भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 757
* अध्याय १८० *७४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रगीतविद्याधरसिद्धचारणं<br>प्रमत्तनृत्याप्सरसां गणाकुलम् ।<br>प्रहृष्टनानाविधपक्षिसेवितं<br>प्रमत्तहारीतकुलोपनादितम् ॥ २९<br>मृगेन्द्रनादाकुलसत्त्वमानसैः<br>क्वचित्क्वचिद्द्वन्द्वकदम्बकैर्मृगैः ।<br>प्रफुल्लनानाविधचारुपङ्कजैः<br>सरस्तटाकैरुपशोभितं क्वचित् ॥ ३०कहीं विद्याधर, सिद्ध और चारण राग अलाप रहे हैं तो कहीं अप्सराओंका दल उन्मत्त होकर नाच रहा है। इसमें नाना प्रकारके पक्षी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। यह मतवाले हारीतसमूहसे निनादित है। कहीं-कहीं झुंड-के-झुंड मृगके जोड़े सिंहकी दहाड़से व्याकुल मनवाले होकर इधर-उधर भाग रहे हैं। कहीं ऐसे तालाब शोभा पा रहे हैं, जिनके तटपर नाना प्रकारके सुन्दर कमल खिले हुए हैं॥ २४—३०॥
निबिडनिचुलनीलं नीलकण्ठाभिरामं<br>मदमुदितविहङ्गव्रातनादाभिरामम् ।<br>कुसुमिततरुशाखालीनमत्तद्विरेफं<br>नवकिसलयशोभाशोभितप्रान्तशाखम् ॥ ३१यह घने बेंतकी लताओं एवं नीलमयूरोंसे सुशोभित और मदसे उन्मत्त हुए पक्षिसमूहोंके नादसे मनोरम लग रहा है। इसके खिले हुए वृक्षोंकी शाखाओंमें मतवाले भौंरे छिपे हुए हैं और उन शाखाओंके प्रान्तभाग नये किसलयोंकी शोभासे सुशोभित हैं।
क्वचिच्च दन्तिक्षतचारुवीरुधं<br>क्वचिल्लतालिङ्गितचारुवृक्षकम् ।<br>क्वचिद्विलासालसगामिबर्हिणं<br>निषेवितं किम्पुरुषव्रजैः क्वचित् ॥ ३२कहीं सुन्दर वृक्ष हाथियोंके दाँतोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं। कहीं लताएँ मनोहर वृक्षोंका आलिङ्गन कर रही हैं। कहीं भोगसे अलसाये हुए मयूरगण मन्दगतिसे विचरण कर रहे हैं। कहीं किम्पुरुषगण निवास कर रहे हैं।
पारावतध्वनिविकूजितचारुशृङ्गै-<br>रभ्रंकषैः सितमनोहरचारुरूपैः ।<br>आकीर्णपुष्यनिकुरम्बविमुक्तहासै-<br>र्विभ्राजितं त्रिदशदेवकुलैरनेकैः ॥ ३३जो कबूतरोंकी ध्वनिसे निनादित हो रहे थे, जिनका उज्ज्वल मनोहर रूप है, जिनपर बिखरे हुए पुष्पसमूह हासकी छटा दिखा रहे हैं और जिनपर अनेकों देवकुल निवास कर रहे हैं, उन गगनचुम्बी मनोहर शिखरोंसे सुशोभित हो रहा है।
फुल्लोत्पलागुरुसहस्रवितानयुक्तै-<br>स्तोयाशयैः समनुशोभितदेवमार्गम् ।<br>मार्गान्तरागलितपुष्यविचित्रभक्ति-<br>सम्बद्धगुल्मविटपैर्विहगैरुपेतम् ॥ ३४खिले हुए कमल और अगुरुके सहस्रों वितानोंसे युक्त जलाशयोंसे जिसका देवमार्ग सुशोभित हो रहा है। उन मार्गोंपर पुष्प बिखरे हुए हैं और वह विचित्र भक्तिसे युक्त पक्षियोंसे सेवित गुल्मों और वृक्षोंसे युक्त है।
तुङ्गाग्रैर्नीलपुष्यस्तबकभरनतप्रान्तशाखैरशोकै-<br>र्मत्तालिवातगीतश्रुतिसुखजननैर्भासितान्तर्मनोज्ञैः ।<br>रात्रौ चन्द्रस्य भासा कुसुमिततिलकैरेकतां सम्प्रयातं<br>छायासुमप्रबुद्धस्थितहरिणकुलालुमद्भाङ्कुराग्रम् ॥ ३५जिनके अग्रभाग ऊँचे हैं, जिनकी शाखाओंका प्रान्तभाग नीले पुष्पोंके गुच्छोंके भारसे झुके हुए हैं तथा जिनकी शाखाओंके अन्तर्भागमें लीन मतवाले भ्रमरसमूहोंकी श्रवण-सुखदायिनी मनोहर गीत हो रही है, ऐसे अशोकवृक्षोंसे युक्त है। रात्रिमें यह अपने खिले हुए तिलक-वृक्षोंसे चन्द्रमाकी चाँदनीके साथ एकताको प्राप्त हो जाता है। कहीं वृक्षोंकी छायामें सोये हुए, सोकर जगे हुए तथा बैठे हुए हरिणसमूहोंद्वारा काटे गये दूर्वाङ्कुरोंके अग्रभागसे युक्त