मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १८३ * | ७५७ |
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| ईश्वरप्रेरितो याति दुष्प्रापामकृतात्मभिः।<br>अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्॥ २५<br><br>अविमुक्तं निषेवेत संसारभयमोचनम्।<br>योगक्षेमप्रदं दिव्यं बहुविघ्नविनाशनम्॥ २६<br><br>विघ्नैश्चालोड्यमानोऽपि योऽविमुक्तं न मुञ्चति।<br><br>स मुञ्चति जरां मृत्युं जन्म चैतदशाश्वतम्।<br>अविमुक्तप्रसादात् तु शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २७ | त्याग करनेपर इष्टगतिको प्राप्त करता है। जो गति अविशुद्ध आत्माओंद्वारा दुष्प्राप्य है, उसे भी वह ईश्वरकी प्रेरणाद्वारा यहाँ प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य अनेक पापोंसे परिपूर्ण इस मानवयोनिको नश्वर समझकर संसार-भयसे छुटकारा देनेवाले, योगक्षेमके प्रदाता, अनेक विघ्नोंके विनाशक, दिव्य अविमुक्त (काशी)-में निवास करता है तथा अनेक विघ्नोंसे आलोड़ित होनेपर भी अविमुक्तको नहीं छोड़ता, वह वृद्धावस्था, मृत्यु और इस नश्वर जन्मसे छुटकारा पा लेता है तथा अविमुक्तके माहात्म्यसे शिवसायुज्यको प्राप्त करता है॥ १५—२७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८२॥
एक सौ तिरासीवाँ अध्याय
अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर
| देव्युवाच<br>हिमवन्तं गिरिं त्यक्त्वा मन्दरं गन्धमादनम्।<br>कैलासं निषधं चैव मेरुपृष्ठं महाद्युति॥ १<br>रम्यं त्रिशिखरं चैव मानसं सुमहागिरिम्।<br>देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं वनमेव च॥ २<br>सुरस्थानानि मुख्यानि तीर्थान्यायतननि च।<br>तानि सर्वाणि संत्यज्य अविमुक्ते रतिः कथम्॥ ३<br>किमत्र सुमहत् पुण्यं परं गुह्यं वदस्व मे।<br>येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पद्गणैर्वृतः॥ ४<br>क्षेत्रस्य प्रवरत्वं च ये च तत्र निवासिनः।<br>तेषामनुग्रहः कश्चित् तत्सर्वं ब्रूहि शङ्कर॥ ५<br><br>शंकर उवाच<br>अत्यद्भुतमिमं प्रश्नं यत्त्वं पृच्छसि भामिनि।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ ६<br>वाराणस्यां नदी पुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता।<br>प्रविष्टा त्रिपथा गङ्गा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये॥ ७<br>ममैव प्रीतिरतुला कृत्तिवासे च सुन्दरि।<br>सर्वेषां चैव स्थानानां स्थानं तत्तु यथाधिकम्॥ ८ | **देवी पार्वतीने पूछा—**कल्याणकारी पतिदेव! हिमालयपर्वत, मन्दर, गन्धमादन, कैलास, निषध, देदीप्यमान सुमेरुपीठ, मनोहर त्रिशिखर पर्वत एवं अतिशय विशाल मानस पर्वत, रमणीय देव-उद्यान, नन्दनवन, देवस्थानों, मुख्य तीर्थों और मन्दिरों—इन सभी स्थानोंको छोड़कर आपका अविमुक्तक्षेत्रमें इतना अधिक प्रेम क्यों है? यहाँ अतिशय गोपनीय कौन-सा बहुत बड़ा पुण्य है, जिससे आप प्रमथोंके साथ यहाँ नित्य रमण करते हैं। उस क्षेत्रकी तथा वहाँके निवासियोंकी जो श्रेष्ठता है और उन लोगोंपर आपका जो अपूर्व अनुग्रह है—वे सभी बातें मुझे बतलाइये॥ १—५॥<br><br>**शिवजी बोले—**भामिनि! तुम जो प्रश्न कर रही हो यह अतिशय अद्भुत है। मैं वह सब स्पष्टरूपसे कह रहा हूँ, सुनो। प्रिये! सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित त्रिपथगामिनी पुण्यशीला नदी श्रीगङ्गाजी मेरे उस क्षेत्र वाराणसीमें प्रविष्ट होती हैं। सुन्दरि! कृत्तिवासलिङ्गपर मेरा अपार प्रेम है, इसीलिये वह स्थान सभी स्थानोंसे |