मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७३८ * मत्स्यपुराण *
एक सौ उनासीवाँ अध्याय
शिवजीके साथ अन्धकासुरका युद्ध, शिवजीद्वारा मातृकाओंकी सृष्टि, शिवजीके हाथों अन्धककी मृत्यु और उसे गणेशत्वकी प्राप्ति, मातृकाओंकी विध्वंसलीला तथा विष्णुनिर्मित देवियोंद्वारा उनका अवरोध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>श्रुतः पद्मोद्भवस्तात विस्तरेण त्वयेरितः।<br>समासाद् भवमाहात्म्यं भैरवस्याभिधीयताम्॥ १ | ऋषियोंने पूछा—तात! आपके द्वारा विस्तारपूर्वक कहे गये पद्मोद्भवके प्रसङ्गको हमलोग सुन चुके, अब आप भैरवस्वरूप शंकरजीके माहात्म्यका संक्षेपसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>तस्यापि देवदेवस्य शृणुध्वं कर्म चोत्तमम्।<br>आसीद् दैत्योऽन्धको नाम भिन्नाञ्जनचयोपमः॥ २<br>तपसा महता युक्तो ह्यवध्यस्त्रिदिवौकसाम्।<br>स कदाचिन्महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम्॥ ३<br>क्रीडमानं तदा दृष्ट्वा हर्तुं देवीं प्रचक्रमे।<br>तस्य युद्धं तदा घोरमभवत् सह शम्भुना॥ ४<br>आवन्त्ये विषये घोरे महाकालवनं प्रति।<br>तस्मिन् युद्धे तदा रुद्रश्चान्धकेनातिपीडितः॥ ५<br>सुषुवे बाणमत्युग्रं नाम्ना पाशुपतं हि तत्।<br>रुद्रबाणविनिर्भेदाद् रुधिरादन्धकस्य तु॥ ६<br>अन्धकाश्च समुत्पन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>तेषां विदार्यमाणानां रुधिरादपरे पुनः॥ ७<br>बभूवुरन्धका घोरा यैर्व्याप्तमखिलं जगत्।<br>एवं मायाविनं दृष्ट्वा तं च देवस्तदान्धकम्॥ ८<br>पानार्थमन्धकास्रस्य सोऽसृजन्मातरस्तदा। | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अच्छा, आपलोग देवाधिदेव शंकरजीके भी उत्तम कर्मको सुनिये। पूर्वकालमें अञ्जनसमूहके सदृश वर्णवाला अन्धक नामका एक दैत्य हुआ था। वह महान् तपोबलसे सम्पन्न था, इसी कारण देवताओंद्वारा अवध्य था। किसी समय उसकी दृष्टि पार्वतीके साथ क्रीडा करते हुए भगवान् शंकरपर पड़ी, तब वह पार्वती देवीका अपहरण करनेके लिये प्रयास करने लगा। उस समय अवन्ती-प्रदेशमें स्थित भयंकर महाकालवनमें उसका शंकरजीके साथ भीषण संग्राम हुआ। उस युद्धमें जब भगवान् रुद्र अन्धकद्वारा अत्यन्त पीडित कर दिये गये, तब उन्होंने अतिशय भयंकर पाशुपत नामक बाणको प्रकट किया। शंकरजीके उस बाणके आघातसे निकलते हुए अन्धकके रक्तसे दूसरे सैकड़ों-हजारों अन्धक उत्पन्न हो गये। पुनः उनके घायल शरीरोंसे बहते हुए रुधिरसे दूसरे भयंकर अन्धक प्रकट हुए, जिनके द्वारा सारा जगत् व्याप्त हो गया। तब उस अन्धकको इस प्रकारका मायावी जानकर भगवान् शंकरने उसके रक्तको पान करनेके लिये मातृकाओंकी सृष्टि की॥ २–८ १/२॥ |
| माहेश्वरी तथा ब्राह्मी कौमारी मालिनी तथा॥ ९<br>सौपर्णी ह्याथ वायव्या शाक्री वै नैरृती तथा।<br>सौरी सौम्या शिवा दूती चामुण्डा चाथ वारुणी॥ १०<br>वाराही नारसिंही च वैष्णवी च चलच्छिखा।<br>शतानन्दा भगानन्दा पिच्छिला भगमालिनी॥ ११ | उन (मातृकाओं)-के नाम हैं—माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी, मालिनी, सौपर्णी, वायव्या, शाक्री, नैर्ऋती, सौरी, सौम्या, शिवा, दूती, चामुण्डा, वारुणी, वाराही, नारसिंही, वैष्णवी, चलच्छिखा, शतानन्दा, भगानन्दा, पिच्छिला, भगमालिनी, |