मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १८४ * | ७६५ |
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| देव्युवाच | देवीने कहा—महाकान्तिशाली देव ! ब्रह्माद्वारा कथित यह विषय अत्यद्भुत है। त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीका यह प्रिय गुह्य स्थान है। अन्य जितने उत्तम तीर्थस्थान हैं, वे सभी उस स्थानकी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। जहाँ देवेश भगवान् शंकर निवास करते हैं तथा जिससे हजारों तीर्थोंसे श्रेष्ठ गङ्गाकी तुलना नहीं हो सकती, वह भी यहीं स्थित है। देवेश ! आप ही (ज्ञानात्मिका) भक्ति हैं और आप ही उत्तम गति हैं। देव ! आपने ब्रह्मा आदिकी जो सनातनी गति बतलायी है, जिसे भक्त एवं द्विजातिगण सुनते हैं, वह सब भी आपकी ही अनुकम्पा है ॥ १०६–१०९ ॥ | | अत्यद्भुतमिदं देव यदुक्तं पद्मयोनिना।<br>त्रिपुरान्तकरस्थानं गुह्यमेतन्महाद्युते ॥ १०६<br>यान्यन्यानि सुतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>यत्र तिष्ठति देवेशो यत्र तिष्ठति शङ्करः ॥ १०७<br>गङ्गा तीर्थसहस्राणां तुल्या भवति वा न वा।<br>त्वमेव भक्तिर्देवेश त्वमेव गतिरुत्तमा ॥ १०८<br>ब्रह्मादीनां तु ते देव गतिरुक्ता सनातनी।<br>श्राव्यते यद् द्विजातीनां भक्तानामनुकम्पया ॥ १०९ | |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्यमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८३ ॥
एक सौ चौरासीवाँ अध्याय
काशीकी महिमाका वर्णन
| महेश्वर उवाच | भगवान् शिवने कहा—अविमुक्त-निवासियोंके इस परम श्रेष्ठ स्थानको जानकर पुनः संसारमें जन्मकी आकाङ्क्षा न रखनेवाले अनेक सिद्धगणोंने इस स्थानमें निवास किया है। महादेवका यह अतिशय गुह्य स्थान श्रेष्ठ तीर्थ तथा तपोवनस्वरूप है। जो लोग उस उत्तम क्षेत्रमें जाते हैं, वे पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करते। सत्पुरुषोंद्वारा परमानन्दको प्राप्त करनेके इच्छुक तथा ज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले व्यक्तियोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें मरनेवालेको प्राप्त होती है। इस अविमुक्तक्षेत्रमें भगवान् शंकरकी अनुपम और अनुत्तम प्रीति है, अतः यहाँ जानेसे असंख्य फल और अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है। (महा) श्मशानके* नामसे प्रसिद्ध यह अविमुक्त परम गुह्य कहा गया है। भूतलपर जो मनुष्य इसका सेवन नहीं करते, वे वस्तुतः ठगे गये हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें स्थित वायुद्वारा उड़ायी गयी पवित्र धूलके स्पर्शसे अतिशय दुष्कर्म करनेवाले व्यक्ति भी परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। जहाँ स्वयं भगवान् शंकर निवास करते हैं, उस अविमुक्तकी अनुपम महिमा होनेके कारण देवता, दानव और मनुष्य उसका वर्णन नहीं कर सकते। |
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| सेवितं बहुभिः सिद्धैरपुनर्भवकाङ्क्षिभिः।<br>विदित्वा तु परं क्षेत्रमविमुक्तनिवासिनाम् ॥ १<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्।<br>परं स्थानं तु ते यान्ति सम्भवन्ति न ते पुनः ॥ २<br>ज्ञाने विहितनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।<br>या गतिर्विहिता सद्भिः साविमुक्ते मृतस्य तु ॥ ३<br>भवस्य प्रीतिरतुला ह्यविमुक्ते ह्यनुत्तमा।<br>असंख्येयं फलं तत्र ह्यक्षया च गतिर्भवेत् ॥ ४<br>परं गुह्यं समाख्यातं श्मशानमिति संज्ञितम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते वञ्चितास्ते नरा भुवि ॥ ५<br>अविमुक्ते स्थितैः पुण्यैः पांशुभिर्वायुनेरितैः।<br>अपि दुष्कृतकर्माणो यास्यन्ति परमां गतिम् ॥ ६<br>अविमुक्तगुणान् वक्तुं देवदानवमानवैः।<br>न शक्यतेऽप्रमेयत्वात् स्वयं यत्र भवः स्थितः ॥ ७ |
* काशीखण्ड एवं काशीरहस्यादिके अनुसार प्रलयकालमें सभी प्राणियोंके शमन करनेसे इसका नाम महाश्मशान है।