मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १८० * | ७४५ |
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| सूत उवाच<br><br>शृणुध्वं वै यथा लेभे गणेशत्वं स पिङ्गलः।<br>अन्नदत्वं च लोकानां स्थानं वाराणसीं त्विह॥ ४<br>पूर्णभद्रसुतः श्रीमानासीद्यक्षः प्रतापवान्।<br>हरिकेश इति ख्यातो ब्रह्मण्यो धार्मिकश्च ह॥ ५<br>तस्य जन्मप्रभृत्येव शर्वे भक्तिरनुत्तमा।<br>तदासीत्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ॥ ६<br>आसीनश्च शयानश्च गच्छंस्तिष्ठन्ननुव्रजन्।<br>भुञ्जानोऽथ पिबन् वापि रुद्रमेवान्वचिन्तयत्॥ ७<br>तमेवं युक्तमनसं पूर्णभद्रः पिताब्रवीत्।<br>न त्वां पुत्रमहं मन्ये दुर्जातो यस्त्वमन्यथा॥ ८<br>न हि यक्षकुलीनानामेतद् वृत्तं भवत्युत।<br>गुह्यका बत यूयं वै स्वभावात् क्रूरचेतसः॥ ९<br>क्रव्यादाम्रैव किम्भक्षा हिंसाशीलाश्च पुत्रक।<br>मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना॥ १०<br>स्वयम्भुवा यथाऽऽदिष्टा त्यक्तव्या यदि नो भवेत्।<br>आश्रमान्तरजं कर्म न कुर्युर्गृहिणस्तु तत्॥ ११<br>हित्वा मनुष्यभावं च कर्मभिर्विविधैश्चर।<br>यत्त्वमेवं विमार्गस्थो मनुष्याजात एव च॥ १२<br>यथावद् विविधं तेषां कर्म तज्जातिसंश्रयम्।<br>मयापि विहितं पश्य कर्मैतन्नात्र संशयः॥ १३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पिंगलको जिस प्रकार गणेशत्व, लोकोंके लिये अन्नदत्व और वाराणसी-जैसा स्थान प्राप्त हुआ था वह प्रसङ्ग बतला रहा हूँ, सुनिये। प्राचीनकालमें हरिकेश नामसे विख्यात एक सौन्दर्यशाली यक्ष हो गया है, जो पूर्णभद्रका पुत्र था। वह महाप्रतापी, ब्राह्मणभक्त और धर्मात्मा था। जन्मसे ही उसकी शंकरजीमें प्रगाढ़ भक्ति थी। वह तन्मय होकर उन्हींको नमस्कार करनेमें, उन्हींकी भक्ति करनेमें और उन्हींके ध्यानमें तत्पर रहता था। वह बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, घूमते तथा खाते-पीते समय सदा शिवजीके ध्यानमें ही मग्न रहता था। इस प्रकार शंकरजीमें लीन मनवाले उससे उसके पिता पूर्णभद्रने कहा—'पुत्र! मैं तुम्हें अपना पुत्र नहीं मानता। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अन्यथा ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यक्षकुलमें उत्पन्न होनेवालोंका ऐसा आचरण नहीं होता। तुम गुह्यक* हो। राक्षस ही स्वभावसे क्रूर चित्तवाले, मांसभक्षी, सर्वभक्षी और हिंसापरायण होते हैं। महात्मा ब्रह्माद्वारा ऐसा ही निर्देश दिया गया है। तुम ऐसा मत करो; क्योंकि तुम्हारे लिये ऐसी वृत्ति नहीं बतलायी गयी है। गृहस्थ भी अन्य आश्रमोंका कर्म नहीं करते। इसलिये तुम मनुष्यभावका परित्याग करके यक्षोंके अनुकूल विविध कर्मोंका आचरण करो। यदि तुम इस प्रकार विमार्गपर ही स्थित रहोगे तो मनुष्यसे उत्पन्न हुआ ही समझे जाओगे। अतः तुम यक्षजातिके अनुकूल विविध कर्मोंका ठीक-ठीक आचरण करो। देखो, मैं भी निःसंदेह वैसा ही आचरण कर रहा हूँ॥ ४-१३॥ | | सूत उवाच<br><br>एवमुक्त्वा स तं पुत्रं पूर्णभद्रः प्रतापवान्।<br>उवाच निष्क्रम क्षिप्रं गच्छ पुत्र यथेच्छसि॥ १४<br>ततः स निर्गतस्त्यक्त्वा गृहं सम्बन्धिनस्तथा।<br>वाराणसीं समासाद्य तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १५<br>स्थाणुभूतो ह्यनिमिषः शुष्ककाष्ठोपलोपमः।<br>संनियम्येन्द्रियग्राममवातिष्ठत निश्चलः॥ १६<br>अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य तदाशिषः।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां दिव्यमप्यभ्यवर्तत॥ १७<br>वल्मीकेन समाक्रान्तो भक्ष्यमाणः पिपीलिकैः।<br>वज्रसूचीमुखैस्तीक्ष्णैर्विध्यमानस्तथैव च॥ १८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रतापी पूर्णभद्रने अपने उस पुत्रसे इस प्रकार (कहा; किंतु जब उसपर कोई प्रभाव पड़ते नहीं देखा, तब वह पुनः कुपित होकर) बोला—'पुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे घरसे निकल जाओ और जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाओ।' तब वह हरिकेश गृह तथा सम्बन्धियोंका त्याग कर निकल पड़ा और वाराणसीमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह इन्द्रियसमुदायको संयमित कर सूखे काष्ठ और पत्थरकी भाँति निश्चल हो एकटक स्थाणु (ठूँठ)-की तरह स्थित हो गया। इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले हरिकेशके एक सहस्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये। उसके शरीरपर बामवट जम गयी। वज्रके समान कठोर और सूई-जैसे पतले एवं तीखे मुखवाली चींटियोंने उसमें छेद कर उसे खा डाला। |
* अमर, व्याडि, हलायुध आदि कोशों एवं भारतादि प्रायः सभी ग्रन्थोंमें यक्षोंकी निधिरक्षक श्रेणीको ही गुह्यक कहा गया है—'निधिं गृह्णन्ति ये यक्षास्ते स्युर्गुह्यकसंज्ञकाः।'