मैर्निचितं सुगन्धिभिः<br>सकर्णिकारैर्बकुलैश्च सर्वशः।<br>अशोकपुन्नागवरैः सुपुष्पितै-<br>र्द्विरेफमालाकुलपुष्पसञ्चयैः ॥ २५<br>क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणूरूषितै-<br>र्विहङ्गमैश्चारुकलप्रणादिभिः ।<br>विनादितं सारसमण्डनादिभिः<br>प्रमत्तदात्यूहरुतैश्च वल्गुभिः॥ २६<br>क्वचिच्च चक्राह्वरवोपनादितं<br>क्वचिच्च कादम्बकदम्बकैर्युतम्।<br>क्वचिच्च कारण्डवनादनादितं<br>क्वचिच्च मत्तालिकुलाकुलीकृतम्॥ २७<br>मदाकुलाभिस्त्वमराङ्गनाभि-<br>र्निषेवितं चारुसुगन्धिपुष्पम् ।<br>क्वचित् सुपुष्पैः सहकारवृक्षै-<br>र्लतोपगूढैस्तिलकद्रुमैश्च ॥ २८ | देवाधिदेव शंकरने कहा— प्रिये! यह उद्यान खिले हुए नाना प्रकारके गुल्मोंसे सुशोभित है। यह लताओंके विस्तारसे अवनत होनेके कारण मनोहर लग रहा है। इसमें चारों ओर पुष्पोंसे लदे हुए प्रियङ्गुके तथा भली-भाँति खिली हुई कँटीली केतकीके वृक्ष दीख रहे हैं। यह सब ओर तमालके गुल्मों, सुगन्धित कनेर और मौलसिरी तथा फूलोंसे लदे हुए अशोक और पुंनागके उत्तम वृक्षोंसे, जिसके पुष्पोंपर भ्रमरसमूह गुञ्जार कर रहे हैं, व्याप्त है। कहीं पूर्णरूपसे खिले हुए कमलके परागसे धूसरित अङ्गवाले पक्षी सुन्दर कलनाद कर रहे हैं, कहीं सारसोंका दल बोल रहा है। कहीं मतवाले चातकोंकी मधुर बोली सुनायी पड़ रही है। कहीं चक्रवाकोंका शब्द गूँज रहा है। कहीं यूथ-के-यूथ कलहंस विचर रहे हैं। कहीं बतखोंके नादसे निनादित हो रहा है। कहीं झुंड-के-झुंड मतवाले भौंरे गुनगुना रहे हैं। कहीं मदसे मतवाली हुई देवाङ्गनाएँ सुन्दर एवं सुगन्धित पुष्पोंका सेवन कर रही हैं। कहीं सुन्दर पुष्पोंसे आच्छादित आमके वृक्ष और लताओंसे आच्छादित तिलकके वृक्ष शोभा पा रहे हैं। |