भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 779, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 779

* अध्याय १८४ * ७६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अर्धयोजनविस्तीर्णं दक्षिणोत्तरतः स्मृतम्।<br>वाराणसी तदीया च यावच्छुक्लनदी तु वै॥ ५१<br><br>एष क्षेत्रस्य विस्तारः प्रोक्तो देवेन धीमता।<br>लब्ध्वा योगं च मोक्षं च काङ्क्षन्तो ज्ञानमुत्तमम्॥ ५२<br><br>अविमुक्तं न मुञ्चन्ति तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कदाचन॥ ५३<br><br>योगक्षेत्रं तपःक्षेत्रं सिद्धगन्धर्वसेवितम्।<br>सरितः सागराः शैला नाविमुक्तसमा भुवि॥ ५४<br><br>भूर्लोके चान्तरिक्षे च दिवि तीर्थानि यानि च।<br>अतीत्य वर्तते चान्यदविमुक्तं प्रभावतः॥ ५५<br><br>ये तु ध्यानं समासाद्य मुक्तात्मानः समाहिताः।<br>संनियम्येन्द्रियग्रामं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ५६<br><br>अविमुक्ते स्थिता नित्यं कृतार्थास्ते द्विजातयः।<br>भवभक्तिं समासाद्य रमन्ते तु सुनिश्चितम्॥ ५७<br><br>संहृत्य शक्तितः कामान् विषयेभ्यो बहिः स्थिताः।<br>शक्तितः सर्वतो मुक्ताः शक्तितस्तपसि स्थिताः॥ ५८<br><br>करणानीह चात्मानमपुनर्भवभाविताः।<br>तं वै प्राप्य महात्मानमीश्वरं निर्भयाः स्थिताः॥ ५९<br><br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>अविमुक्ते तु गृह्यन्ते भवेन विभुना स्वयम्॥ ६०दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। यह शिवपुरी वाराणसी शुक्लनदीतक बसी हुई है। बुद्धिमान् महादेवने इस क्षेत्रका यह विस्तार स्वयं बतलाया है। शिवमें निष्ठावान् और शिवपरायण भक्तगण योग और मोक्षको प्राप्तकर उत्तम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अविमुक्तक्षेत्रका परित्याग नहीं करते। जो मृत्युलोकवासी व्यक्ति इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे कभी भी शोचनीय नहीं होते। यह अविमुक्तक्षेत्र योगक्षेत्र है, तपःक्षेत्र है तथा सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित है। भूतलपर नदी, सागर और पर्वत—कोई भी अविमुक्तके समान नहीं है। भूलोक, अन्तरिक्ष और स्वर्गमें जितने तीर्थ हैं, उनका अविमुक्त अपने प्रभावसे अतिक्रमण कर विराजमान है। अविमुक्तमें नित्य निवास करनेवाले जो द्विजगण ध्यानयोगकी प्राप्तिसे मुक्तात्मा हो समाहित चित्तसे इन्द्रियोंको निरुद्धकर शतरुद्रीका जप करते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं और भवकी भक्तिको प्राप्त कर निश्चितरूपसे रमण करते हैं। जो यथाशक्ति कामनाओंका परित्याग कर विषयवासनासे रहित, यथाशक्ति सब तरहसे मुक्त, यथाशक्ति तपस्यामें स्थित तथा अपनी इन्द्रियों और आत्माको वशमें कर चुके हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। वे उन महात्मा शिवको प्राप्तकर निर्भय विचरण करते हैं। सर्वव्यापी शिव अविमुक्तमें उन व्यक्तियोंको स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, अतः सैकड़ों कोटि कल्पोंमें भी उनका पुनरागमन नहीं होता है॥४८-६०॥
उत्पादितं महाक्षेत्रं सिद्ध्यन्ते यत्र मानवाः।<br>उद्देशमात्रं कथिता अविमुक्तगुणास्तथा॥ ६१<br><br>समुद्रस्येव रत्नानामविमुक्तस्य विस्तरम्।<br>मोहनं तदभक्तानां भक्तानां भक्तिवर्धनम्॥ ६२<br><br>मूढास्ते तु न पश्यन्ति श्मशानमिति मोहिताः।<br>हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि॥ ६३<br><br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति।<br>जन्ममृत्युजरामुक्तः परं याति शिवालयम्॥ ६४<br><br>अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्येत पण्डितः॥ ६५<br><br>न दानैर्न तपोभिर्वा न यज्ञैर्नापि विद्यया।<br>प्राप्यते गतिरिष्टा या ह्यविमुक्ते तु लभ्यते॥ ६६इस महाक्षेत्रको (स्वयं भगवान् शिवने) उत्पन्न किया है, जहाँ मानवोंको सभी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मैंने अविमुक्तके गुणोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। अविमुक्तक्षेत्रका विस्तार समुद्रके रत्नोंकी भाँति दुष्कर है। यह अभक्तोंको मोहित करनेवाला और भक्तोंकी भक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। मोहग्रस्त मूढ व्यक्ति इसे श्मशान समझकर इसकी ओर नहीं देखते। जो विद्वान् सैकड़ों विघ्नोंसे बाधित होकर भी अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है, वह उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता। वह जन्म-जरा-मरणसे रहित होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। मोक्षकी कामना करनेवाले पुनर्जन्मसे रहित व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, उसी गतिको प्राप्तकर विद्वान् अपनेको कृतकृत्य मानता है। जो अभीष्ट गति दान, तप, यज्ञ और ज्ञानसे नहीं प्राप्त होती, वह अविमुक्तक्षेत्रमें सुलभ हो जाती है।