मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १८३ * | ७६३ |
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| अग्निप्रवेशं ये कुर्युुरविमुक्ते विधानतः ।<br>प्रविशन्ति मुखं ते मे निःसंदिग्धं वरानने ॥ ७७<br>कुर्वन्त्यनशनं ये तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः ।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ७८<br>अर्चयेद् यस्तु मां देवि अविमुक्ते तपोवने ।<br>तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि यदवाप्नोति मानवः ॥ ७९<br>दशाश्वमेधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः ।<br>दशसौवर्णिकं पुष्पं योऽविमुक्ते प्रयच्छति ॥ ८०<br>अग्निहोत्रफलं धूपे गन्धदाने तथा शृणु ।<br>भूमिदानेन तत्तुल्यं गन्धदानफलं स्मृतम् ॥ ८१<br>सम्मार्जने पञ्चशतं सहस्रमनुलेपने ।<br>मालया शतसाहस्रमनन्तं गीतवाद्यतः ॥ ८२ | जाता है। वरानने! जो इस अविमुक्तक्षेत्रमें विधानपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, वे निश्चय ही मेरे मुखमें प्रवेश करते हैं, जो मेरे भक्त यहाँ दृढ़ निश्चयपूर्वक निराहार रहते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। देवि! जो इस अविमुक्त तपोवनमें मेरी पूजा करता है, उसका धर्म बतला रहा हूँ, जो उस मनुष्यको प्राप्त होता है। वह निःसंदेह दस अश्वमेध यागके फलको प्राप्त करता है। जो इस अविमुक्तमें दस सुवर्णनिर्मित पुष्पका दान करता है तथा वहाँ धूप दान करता है, उसे अग्निहोत्रका फल प्राप्त होता है। अब गन्धदानका फल सुनो। भूमिदानके समान ही गन्ध-दानका फल कहा गया है। भलीभाँति स्नान करनेपर पाँच सौ, चन्दन लगानेसे एक हजार, माला समर्पण करनेसे एक लाख और गाने-बजानेसे अनन्त अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति होती है॥ ७५–८२॥ |
| देव्युवाच<br>अत्यद्भुतमिदं देवं स्थानमेतत् प्रकीर्तितम् ।<br>रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थं त्वं न मुञ्चसि ॥ ८३ | **देवीने पूछा—**देव! जैसा आपने बतलाया है, सचमुच ही यह स्थान अतिशय अद्भुत है। अब मैं उस रहस्यको सुनना चाहती हूँ, जिसके कारण आप इस स्थानको नहीं छोड़ते॥ ८३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>आसीत् पूर्वं वरारोहे ब्रह्मणस्तु शिरो वरम् ।<br>पञ्चमं शृणु सुश्रोणि जातं काञ्चनसप्रभम् ॥ ८४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः ।<br>तदेवमब्रवीद् देवि जन्म जानामि ते ह्यहम् ॥ ८५<br>ततः क्रोधपरीतेन संरक्तनयनेन च ।<br>वामाङ्गुष्ठनखाग्रेण च्छिन्नं तस्य शिरो मया ॥ ८६ | **ईश्वरने कहा—**सुन्दर कटिभागवाली वरारोहे! सुनो। प्राचीनकालमें ब्रह्माका सुवर्णके समान कान्तिमान् पाँचवाँ सुन्दर सिर उत्पन्न हुआ। देवि! उस महात्माके उत्पन्न हुए उस पाँचवें देदीप्यमान मुखने इस प्रकार कहा कि मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ। यह सुनकर मैं क्रोधसे परिव्याप्त हो गया और मेरी आँखें लाल हो गयीं। तब मैंने बायें अँगूठेके नखके अग्रभागसे उनके सिरको काट दिया॥ ८४–८६॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>यदा निरपराधस्य शिरश्छिन्नं त्वया मम ।<br>तस्माच्छापसमायुक्तः कपाली त्वं भविष्यसि ।<br>ब्रह्महत्याकुलो भूत्वा चर तीर्थानि भूतले ॥ ८७ | **ब्रह्मा बोले—**आपने बिना अपराधके ही मेरा सिर काट दिया है, अतः आप भी शापसे युक्त हो कपाली हो जायँगे। साथ ही आप ब्रह्महत्यासे व्याकुल होकर भूतलपर तीर्थोंमें भ्रमण कीजिये। |
| ततोऽहं गतवान् देवि हिमवन्तं शिलोच्चयम् ।<br>तत्र नारायणः श्रीमान् मया भिक्षां प्रयाचितः ॥ ८८<br>ततस्तेन स्वकं पार्श्वं नखाग्रेण विदारितम् ।<br>स्रवतो महती धारा तस्य रक्तस्य निःसृता ॥ ८९<br>प्रयाता सातिविस्तीर्णा योजनार्धशतं तदा ।<br>न सम्पूर्णं कपालं तु घोरमद्भुतदर्शनम् ॥ ९० | देवि! तब मैं हिमालय पर्वतपर चला गया और वहाँ मैंने श्रीमान् नारायणसे भिक्षाकी याचना की। इसके बाद उन्होंने नखके अग्रभागसे अपने पार्श्वभागको विदीर्ण कर दिया, तब उससे रक्तकी विपुल धारा प्रवाहित हुई। वह धारा बहती हुई पचास योजनतक परिव्याप्त हो गयी, किंतु भयंकर दीखनेवाला अद्भुत कपाल उससे नहीं भरा। |