भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 774, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 774

७६४ * मत्स्यपुराण *


दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता।<br>प्रोवाच भगवान् विष्णुः कपालं कुत ईदृशम्॥ ९१<br>आश्चर्यभूतं देवेश संशयो हृदि वर्तते।<br>कुतश्च सम्भवो देव सर्वं मे ब्रूहि पृच्छतः॥ ९२इस प्रकार वह धारा हजार दिव्य वर्षोंतक अनवरत प्रवाहित होती रही। तब भगवान् विष्णुने पूछा कि 'ऐसा अद्भुत कपाल आपको कहाँसे प्राप्त हुआ है? देवेश! मेरे हृदयमें संदेह हो रहा है। देव! यह कहाँसे उत्पन्न हुआ? मुझ प्रश्नकर्ताको सभी बातें बतलाइये'॥ ८७—९२॥
देवदेव उवाच<br>श्रूयतामस्य हे देव कपालस्य तु सम्भवः।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां तपस्तप्त्वा सुदारुणम्॥ ९३<br>ब्रह्मासृजद् वपुर्दिव्यमद्भुतं लोमहर्षणम्।<br>तपसश्च प्रभावेण दिव्यं काञ्चनसंनिभम्॥ ९४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः।<br>निकृत्तं तन्मया देव तदिदं पश्य दुर्जयम्॥ ९५<br>यत्र यत्र च गच्छामि कपालं तत्र गच्छति।<br>एवमुक्तस्ततो देवः प्रोवाच पुरुषोत्तमः॥ ९६**(तब) देवाधिदेव शंकर बोले—**देव! आप इस कपालकी उत्पत्तिका विवरण सुनिये। ब्रह्माने सौ हजार वर्षोंतक अतिशय घोर तपस्या कर दिव्य रोमाञ्चकारी अद्भुत शरीरकी रचना की। उन महात्मा ब्रह्माके शरीरमें तपस्याके प्रभावसे सुवर्णके समान देदीप्यमान पाँचवाँ सिर उत्पन्न हुआ। देव! मैंने उसे काट दिया। यह वही दुर्जय कपाल है। अब देखिये, मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ यह कपाल भी मेरे पीछे लगा रहता है। (इस प्रकार) ऐसा कहे जानेपर पुरुषोत्तमभगवान्ने तब कहा—॥ ९३—९६॥
श्रीभगवानुवाच<br>गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं ब्रह्माणस्त्वं प्रियं कुरु।<br>तस्मिन् स्थास्यति भद्रं ते कपालं तस्य तेजसा॥ ९७<br>ततः सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।<br>गतोऽस्मि पृथुलश्रोणि न क्वचित् प्रत्यतिष्ठत॥ ९८<br>ततोऽहं समनुप्राप्तो ह्यविमुक्ते महाशये।<br>अवस्थितः स्वके स्थाने शापश्च विगतो मम॥ ९९<br>विष्णुप्रसादात् सुश्रोणि कपालं तत् सहस्रधा।<br>स्फुटितं बहुधा जातं स्वप्नलब्धं धनं यथा॥ १००<br>ब्रह्महत्यापहं तीर्थं क्षेत्रमेतन्मया कृतम्।<br>कपालमोचनं देवि देवानां प्रथितं भुवि॥ १०१<br>कालो भूत्वा जगत् सर्वं संहरामि सृजामि च।<br>ततस्तत् पतितं तत्र शापश्च विगतो मम॥ १०२<br>कपालमोचनं तीर्थमभूद्ब्रह्महत्याविनाशनम्।<br>मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति विष्णुभक्तास्तथैव च॥ १०३<br>तत्रस्थोऽस्मि जगत् सर्वं सुकरोमि सुरेश्वरि।<br>देवेशि सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतरं मम॥ १०४<br>ये भक्ता भास्करे देवि लोकनाथे दिवाकरे।<br>तत्रस्थो यस्त्यजेद् देहं मामेव प्रविशेत् तु सः॥ १०५**श्रीभगवान् बोले—**जाइये, आप अपने स्थानको लौट जाइये और ब्रह्माको प्रसन्न कीजिये। उनके तेजसे आपका यह श्रेष्ठ कपाल वहीं स्थित हो जायगा। पृथुल-श्रोणि! इसके बाद मैं सभी तीर्थों और पुण्य क्षेत्रोंमें गया, परंतु यह कहीं भी ठहर न सका। तत्पश्चात् मैं अतिशय प्रभावशाली अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचा। वह वहाँ अपने स्थानपर स्थित हो गया और मेरा शाप समाप्त हो गया।<br>सुश्रोणि! विष्णुकी कृपासे वह कपाल स्वप्नमें प्राप्त हुए धनके समान हजारों टुकड़ोंमें टूट-फूट गया। देवि! मैंने इस तीर्थको ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला बना दिया। यह भूतलपर देवताओंके लिये कपालमोचनतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। मैं कालके रूपमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण विश्वका संहार और सृजन करता हूँ। इस प्रकार वह कपाल इस क्षेत्रमें गिरा और मेरा शाप नष्ट हुआ। इसी कारण यह कपालमोचनतीर्थ ब्रह्महत्याका विनाशक हुआ। सुरेश्वरि! मैं वहीं स्थित हूँ और सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करता हूँ। देवेशि! सभी गुप्त स्थानोंमें यह अविमुक्तक्षेत्र मेरे लिये प्रियतर है। देवि! वहाँ मेरे भक्त, विष्णुभक्त और जो लोकनाथ प्रभाशाली सूर्यके भक्त हैं, वे सभी जाते हैं। जो वहाँ रहकर शरीरका त्याग करता है, वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है॥ ९७—१०५॥