भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 785, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 785
  • अध्याय १८५ * ७७५

| सर्वकामाश्च ये यज्ञाः पुनरावृत्तिकाः स्मृताः।<br>अविमुक्ते मृता ये च सर्वे ते ह्यनिवर्तकाः॥ ६०<br>ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम्।<br>अविमुक्ते मृतानां तु पतनं नैव विद्यते॥ ६१<br>कल्पकोटिसहस्रैस्तु कल्पकोटिशतैरपि।<br>न तेषां पुनरावृत्तिर्मृता ये क्षेत्र उत्तमे॥ ६२<br>संसारसागरे घोरे भ्रमन्तः कालपर्ययात्।<br>अविमुक्तं समासाद्य गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ६३ | हैं। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले जो यज्ञ हैं, वे सभी पुनर्जन्म प्रदान करनेवाले हैं; किंतु जो अविमुक्तनगरमें शरीरका त्याग करते हैं, उनका संसारमें पुनः आगमन नहीं होता। ग्रह, नक्षत्र और तारागणोंको समयानुसार पतनका भय बना रहता है, किंतु अविमुक्तमें मरनेवालोंका पतन कभी नहीं होता। जो इस उत्तम क्षेत्रमें मरते हैं, उनका सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें क्या हजारों-करोड़ कल्पोंमें भी पुनरागमन नहीं होता। जो कालक्रमानुसार संसार-सागरमें भ्रमण करते हुए अविमुक्तनगरमें आ जाते हैं, वे परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं॥ ५६—६३॥ | | ज्ञात्वा कलियुगं घोरं हाहाभूतमचेतनम्।<br>अविमुक्तं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते नरा भुवि॥ ६४<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्तु यदि गच्छेत् ततः पुनः।<br>तदा हसन्ति भूतानि अन्योन्यं करताडनैः॥ ६५<br>कामक्रोधेन लोभेन ग्रस्ता ये भुवि मानवाः।<br>निष्क्रमन्ते नरा देवि दण्डनायकमोहिताः॥ ६६<br>जपध्यानविहीनानां ज्ञानवर्जितचेतसाम्।<br>ततो दुःखहतानां च गतिर्वाराणसी नृणाम्॥ ६७<br>तीर्थानां पञ्चकं सारं विश्वेशानन्दकानने।<br>दशाश्वमेधं लोलार्कः केशवो बिन्दुमाधवः॥ ६८<br>पञ्चमी तु महाश्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका।<br>एभिस्तु तीर्थवर्यैश्च वर्ण्यते ह्यविमुक्तकम्॥ ६९<br>एक एव प्रभावोऽस्ति क्षेत्रस्य परमेश्वरि।<br>एकेन जन्मना देवि मोक्षं पश्यन्त्यनुत्तमम्॥ ७०<br>एतद् वै कथितं सर्वं देव्यै देवेन भाषितम्।<br>अविमुक्तस्य क्षेत्रस्य तत् सर्वं कथितं द्विजाः॥ ७१ | जो मनुष्य हाहाकारमय एवं ज्ञानरहित भयंकर कलियुगको जानकर अविमुक्तका परित्याग नहीं करते, वे ही इस भूतलपर कृतार्थ हैं। जो अविमुक्तनगरमें जाकर यदि यहाँसे चला जाता है तो सभी प्राणी ताली बजाकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। देवि! जो मानव भूतलपर क्रोध और लोभसे ग्रस्त हैं, वे ही दण्डनायककी मायासे मोहित होकर इस नगरसे चले जाते हैं। जो मनुष्य जप-ध्यानसे रहित, ज्ञानशून्य और दुःखसे संतप्त हैं, उनकी गति वाराणसी है। विश्वेश्वरके इस आनन्द-काननमें दशाश्वमेध, लोलार्क, केशव, बिन्दुमाधव और पाँचवीं जो परमश्रेष्ठ मणिकर्णिका कही गयी है—ये पाँचों तीर्थोंके सार कहे गये हैं। इन्हीं श्रेष्ठ तीर्थोंसे अविमुक्तकी प्रशंसा होती है। परमेश्वरी देवि! इस क्षेत्रकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही जन्ममें मनुष्य परमश्रेष्ठ मोक्षको प्राप्त कर लेता है। द्विजगण! अविमुक्तक्षेत्रके विषयमें महादेवजीने पार्वतीसे जो बात कही थी, वह सभी मैंने आप लोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६४—७१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्यं नाम पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८५॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्तमाहात्म्यवर्णन नामक एक सौ पचासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८५॥

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