मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १८६ * | ७७९ |
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| नर्मदातोयसंस्पृष्टास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।<br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा ॥ ४३<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्।<br>तत्र देवगणाः सर्वे सकिन्नरमहोरगाः ॥ ४४<br>यक्षराक्षसगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>सर्वे समागतास्तत्र पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ४५<br>तैश्च सर्वैः समागम्य मुनिभिश्च तपोधनैः।<br>नर्मदामाश्रिता पुण्या विशल्या नाम नामतः ॥ ४६<br>उत्पादिता महाभागा सर्वपापप्रणाशिनी।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ४७<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्।<br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम ॥ ४८<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ते लोकानां हितकाम्यया।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत् ॥ ४९ | वे भी नर्मदाके जलके स्पर्शसे श्रेष्ठ गतिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरी महाभागा मङ्गलदायिनी विशल्यकरणी नदी है। मनुष्य उस तीर्थमें स्नानकर उसी क्षण दुःखरहित हो जाता है। वहाँ सभी देवगण, किन्नर, महान् सर्पगण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, तपस्वी ऋषिगण आये और उस अमरकण्टकपर्वतपर मुनियों और तपस्वियोंके साथ स्थित हुए। वहाँ उन लोगोंने सभी पापोंका विनाश करनेवाली महाभागा पुण्यसलिला विशल्या नामसे विख्यात नदीको उत्पन्न किया, जो नर्मदामें मिलती है। राजन्! वहाँ जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपूर्वक जितेन्द्रिय होकर स्नानकर उपवासपूर्वक एक रात भी निवास करता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको तार देता है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें लोगोंके हितकी कामनासे महेश्वरने कपिला और विशल्या नामके तीर्थोंका वर्णन किया था। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है॥ ३७–४९॥ | | अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ५०<br>नर्मदायास्तु राजेन्द्र पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>यत्र यत्र नरः स्नात्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ॥ ५१<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते।<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर ॥ ५२<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्।<br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके ॥ ५३<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते।<br>नर्मदाया जलं पुण्यं फेनोर्मिभिरलङ्कृतम् ॥ ५४<br>पवित्रं शिरसा वन्द्यं सर्वपापैः प्रमोचनम्।<br>नर्मदा च सदा पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी ॥ ५५<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>एवं रम्या च पुण्या च नर्मदा पाण्डुनन्दन ॥ ५६<br>त्रयाणामपि लोकानां पुण्या ह्येषा महानदी।<br>वटेश्वरे महापुण्ये गङ्गाद्वारे तपोवने ॥ ५७<br>एतेषु सर्वस्थानेषु द्विजाः स्युः संशितव्रताः।<br>श्रुतं दशगुणं पुण्यं नर्मदोदधिसंगमे ॥ ५८ | नरेश्वर! इस तीर्थमें जो अनशन करता है, वह सभी पापोंसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करता है। राजेन्द्र! मैंने स्कन्दपुराणमें नर्मदाका जो फल सुना है, उसके अनुसार वहाँ-वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधके फलको प्राप्त करता है। जो नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर! जैसा मुझसे शंकरजीने कहा था, उसके अनुसार सरस्वती, गङ्गा और नर्मदामें स्नान और दानका फल समान होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक कालतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। नर्मदाका लहरियोंके फेनसे अलंकृत, पुण्यमय पवित्र जल सभी पापोंसे मुक्त करनेवाला है, अतः वह सिरसे वन्दना करनेयोग्य है। पुण्यतोया नर्मदा ब्रह्महत्याका नाश करनेवाली है। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। पाण्डुपुत्र! नर्मदा इस प्रकार पुण्यमयी और रमणीया है। यह महानदी तीनों लोकोंमें भी पुण्यमयी है। महापुण्यप्रद वटेश्वर, तपोवन और गङ्गाद्वार—इन स्थानोंमें द्विजगण व्रतानुष्ठान करते हैं, परंतु नर्मदा और समुद्रके सङ्गमपर उससे दसगुना अधिक फल सुना जाता है॥ ५०–५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८६ ॥