भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १८४ * ७६७
सम्राड्विराण्मया लोका जायन्ते ह्यपुनर्भवाः।<br>महर्जनस्तपश्चैव सत्यलोकस्तथैव च॥ २३<br>मनसः परमो योगो भूतभव्यभवस्य च।<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य योनिः सांख्यादिमोक्षयोः॥ २४<br>येऽविमुक्तं न मुञ्चन्ति नरास्ते नैव वञ्चिताः।<br>उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च यत्॥ २५<br>क्षेत्राणामुत्तमं चैव श्मशानानां तथैव च।<br>तटाकानां च सर्वेषां कूपानां स्रोतसां तथा॥ २६<br>शैलानामुत्तमं चैतत् तडागानां तथोत्तमम्।<br>पुण्यकृद्भवभक्तैश्च ह्यविमुक्तं तु सेव्यते॥ २७आदि देवगण एवं सम्राट्, विराट् आदि मानवसमूह एवं महः, जन, तप और सत्यलोकमें निवास करनेवाले प्राणी अविमुक्तक्षेत्रमें आकर पुनर्जन्मसे छुटकारा पा जाते हैं। यह मनका तथा भूत, भविष्य और वर्तमानका, परम योग है और ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी प्राणिसमूहका तथा सांख्य आदि मोक्षका उत्पत्तिस्थान है। जो मनुष्य इस अविमुक्तका परित्याग नहीं करते, वे वञ्चित नहीं हैं। यह अविमुक्तक्षेत्र सभी तीर्थों, स्थानों, क्षेत्रों, श्मशानों, सरोवरों, सभी कूपों, नालों, पर्वतों और जलाशयोंमें उत्तम है। पुण्यकर्मा शिव-भक्त अविमुक्तका ही सेवन करते हैं॥ १९–२७॥
ब्रह्मणः परमं स्थानं ब्रह्मणाध्यासितं च यत्।<br>ब्रह्मणा सेवितं नित्यं ब्रह्मणा चैव रक्षितम्॥ २८<br>अत्रैव सप्तभुवनं काञ्चनो मेरुपर्वतः।<br>मनसः परमो योगः प्रीत्यर्थं ब्रह्मणः स तु॥ २९<br>ब्रह्मा तु तत्र भगवांस्त्रिसंध्यं चेश्वरे स्थितः।<br>पुण्यात् पुण्यतमं क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम्॥ ३०<br>आदित्योपासनं कृत्वा विप्राश्चामरतां गताः।<br>अन्येऽपि ये त्रयो वर्णा भवभक्त्या समाहिताः॥ ३१<br>अविमुक्ते तनुं त्यक्त्वा गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>अष्टौ मासान् विहारस्य यतीनां संयतात्मनाम्॥ ३२<br>एकत्र चतुरो मासान् मासौ वा निवसेत् पुनः।<br>अविमुक्ते प्रविष्टानां विहारस्तु न विद्यते॥ ३३<br>न देहो भविता तत्र दृष्टं शास्त्रे पुरातने।<br>मोक्षो ह्यसंशयस्तत्र पञ्चत्वं तु गतस्य वै॥ ३४<br>स्त्रियः पतिव्रता याश्च भवभक्ताः समाहिताः।<br>अविमुक्ते विमुक्तास्ता यास्यन्ति परमां गतिम्॥ ३५<br>अन्या याः कामचारिण्यः स्त्रियो भोगपरायणाः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ३६यह ब्रह्माका परमस्थान, ब्रह्माद्वारा अध्यासित, ब्रह्माद्वारा सदा सेवित और ब्रह्माद्वारा रक्षित है। ब्रह्माकी प्रसन्नताके लिये यहीं सातों भुवन और सुवर्णमय सुमेरु पर्वत है। यहीं मनका परम योग प्राप्त होता है। इस क्षेत्रमें भगवान् ब्रह्मा तीनों सन्ध्याओंमें शिवके ध्यानमें लीन रहते हैं। यह क्षेत्र पुण्यसे भी पुण्यतम है और पुण्यात्माओंद्वारा सेवित है। यहाँ आदित्यकी उपासना करके विप्रगण अमर हो गये हैं। जो अन्य तीनों वर्णोंके प्राणी हैं, वे भी शिव-भक्तिसे युक्त हो अविमुक्तक्षेत्रमें शरीरका परित्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। संयत आत्मावाले यतियोंके लिये आठ मासोंका विहार विहित है। वे (चातुर्मासमें) एक स्थानमें केवल चार मास या दो मासतक निवास कर सकते हैं, किंतु अविमुक्तमें निवास करनेवाले यतियोंके लिये (यह) विहारका विधान नहीं है। (वे काशीमें सदा निवास कर सकते हैं।) प्राचीन शास्त्रमें ऐसा देखा गया है कि यहाँ मरनेवालेका पुनर्जन्म नहीं होता, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो पतिव्रता स्त्रियाँ शिवजीकी भक्तिमें लीन हैं, वे इस अविमुक्तमें शरीरका त्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाती हैं। इनसे अतिरिक्त जो कामपरायण एवं भोगमें आसक्त स्त्रियाँ हैं, वे इस क्षेत्रमें यथासमय मृत्युको प्राप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो जाती हैं॥ २८–३६॥
यत्र योगश्च मोक्षश्च प्राप्यते दुर्लभो नरैः।<br>अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत् तपोवनम्॥ ३७जहाँ मनुष्य दुर्लभ योग और मोक्षको प्राप्त करते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचकर किसी अन्य तपोवनमें जानेकी आवश्यकता नहीं है।