भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 786
७७६* मत्स्यपुराण *

एक सौ छियासीवाँ अध्याय

नर्मदा-माहात्म्यका उपक्रम

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>माहात्म्यमविमुक्तस्य यथावत् कथितं त्वया।<br>इदानीं नर्मदायास्तु माहात्म्यं वद सत्तम॥ १<br>यत्रोङ्कारस्य माहात्म्यं कपिलासंगमस्य च।<br>अमरेशस्य चैवाहुर्माहात्म्यं पापनाशनम्॥ २<br>कथं प्रलयकाले तु न नष्टा नर्मदा पुरा।<br>मार्कण्डेयश्च भगवान् न विनष्टस्तदा किल।<br>त्वयोक्तं तदिदं सर्वं पुनर्विस्तरतो वद॥ ३**ऋषियोंने पूछा—**सज्जनोंमें श्रेष्ठ सूतजी! आपने अविमुक्तका माहात्म्य तो भलीभाँति कह दिया, अब नर्मदाके माहात्म्यका वर्णन कीजिये, जहाँ ओंकार, कपिलासंगम और अमरेश पर्वतका पापनाशक माहात्म्य कहा जाता है। प्रलयकालमें भी नर्मदाका नाश क्यों नहीं होता? एवं भगवान् मार्कण्डेयका भी पूर्व प्रलयके समयमें विनाश क्यों नहीं हुआ? यद्यपि आपने ये बातें पूर्वमें कही हैं, तथापि इस समय पुनः विस्तारके साथ वर्णन कीजिये॥ १–३॥
सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः पाण्डवेन महात्मना।<br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं मार्कण्डेयो महामुनिः॥ ४<br>उग्रेण तपसा युक्तो वनस्थो वनवासिना।<br>पृष्टः पूर्वं महागाथां धर्मपुत्रेण धीमता॥ ५**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्राचीनकालमें धर्मपुत्र बुद्धिमान् महात्मा युधिष्ठिरने वनमें निवास करते समय वनवासी उग्र तपस्वी महामुनि मार्कण्डेयजीसे नर्मदाके माहात्म्यकी विस्तृत कथाके विषयमें प्रश्न किया था॥ ४-५॥
युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुता मे विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादाद् द्विजोत्तम।<br>भूयश्च श्रोतुमिच्छामि तन्मे कथय सुव्रत॥ ६<br>कथमेषा महापुण्या नदी सर्वत्र विश्रुता।<br>नर्मदा नाम विख्याता तन्मे ब्रूहि महामुने॥ ७**युधिष्ठिरने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! आपकी कृपासे मैंने विभिन्न धर्मोंको सुना। सुव्रत! अब मैं पुनः जो सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलाइये? महामुने! यह महापुण्यप्रदायिनी नर्मदा-नामसे विख्यात नदी सर्वत्र क्यों प्रसिद्ध हुई—इसका रहस्य मुझे बतलाइये॥ ६-७॥
मार्कण्डेय उवाच<br>नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ८<br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>तदेतद्धि महाराज तत्सर्वं कथयामि ते॥ ९<br>पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।<br>ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥ १०<br>त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।<br>सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ ११<br>कलिङ्गदेशे पश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ १२**मार्कण्डेयजीने कहा—**सभी पापोंका नाश करनेवाली नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदा सभी स्थावर-जङ्गम जीवोंका उद्धार करनेवाली है। महाराज! मैंने इस नर्मदा नदीका जो माहात्म्य पुराणमें आपसे सुना है, वह सब कह रहा हूँ। कनखलमें गङ्गा और कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदी पुण्यप्रदा कही गयी हैं, किंतु चाहे गाँव हो या वन, नर्मदा तो सभी जगह पुण्यप्रदायिनी है। सरस्वतीका जल तीन दिनोंतक सेवन करनेसे, यमुनाका जल सात दिनोंमें और गङ्गाका जल (स्नान-पानादिसे) उसी समय पवित्र कर देता है, परंतु नर्मदाका जल तो दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है। कलिङ्ग देशकी पश्चिमी सीमापर स्थित अमरकण्टक पर्वतसे त्रिलोकीमें विख्यात, रमणीय, मनोरम एवं पुण्यदायिनी नर्मदा प्रवाहित होती है।
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