मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वात्मना तपः सेव्यं ब्राह्मणैर्नात्र संशयः।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु मम तुल्यो भवेन्नरः॥ ३८<br><br>यतो मया न मुक्तं हि त्वविमुक्तं ततः स्मृतम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः॥ ३९<br><br>विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च दम्भः स्तम्भोऽतिमत्सरः॥ ४०<br><br>निद्रा तन्द्रा तथाऽऽलस्यं पैशुन्यमिति ते दश।<br>अविमुक्ते स्थिता विघ्नाः शक्रेण विहिताः स्वयम्॥ ४१<br><br>विनायकोपसर्गाश्च सततं मूर्ध्नि तिष्ठति।<br>पुण्यमेतद् भवेत् सर्वं भक्तानामनुकम्पया॥ ४२<br><br>परं गुह्यमिति ज्ञात्वा ततः शास्त्रानुदर्शनात्।<br>व्याहृतं देवदेवैस्तु मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४३<br><br>मेदसा विप्लुता भूमिरविमुक्ते तु वर्जिता।<br>पूता सम्भवत् सर्वा महादेवेन रक्षिता॥ ४४<br><br>संस्कारस्तेन क्रियते भूमेरन्यत्र सूरिभिः।<br>ये भक्त्या वरदं देवमक्षरं परमं पदम्॥ ४५<br><br>देवदानवगन्धर्वयक्षरक्षोमहोरगाः ।<br>अविमुक्तमुपासन्ते तन्निष्ठास्तत्परायणाः॥ ४६<br><br>ते विशन्ति महादेवमाज्याहुतिरिवानलम्।<br>तं वै प्राप्य महादेवमीश्वराध्युषितं शुभम्॥ ४७<br><br>अविमुक्तं कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमुपलब्धते। | ब्राह्मणोंको यहाँ निःसन्देह सर्वभावसे तपस्यामें तत्पर रहना चाहिये। जो मनुष्य अविमुक्तमें निवास करता है, वह मेरे समान हो जाता है; क्योंकि मैं इस स्थानको कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये यह अविमुक्त नामसे कहा जाता है। जो मोहग्रस्त पुरुष तमोगुणसे आवृत हो अविमुक्तमें निवास नहीं करते, वे मल-मूत्र-वीर्यके मध्यमें पुनः-पुनः निवास करते हैं। (अर्थात् उन्हें बारंबार जन्म लेना पड़ता है)। काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, स्तम्भ, अतिशय मात्सर्य, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य तथा पिशुनता—ये दस विघ्न जो स्वयं इन्द्रद्वारा विहित हैं, अविमुक्तमें स्थित रहते हैं। इनके अतिरिक्त विनायकोंके उपद्रव निरन्तर सिरपर सवार रहते हैं, किंतु ये सभी भक्तोंके प्रति भगवान्की अनुकम्पाके कारण पुण्यफल प्रदान करते हैं, क्योंकि श्रेष्ठ देवताओं और तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा शास्त्रकी आलोचनाके आधारपर इस स्थानको परम गुह्य कहा गया है। (प्राचीनकालमें मधु-कैटभकी) मज्जासे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो गयी थी, किंतु अविमुक्तकी भूमि उससे रहित थी। महादेवजीके द्वारा रक्षित यह सम्पूर्ण भूमि पवित्र ही बनी रही। इसीलिये (कल्पसूत्रोक्त-रीतिसे) मनीषिगण अन्यत्र भूमिका संस्कार करते हैं। जो देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और प्रधान नाग भगवान् भवमें निष्ठा रखते हुए उनकी भक्तिमें तत्पर हो अविमुक्तक्षेत्रमें आकर भक्तिपूर्वक वरप्रदान करनेवाले अविनाशी परमपदस्वरूप शंकरकी उपासना करते हैं, वे महादेवमें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे घीकी आहुति अग्निमें प्रविष्ट होती है। वे उन महादेवको तथा ईश्वरद्वारा अधिकृत शुभमय अविमुक्तको पाकर अपनेको 'मैं कृतार्थ हूँ'—ऐसा अनुभव करते हैं॥ ३७–४७ १/२ ॥ |
| ऋषिदेवासुरगणैर्जपहोमपरायणैः ॥ ४८<br><br>यतिभिर्मोक्षकामैश्च ह्यविमुक्तं निषेव्यते।<br>नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी॥ ४९<br><br>ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम्।<br>द्वियोजनमथार्धं च तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमम्॥ ५० | ऋषि, देव, असुर तथा जप-होमपरायण मुमुक्षु और यतिसमूह इस अविमुक्तमें निवास करते हैं। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्रमें मरकर नरकमें नहीं जाता; क्योंकि ईश्वरके अनुग्रहसे वे सभी परमगतिको प्राप्त होते हैं। यह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक ढाई योजन और |