भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७५६ * मत्स्यपुराण *


| ब्रह्मचर्यव्रतैः सम्यक् सम्यगिष्टं मखैर्भवेत्।<br>अपापात्मा गतिः सर्वा या तूक्ता च क्रियावताम्॥ ९<br>यस्तत्र निवसेद् विप्रोऽसंयुक्तात्मासमाहितः।<br>त्रिकालमपि भुञ्जानो वायुभक्षसमो भवेत्॥ १०<br>निमेषमात्रमपि यो ह्यविमुक्ते तु भक्तिमान्।<br>ब्रह्मचर्यसमायुक्तः परमं प्राप्नुयात् तपः॥ ११<br>योऽत्र मासं वसेद् धीरो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।<br>सम्यक् तेन व्रतं चीर्णं दिव्यं पाशुपतं महत्॥ १२<br>जन्ममृत्युभयं तीर्त्वा स याति परमां गतिम्।<br>नैःश्रेयसीं गतिं पुण्यां तथा योगगतिं व्रजेत्॥ १३<br>न हि योगगतिर्दिव्या जन्मान्तरशतैरपि।<br>प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छंकरस्य तु॥ १४ | उन्हें वह पवित्र गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मचर्यपूर्वक यज्ञोंद्वारा भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर क्रियासम्पन्न व्यक्तियोंके लिये कही गयी है। जो विप्र समाधिसे रहित, योगसे शून्य एवं तीनों समय भोजन करते हुए भी वहाँ निवास करता है वह वायुभक्षीके समान माना जाता है। इस अविमुक्त क्षेत्रमें क्षणभर भी ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करनेवाला भक्तिमान् व्यक्ति परम तपको प्राप्त करता है। जो धीर पुरुष अल्प भोजन करते हुए इन्द्रियोंको वशमें कर एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह (मानो) महान् दिव्य पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है। वह पुरुष जन्म और मृत्युके भयको पारकर परमगतिको प्राप्त करता है तथा पुण्यदायक मोक्ष एवं योगगतिका अधिकारी हो जाता है। जिस दिव्य योगगतिको सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं प्राप्त किया जा सकता, वह स्थानके माहात्म्य और शंकरके प्रभावसे यहाँ प्राप्त हो जाती है॥ ३—१४॥ | | ब्रह्महा योऽभिगच्छेत्तु अविमुक्तं कदाचन।<br>तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् ब्रह्महत्या निवर्तते॥ १५<br>आदेहपतनाद् यावत् क्षेत्रं यो न विमुञ्चति।<br>न केवलं ब्रह्महत्या प्राक्कृतं च निवर्तते॥ १६<br>प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते।<br>अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्चति॥ १७<br>तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां स तत्र वसति प्रभुः॥ १८<br>सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः॥ १९<br>अविमुक्ते परा सिद्धिर्विमुक्ते परं पदम्।<br>अविमुक्तं निषेवेत देवर्षिगणसेवितम्॥ २०<br>यदीच्छेन्मानवो धीमान् न पुनर्जायते क्वचित्।<br>मेरोः शक्तो गुणान् वक्तुं द्वीपानां च तथैव च॥ २१<br>समुद्राणां च सर्वेषां नाविमुक्तस्य शक्यते।<br>अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु॥ २२<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते।<br>अविमुक्ते ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम्॥ २३<br>कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति।<br>मणिकर्ण्यां त्यजन् देहं गतिमिष्टां व्रजेन्नरः॥ २४ | ब्रह्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी यदि किसी समय इस अविमुक्तक्षेत्रमें चला जाता है तो इस क्षेत्रके प्रभावसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है। जो मृत्युपर्यन्त इस क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं, अपितु पहलेके किये हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह भगवान् विश्वेश्वरको प्राप्तकर पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करता। जो अनन्यचित्त हो अविमुक्त क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसपर भगवान् शङ्कर सदा प्रसन्न रहते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। जो सांख्य और योगका द्वारस्वरूप है उस स्थानपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शङ्कर गणोंके साथ निवास करते हैं। अविमुक्त क्षेत्र श्रेष्ठ स्थान है। अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है। अविमुक्तमें रहनेसे परम सिद्धि प्राप्त होती है और अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। यदि बुद्धिमान् मनुष्य यह चाहता हो कि मेरा पुनर्जन्म न हो तो उसे देवर्षिगणोंसे सेवित अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। मेरु पर्वत, सभी द्वीपों तथा समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है, किंतु अविमुक्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मृत्युके समय वायुसे प्रेरित मनुष्योंके मर्मस्थानोंके छिन्न हो जानेपर स्मृति नहीं उत्पन्न होती, किंतु अविमुक्तमें अन्तसमय कर्मोंसे प्रेरित भक्तोंके कानमें स्वयं ईश्वर मन्त्रका जाप करते हैं। मनुष्य मणिकर्णिकामें शरीरका |