भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७५८* मत्स्यपुराण *

| तेन कार्येण सुश्रोणि तस्मिन् स्थाने रतिर्मम।<br>तस्मिँल्लिङ्गे च सांनिध्यं मम देवि सुरेश्वरि॥ ९<br>क्षेत्रस्य च प्रवक्ष्यामि गुणान् गुणवतां वरे।<br>याञ्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १०<br>यदि पापो यदि शठो यदि वाधार्मिको नरः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यविमुक्तं व्रजेद् यदि॥ ११<br>प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे।<br>न हि त्यक्ष्यामि तत्स्थानं महागणशतैर्वृतः॥ १२<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>वक्त्रं मम महाभागे प्रविशन्ति युगक्षये॥ १३<br>तेषां साक्षादहं पूजां प्रतिगृह्णामि पार्वति।<br>सर्वगुह्योत्तमं स्थानं मम प्रियतमं शुभम्॥ १४<br>धन्याः प्रविष्टाः सुश्रोणि मम भक्ता द्विजातयः।<br>मद्भक्तिपरमा नित्यं ये मद्भक्तास्तु ते नराः॥ १५<br>तस्मिन् प्राणान् परित्यज्य गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>सदा यजति रुद्रेण सदा दानं प्रयच्छति॥ १६<br>सदा तपस्वी भवति अविमुक्तस्थितो नरः।<br>यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्याम्यहं प्रिये॥ १७<br>सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।<br>सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च स प्रपद्येत मामिह॥ १८<br>अविमुक्तं सदा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चितम्।<br>ते तिष्ठन्तीह सुश्रोणि मद्भक्ताश्च त्रिविष्टपे॥ १९<br>मत्प्रसादात् तु ते देवि दीव्यन्ति शुभलोचने।<br>दुर्धराश्चैव दुर्धर्षा भवन्ति विगतज्वराः॥ २०<br>अविमुक्तं शुभं प्राप्य मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>विधूतपापा विमला भवन्ति विगतज्वराः॥ २१ | श्रेष्ठ है। सुश्रोणि! इसी कारण मेरा उस स्थानपर अधिक राग है तथा सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा सदा निवास रहता है। सभी गुणवानोंमें श्रेष्ठ देवि! अब मैं क्षेत्रके गुणोंका वर्णन करता हूँ जिन्हें सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पापी, दुष्ट अथवा अधार्मिक मनुष्य भी यदि अविमुक्त (काशी)-में चला जाय तो वह सभी पापोंसे छूट जाता है। सभी प्राणियोंके स्थावर एवं जंगमसे व्याप्त लोकके प्रलयकालमें भी मैं सैकड़ों विशिष्ट गणोंके साथ रहकर उस स्थानको नहीं छोड़ता। महाभागे! जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस—सभी युगके नाशके समय मेरे मुखमें प्रवेश कर जाते हैं। पार्वति! उनकी पूजाको मैं साक्षात्-रूपसे ग्रहण करता हूँ। यह शुभदायक अतिशय रहस्यमय स्थान मुझे परम प्रिय है। सुश्रोणि! वहाँ निवास करनेवाले मेरे भक्त द्विजातिगण धन्य हैं। सदा मेरी भक्तिमें तत्पर जो मेरे भक्त हैं वे वहाँ अपने शरीरका त्याग कर परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-में निवास करता है, वह सदा रुद्रसूक्तसे पूजा करता है, सदा दान देता है और सदा तपस्यामें रत रहता है। प्रिये! जो मेरी नित्य पूजा करता है उससे मैं प्रसन्न रहता हूँ। जो सभी प्रकारका दान करता है, सभी तरहके यज्ञोंमें दीक्षित होता है और सभी तीर्थोंके जलोंके अभिषेकसे सम्पन्न है वही यहाँ मुझे प्राप्त करता है। देवि! जो सदा सुनिश्चित रूपसे अविमुक्त क्षेत्रमें जाते रहते हैं तथा यहाँ निवास करते हैं वे स्वर्गमें भी मेरे भक्त बने रहते हैं। शुभलोचने देवि! मेरी कृपासे वे देदीप्यमान रहते हैं तथा किसीसे पराजित न होनेवाले, पराक्रमशाली और संतापरहित होते हैं। स्थिर निश्चयवाले मेरे भक्त शुभप्रद अविमुक्तको प्राप्तकर पापरहित, निर्मल और उद्वेगशून्य हो जाते हैं॥ ६—२१॥ | | <center>पार्वत्युवाच</center><br>दक्षयज्ञस्त्वया देव मत्प्रियार्थे निषूदितः।<br>अविमुक्तगुणानां तु न तृप्तिरिह जायते॥ २२ | पार्वतीने कहा—देव! आपने मेरा प्रिय करनेके लिये दक्ष-यज्ञको विनष्ट किया था, किंतु अविमुक्तके गुणोंको सुननेसे मुझे यहाँ संतोष नहीं हो रहा है॥ २२॥ | | <center>ईश्वर उवाच</center><br>क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत्प्रियार्थे विनाशितः।<br>महाप्रिये महाभागे नाशितोऽयं वरानने॥ २३<br>अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ २४ | ईश्वर बोले—महाभागे! तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने क्रोधवश दक्ष-यज्ञका विनाश किया था; क्योंकि वरानने! तुम तो मेरी अतिशय प्रियतमा हो, इसीलिये उस यज्ञको नष्ट किया था। जो मेरे भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक यज्ञ करते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥ २३-२४॥ |