भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 769
* अध्याय १८३ *७५९
देव्युवाच<br>दुर्लभास्तु गुणा देव अविमुक्ते तु कीर्तिताः।<br>सर्वांस्तान् मम तत्त्वेन कथयस्व महेश्वर॥ २५<br>कौतूहलं महादेव हृदिस्थं मम वर्तते।<br>तत्सर्वं मम तत्त्वेन आख्याहि परमेश्वर॥ २६**देवीने पूछा—**देव! आपने अविमुक्तक्षेत्रके जिन दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, महेश्वर! आप उन सभी गुणोंका रहस्यपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। महादेव! मेरे हृदयमें परम आश्चर्य हो रहा है, अतः परमेश्वर! उन सभी विषयोंको मुझे रहस्यपूर्वक बतलाइये॥ २५-२६॥
ईश्वर उवाच<br>अक्षया ह्यामराश्चैव ह्यदेहाश्च भवन्ति ते।<br>मत्प्रसादाद् वरारोहे मामेव प्रविशन्ति वै॥ २७<br>ब्रूहि ब्रूहि विशालाक्षि किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २८**ईश्वर बोले—**सुन्दरि! जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करते हैं वे मेरी कृपासे विदेह, अक्षय और अमर हो जाते हैं तथा अन्तमें निश्चय ही मुझमें लीन हो जाते हैं। विशालनेत्रे! कहो, कहो, तुम और क्या सुनना चाहती हो?॥ २७-२८॥
देव्युवाच<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे अहो पुण्यमहो गुणाः।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि ब्रूहि देव पुनर्गुणान्॥ २९**देवीने पूछा—**देव! अविमुक्त नामक विशाल क्षेत्रका आश्चर्यजनक पुण्य है एवं आश्चर्यजनक गुण हैं, इनके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः पुनः उन गुणोंका वर्णन कीजिये॥ २९॥
ईश्वर उवाच<br>महेश्वरि वरारोहे शृणु तांस्तु मम प्रिये।<br>अविमुक्ते गुणा ये तु तथान्यानपि तच्छृणु॥ ३०<br>शाकपर्णाशिनो दान्ताः सम्प्रक्षाल्या मरीचिपाः।<br>दन्तोलूखलिनश्चान्ये अश्मकुट्टास्तथा परे॥ ३१<br>मासि मासि कुशाग्रेण जलमास्वादयन्ति वै।<br>वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे॥ ३२<br>आदित्यवपुषः सर्वे जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।<br>एवं बहुविधैर्धर्मैरन्यत्र चरितव्रताः॥ ३३<br>त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिनः।<br>तपश्वरन्ति वान्यत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>येऽविमुक्ते वसन्तीह स्वर्गे प्रतिवसन्ति ते॥ ३४**ईश्वरने कहा—**महेश्वरि! तुम तो परम सुन्दरी एवं मेरी प्रिया हो, अतः अविमुक्तक्षेत्रमें जो गुण हैं, उन्हें तथा उनके अतिरिक्त अन्यान्य गुणोंको भी सुनो। जो शाक एवं पत्तोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले, संयमी, भलीभाँति स्नानसे निर्मल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले, दाँतरूपी ओखलीसे निर्वाह करनेवाले, पत्थरपर कूटकर भोजन करनेवाले, प्रतिमास कुशके अग्रभागसे जलका आस्वादन करनेवाले, वृक्षकी जड़में निवास करनेवाले, पत्थरपर शयन करनेवाले, आदित्यके समान तेजस्वी शरीरधारी, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय हैं, तथा इसी तरह अनेक प्रकारके धर्मोंसे अन्य स्थानोंमें व्रतका आचरण करनेवाले हैं अथवा तपस्यामें संलग्न हैं, वे सभी तीनों कालोंमें भोजन करनेवाले अविमुक्तनिवासी व्यक्तिकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास कर रहे हैं, वे मानो स्वर्गमें ही निवास कर रहे हैं॥ ३०-३४॥
मत्समः पुरुषो नास्ति त्वत्समा नास्ति योषिताम्।<br>अविमुक्तसमं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति॥ ३५<br>अविमुक्ते परो योगो ह्यविमुक्ते परा गतिः।<br>अविमुक्ते परो मोक्षः क्षेत्रं नैवास्ति तादृशम्॥ ३६<br>परं गुह्यं प्रवक्ष्यामि तत्त्वेन वरवर्णिनि।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे यदुक्तं हि मया पुरा॥ ३७विश्वमें मेरे समान न कोई दूसरा पुरुष है, न तुम्हारे समान कोई स्त्री है और न अविमुक्तके समान कोई अन्य तीर्थस्थान हुआ है, न होगा। अविमुक्तमें परम योग, अविमुक्तमें श्रेष्ठ गति, अविमुक्तमें परम मोक्ष प्राप्त होता है, इसके समान अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है। शोभने! महाक्षेत्र अविमुक्तके विषयमें मैंने जो पूर्वमें कहा है, उस परम रहस्यको मैं यथार्थरूपसे कह रहा हूँ।