भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 763
* अध्याय १८१ *७५३

एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय

अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी)-का माहात्म्य

सूत उवाच<br>इमां पुण्योद्भवां स्निग्धां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे सुविशुद्धास्तपोधनाः॥ १<br>गणेश्वरपतिं दिव्यं रुद्रतुल्यपराक्रमम्।<br>सनत्कुमारो भगवानपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्॥ २<br>ब्रूहि गुह्यं यथातत्त्वं यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>माहात्म्यं सर्वभूतानां परमात्मा महेश्वरः॥ ३<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः।<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतो महेश्वरः॥ ४सूतजी कहते हैं— परम विशुद्ध हृदयवाले तपस्वी ऋषियो! आप सब लोग इस उत्तम कथाको जो पापकी विनाशिनी और पुण्यको उत्पन्न करनेवाली है, सुनिये! एक बार भगवान् सनत्कुमारने रुद्रके ही समान पराक्रमी तथा गणेश्वरोंके स्वामी दिव्य नन्दिकेश्वरसे पूछा—'जो सभी जीवोंके परमात्मा महेश्वर तथा देवताओं एवं दानवोंद्वारा दुष्प्राप्य हैं, वे महात्मा शंकर घोर स्वरूपको धारण कर सृष्टिसे प्रलयपर्यन्त स्थाणुरूपमें जहाँ नित्य अवस्थित रहते हैं, उस गोपनीय (स्थान)-को आप रहस्यपूर्वक हमलोगोंको बतलाइये'॥ १—४॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>पुरा देवेन यत् प्रोक्तं पुराणं पुण्यमुत्तमम्।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम्॥ ५<br>ततो देवेन तुष्टेन उमायाः प्रियकाम्यया।<br>कथितं भुवि विख्यातं यत्र नित्यं स्वयं स्थितः॥ ६<br>रुद्रस्यार्धासनगता मेरुशृङ्गे यशस्विनी।<br>महादेवं ततो देवी प्रणता परिपृच्छति॥ ७नन्दिकेश्वरने कहा— पूर्वकालमें महादेवने पुण्य प्रदान करनेवाले जिस श्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था, वह सब मैं महेश्वरको नमस्कार कर वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय उमाको प्रसन्न करनेकी इच्छासे प्रसन्नमना महादेवने जिस स्थानपर वे सदा स्वयं विराजमान रहते हैं, उस विश्वविख्यात स्थानका वर्णन किया था। एक बार सुमेरुके शिखरपर रुद्रके आधे आसनपर विराजमान यशस्विनी देवी उमाने विनयभावसे महादेवजीसे प्रश्न किया॥ ५—७॥
देव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश चन्द्रार्धकृतशेखर।<br>धर्मं प्रब्रूहि मर्त्यानां भुवि चैवोध्वैरेतसाम्॥ ८<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानाध्ययनसम्पन्नं कथं भवति चाक्षयम्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम्।<br>कथं तत् क्षयमायाति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर॥ १०<br>यस्मिन् व्यवस्थितो भक्त्या तुष्यसि त्वं महेश्वर।<br>व्रतानि नियमाश्चैव आचारो धर्म एव च॥ ११<br>सर्वसिद्धिकरं यत्र ह्यक्षयगतिदायकम्।<br>वक्तुमर्हसि तत् सर्वं परं कौतूहलं हि मे॥ १२देवीने पूछा— अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले देवदेवेश्वर भगवन्! भूतलपर वर्तमान ऊर्ध्वरेता प्राणियोंके धर्मको विस्तारसे बतलाइये। साथ ही यह भी बतलाइये कि जप, दान, हवन, यज्ञ, तपस्या, शुभ कर्म, ध्यान और अध्ययन आदि किस प्रकार अक्षयभावको प्राप्त होते हैं? शंकर! हजारों पूर्वजन्मोंमें जो पाप सञ्चित हुए हैं, वे किस प्रकार नष्ट होते हैं? यह आप मुझे स्पष्ट बतलाइये। महेश्वर! जिस स्थानपर स्थित होकर आप भक्तिसे प्रसन्न होते हैं तथा व्रत, नियम, आचार और धर्म जहाँ सभी सिद्धियोंके प्रदाता बन जाते हैं एवं अनश्वर गति प्रदान करते हैं, ये सभी बातें आप बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी ही उत्कण्ठा है॥८—१२॥