भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 764

७५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महेश्वर उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रियं मम ॥ १३<br>अष्टषष्टिः पुरा प्रोक्ता स्थानानां स्थानमुत्तमम्।<br>यत्र साक्षात् स्वयं रुद्रः कृत्तिवासाः स्वयं स्थितः ॥ १४<br>यत्र संनिहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम्।<br>तत्क्षेत्रं न मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् ॥ १५<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परा गतिः।<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥ १६<br>ध्यानमध्ययनं दानं सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥ १७<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्।<br>अविमुक्ताग्निना दग्धमग्नौ तूलमिवाहितम् ॥ १८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः।<br>कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ १९<br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते शृणु प्रिये ॥ २०<br>चन्द्रार्धमौलिनः सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ २१<br>अकामो वा सकामो वा ह्यपि तिर्यग्गतोऽपि वा।<br>अविमुक्ते त्यजन् प्राणान् मम लोके महीयते ॥ २२<br>अविमुक्तं यदा गच्छेत् कदाचित् कालपर्ययात्।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा तत्रैव निधनं व्रजेत् ॥ २३<br>अविमुक्तं गतो देवि न निर्गच्छेत् ततः पुनः।<br>सोऽपि मत्पदमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २४महेश्वरने कहा— देवि! सुनो, मैं तुम्हें गुप्तसे भी गुप्त उत्तम विषय बतला रहा हूँ। सभी क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी) मुझे परम प्रिय है। पहले मैं अड़सठ श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर चुका हूँ, जहाँ गजचर्म धारण कर मैं साक्षात् रुद्रस्वरूपसे विराजमान रहता हूँ; परंतु अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में मैं नित्य-निरन्तर निवास करता हूँ। उस क्षेत्रको मैं कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये इसे अविमुक्त कहा जाता है। उस अविमुक्त क्षेत्रमें परा सिद्धि और परमगति प्राप्त होती है। वहाँ किया गया जप, दान, हवन, यज्ञ, तप, शुभ कर्म, ध्यान, अध्ययन, दान आदि सभी अक्षय हो जाते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिके हजारों पूर्व जन्मोंमें जो पाप संचित होते हैं वे सभी नष्ट हो जाते हैं। वे अविमुक्तारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल जाते हैं जैसे अग्निमें समर्पित की हुई रूई। प्रिये! यदि अविमुक्त क्षेत्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि, म्लेच्छ एवं अन्य निम्नस्तरके पापयोनिवाले कीट, चींटें, पशु, पक्षी आदि कालके वशीभूत हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, (तो उनकी क्या गति होती है, उसे) सुनो। देवि! वे सभी मानव-शरीर धारणकर मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, ललाटमें तृतीय नेत्रसे युक्त शिवस्वरूप होकर मेरे शिवपुरमें जन्म लेते हैं। चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा तिर्यग्योनिगत ही क्यों न हो, यदि वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करता है तो मेरे लोकमें पूजित होता है। देवि! यदि मनुष्य कालक्रमानुसार कभी अविमुक्त क्षेत्रमें पहुँच जाय तो वहाँ पत्थरसे अपने चरणोंको तोड़कर स्थित रहे और पुनः अविमुक्त क्षेत्रसे बाहर न जाय, वहीं मृत्युको प्राप्त हो जाय तो वह भी मेरे पदको प्राप्त होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ १३—२४॥
वस्त्रापथं रुद्रकोटिं सिद्धेश्वरमहालयम्।<br>गोकर्णं रुद्रकर्णं च सुवर्णाक्षं तथैव च ॥ २५<br>अमरं च महाकालं तथा कायावरोहणम्।<br>एतानि हि पवित्राणि सांनिध्यात् संध्ययोर्द्वयोः ॥ २६<br>कालिञ्जरवनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्।<br>एतानि च पवित्राणि सांनिध्याद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः ॥ २७<br>हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाप्रातकेश्वरम्।<br>जालेश्वरं परं गुह्यं गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ॥ २८प्रिये! वस्त्रापथ (जूनागढ़, गिरिनार), रुद्रकोटि, सिद्धेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण तथा सुवर्णाक्ष, अमरकण्टक, महाकाल (उज्जैनी) और कायावरोहण (कारावार, गुजरात)—ये सभी स्थान प्रातः और संध्याकालमें मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। इसी प्रकार कालिंजरवन, शङ्कुकर्ण और स्थलेश्वर (थानेश्वर)—ये भी मेरी संनिधिके कारण ही पवित्र हैं। वरारोहे! अविमुक्त क्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें स्थित रहता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। प्रिये! हरिश्चन्द्र, आप्रातकेश्वर, जालेश्वर, श्रीपर्वत,
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