भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 806
७९६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>उपोष्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत्॥ २०<br>स्नानं कृत्वा यथान्यायमर्चयेच्च जनार्दनम्।<br>गोसहस्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति॥ २१अधिपति होता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर इन्द्रका प्रसिद्ध तीर्थ है, वहाँ एक रातका उपवास कर विधिविधानसे स्नान करे, स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक जनार्दनकी अर्चना करे तो उसे एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है और वह विष्णुलोकमें जाता है॥ १९—२१॥
ऋषितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोकं च गच्छति॥ २२<br>नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत्॥ २३<br>देवतीर्थं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥ २४<br>अमरकण्टकं गच्छेदमरैः स्थापितं पुरा।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ २५<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र रावणेश्वरमुत्तमम्।<br>नित्यं चायतनं दृष्ट्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६<br>ऋणतीर्थं ततो गच्छेद् ऋणोभ्यो मुच्यते ध्रुवम्।<br>वटेश्वरं ततो दृष्ट्वा पर्याप्तं जन्मनः फलम्॥ २७<br>भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरो राजन् सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥ २८<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तुरासङ्गममुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयन् सिद्धिमवाप्नुयात्॥ २९<br>सोमतीर्थं ततो गच्छेत् पश्येच्चन्द्रमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् भक्त्या परमया युतः॥ ३०<br>तत्क्षणाद् दिव्यदेहस्थः शिववन्मोदते चिरम्।<br>षष्टिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥ ३१तत्पश्चात् मनुष्योंके सभी पापोंके नाशक ऋषितीर्थकी यात्रा करे, वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव शिवलोकको चला जाता है। वहीं नारदजीका परम रमणीय तीर्थ है, वहाँ स्नानमात्रसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। राजन्! इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित देवतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर प्राचीनकालमें देवोंद्वारा स्थापित अमरकण्टककी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ रावणेश्वर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ मनुष्य प्रतिदिन देवमन्दिरका दर्शनकर ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। तदुपरान्त ऋणतीर्थमें जाय, वहाँ जानेसे मानव निश्चय ही ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद वटेश्वरका दर्शन करके मनुष्यजन्मका पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। राजन्! तदनन्तर सभी व्याधियोंको नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। उस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सभी दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठतम तुरासङ्ग तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद सोमतीर्थमें जाय और वहाँ परम श्रेष्ठ चन्द्रमाका दर्शन करे। राजन्! उस तीर्थमें परम भक्तिसे युक्त हो स्नान करनेसे मानव उसी क्षण दिव्य शरीर धारणकर शिवके समान चिरकालपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है और साठ हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ २२—३१॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्॥ ३२<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ३३<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते।<br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप॥ ३४राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ पिङ्गलेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे त्रिरात्रका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला गौका दान देता है, उस दाताके वंशके कुलवाले उस गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक रुद्रलोकमें पूजित होते हैं। नराधिप! उस तीर्थमें जो मानव प्राणका