भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७७८* मत्स्यपुराण *

| अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते।<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः ॥ २८<br>क्रीडते देवलोकस्थो दैवतैः सह मोदते।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान् ॥ २९<br>गृहं तु लभते वै स नानारत्नविभूषितम्।<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैडूर्यभूषितैः ॥ ३०<br>आलेख्यसहितं दिव्यं दासीदाससमन्वितम्।<br>मत्तमातङ्गशब्दैश्च हयानां हेषितेन च ॥ ३१<br>क्षुभ्यते तस्य तद्द्वारमिन्द्रस्य भवनं यथा।<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः ॥ ३२<br>तस्मिन् गृहे उषित्वा तु क्रीडाभोगसमन्विते।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं सर्वरोगविवर्जितः ॥ ३३<br>एवं भोगो भवेत् तस्य यो मृतोऽमरकण्टके।<br>अग्नौ विषजले वापि तथा चैव ह्यनाशके ॥ ३४<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा।<br>पतनं कुरुते यस्तु अमरेशे नराधिप ॥ ३५<br>कन्यानां त्रिसहस्त्राणि एकैकस्यापि चापरे।<br>तिष्ठन्ति भुवने तस्य प्रेषणं प्रार्थयन्ति च।<br>दिव्यभोगैः सुसम्पन्नः क्रीडते कालमक्षयम् ॥ ३६ | पाण्डुपुत्र! वह एक लाख वर्षोंतक अप्सराओंसे व्याप्त तथा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है। वह दिव्य चन्दनके लेपसे युक्त एवं दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित हो देवलोकमें रहता हुआ देवोंके साथ क्रीड़ा करते हुए आनन्दका अनुभव करता है। तत्पश्चात् स्वर्गसे भ्रष्ट होकर इस लोकमें पराक्रमी राजा होता है। उसे अनेक प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत ऐसे भवनकी प्राप्ति होती है, जो दिव्य हीरे, वैदूर्य और मणिमय स्तम्भोंसे विभूषित होता है। वह दिव्य चित्रोंसे सुशोभित तथा दासी-दाससे समन्वित रहता है। उसका द्वार मदमत्त हाथियोंके चिग्घाड़ और घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे इन्द्रभवनके समान संकुलित रहता है। वह सम्पूर्ण स्त्रीजनोंका प्रिय, श्रीसम्पन्न और सभी प्रकारके रोगोंसे रहित होकर राजराजेश्वरके रूपमें क्रीड़ा और भोगसे समन्वित उस गृहमें निवासकर सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है। जो अमरकण्टकमें शरीरका त्याग करता है, उसे इस प्रकारके आनन्दका उपभोग मिलता है। जो अग्नि, विष, जल तथा अनशन करके यहाँ मरता है, उसे आकाशमें वायुके समान स्वच्छन्द गति प्राप्त होती है। नरेश्वर! जो इस अमरकण्टक पर्वतसे गिरकर देहत्याग करता है, उसके भवनमें एक-से-एक बढ़कर सुन्दरी तीन हजार कन्याएँ स्थित रहती हैं, जो उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करती रहती हैं। वह दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण होकर अक्षय कालतक क्रीडा करता है॥ २५–३६॥ | | पृथिव्यामासमुद्रायामीदृशो नैव जायते।<br>यादृशोऽयं नृपश्रेष्ठ पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ३७ | नृपश्रेष्ठ! अमरकण्टक पर्वतपर शरीरका त्याग करनेसे जैसा पुण्य होता है, वैसा समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर कहीं भी नहीं होता। इस तीर्थको पर्वतके पश्चिम प्रान्तमें समझना चाहिये। | | तावत् तीर्थं तु विज्ञेयं पर्वतस्य तु पश्चिमे।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ ३८<br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>पितरो दश वर्षाणि तर्पितास्तु भवन्ति वै ॥ ३९ | यहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामक कुण्ड वर्तमान है, वहाँ पिण्डदान एवं संध्योपासन कर्म करनेसे पितरगण दस वर्षोंतक तृप्त बने रहते हैं। | | दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलेति महानदी।<br>सकलार्जुनसंछन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता ॥ ४०<br>सापि पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर ॥ ४१ | नर्मदाके दक्षिण तटपर समीप ही कपिला नामकी महानदी स्थित है। वह सब ओरसे अर्जुन वृक्षोंसे परिव्याप्त है। युधिष्ठिर! वह महाभागा पुण्यतोया नदी भी तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। | | पुराणे श्रूयते राजन् सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>तस्यास्तीरे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात् ॥ ४२ | राजन्! पुराणमें जैसा वर्णन है, उसके अनुसार वे सभी तीर्थ करोड़गुना फल देनेवाले हैं। उसके तटके जो वृक्ष कालवश गिर जाते हैं, |