भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 807, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 807

* अध्याय १९१ * । ७९७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठेयुर्ये नरोत्तमाः ॥ ३५<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा।<br>सुरेश्वरं ततो गच्छेन्नाम्ना कर्कोटकेश्वरम् ॥ ३६<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः।<br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ ३७<br>तुष्यते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते।<br>ततो दीपेश्वरं गच्छेद्व्यासतीर्थं तपोवनम् ॥ ३८<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ ३९<br>प्रदक्षिणां तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ४०<br>व्यासस्तस्य भवेत् प्रीतः प्राप्नुयादीप्सितं फलम्।<br>सूत्रेण वेष्टयित्वा तु दीपो देयः सवेदिकः ॥ ४१<br>क्रीडते ह्यक्षयं कालं यथा रुद्रस्तथैव च।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४२<br>संगमे तु नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वपातकैः।<br>ऐरण्डी त्रिषु लोकेषु विख्याता पापनाशिनी ॥ ४३<br>अथवाश्वयुजे मासि शुक्लपक्षे तु चाष्टमी।<br>शुचिर्भूत्वा नरः स्नात्वा सोपवासपरायणः ॥ ४४<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>ऐरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावानुरञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य ह्यवगाह्य च वै जलम् ॥ ४५<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।<br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ॥ ४६<br>प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा।<br>ततः सुवर्णसलिले स्नात्वा दत्त्वा तु काञ्चनम् ॥ ४७<br>काञ्चनेन विमानेन रुद्रलोके महीयते।<br>ततः स्वर्गाच्च्युतः कालाद् राजा भवति वीर्यवान् ॥ ४८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र हीक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं दिव्यं तत्र संनिहितः शिवः ॥ ४९परित्याग करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है। जो श्रेष्ठ मानव नर्मदाके तटपर निवास करते हैं, वे मरकर सन्त और पुण्यवान् व्यक्तियोंके समान स्वर्गमें जाते हैं। तदनन्तर कर्कोटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध सुरेश्वरकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ पुण्यतिथिको गङ्गाका अवतरण होता है, इसमें संदेह नहीं है। तत्पश्चात् नन्दितीर्थमें जाय और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करे। इससे उसपर नन्दीश्वर शिव प्रसन्न होते हैं और वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है। तत्पश्चात् व्यासके तपोवन दीपेश्वर-तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ प्राचीनकालमें व्याससे डरकर महानदी पीछेकी ओर लौटने लगी थी, तब व्यासके हुंकारसे वह दक्षिणकी ओर प्रवाहित हुई, नराधिप! उस तीर्थकी जो प्रदक्षिणा करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। उसपर व्यासदेव प्रसन्न होते हैं और उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। वहाँ वेदीपर सूतसे परिवेष्टित दीपका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव रुद्रकी तरह अक्षय कालतक आनन्दपूर्वक जीवनयापन करता है॥ ३२—४१ ½॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ ऐरण्डी-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। ऐरण्डी नदी पापनाशकके रूपमें तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके सङ्गममें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा यदि मनुष्य आश्विन-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिको स्नान करके पवित्र हो उपवासपूर्वक एक ब्राह्मणको भोजन करा दे तो उसे एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता है। जो ऐरण्डी-संगममें भक्तिभावपूर्वक उसकी मिट्टीको सिरपर धारणकर नर्मदाके जलसे मिश्रित जलमें अवगाहनकर स्नान करता है, वह सभी पापोंसे छूट जाता है। नराधिप! जो उस तीर्थमें जाकर प्रदक्षिणा करता है, उसने मानो सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी परिक्रमा कर ली। तदनन्तर सुवर्णसलिल नामक तीर्थमें स्नानकर सुवर्णका दान करनेसे मनुष्य सुवर्णमय विमानसे जाकर रुद्रलोकमें पूजित होता है। फिर वह समयानुसार स्वर्गसे च्युत होनेपर पराक्रमी राजा होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् इक्षु नदीके सङ्गमपर जाना चाहिये। यह दिव्य तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ शिवजी सदा उपस्थित
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