भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 808

७९८ * मत्स्यपुराण *

तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्।<br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५०<br>आजन्म जनितं पापं स्नानमात्राद् व्यपोहति।<br>लिङ्गसारं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ५१<br>गोसहस्रफलं तस्य रुद्रलोके महीयते।<br>भङ्कतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५२<br>तत्र गत्वा तु राजेन्द्र स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सप्तजन्मकृतैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः॥ ५३रहते हैं। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव गणाधिपतिका स्थान प्राप्त कर लेता है। तदुपरान्त स्कन्द-तीर्थकी यात्रा करे। यह तीर्थ सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करनेमात्रसे मानव जन्मभरके किये हुए पापोंसे छूट जाता है। इसके बाद लिङ्गसार-तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। इससे उसे एक हजार गौओंके दानका फल मिलता है और वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर सभी पापोंके विनाशक भङ्कतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव सात जन्मोंमें किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ४२-५३॥
वटेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ५४<br>संगमेशं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>स्नानमात्रान्नरस्तत्र चेन्द्रत्वं लभते ध्रुवम्॥ ५५<br>कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं परम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः॥ ५६<br>तत्र तीर्थं समासाद्य दत्त्वा दानं तु यो नरः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ ५७<br>अथ नारी भवेत् काचित्तत्र स्नानं समाचरेत्।<br>गौरीतुल्या भवेत् सापि त्विन्द्रपत्नी न संशयः॥ ५८<br>अङ्गारेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते॥ ५९<br>अङ्गारकचतुर्थ्यां तु स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं शुचिः प्रयतमानसः॥ ६०<br>अयोनिसम्भवे स्नात्वा न पश्येद् योनिसंकटम्।<br>पाण्डवेशं तु तत्रैव स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ६१<br>अक्षयं मोदते कालमवध्यस्त्रिदशैरपि।<br>विष्णुलोकं ततो गत्वा क्रीडते भोगसंयुतः॥ ६२<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् मर्त्यराजोऽभिजायते।<br>कठेश्वरं ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६३<br>उत्तरायणसम्प्राप्तौ यदिच्छेत् तस्य तद्भवेत्।तदनन्तर सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ वटेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। तत्पश्चात् सभी देवोंद्वारा नमस्कृत सङ्गमेश-तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान-मात्रसे मनुष्य निश्चित ही इन्द्र-पदको प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्यकी प्राप्ति करता है—इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें आकर जो मनुष्य दान देता है, उसका सब कुछ उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। यदि वहाँ कोई स्त्री स्नान करती है तो वह निःसंदेह गौरी अथवा इन्द्र-पत्नी शचीके समान हो जाती है। इसके बाद अङ्गारेश-तीर्थकी यात्रा करके वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो मनुष्य पवित्र एवं संयत-मन होकर अङ्गारक-चतुर्थीके दिन वहाँ स्नान करता है, वह अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। अयोनिसम्भव नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको योनिसंकटका दर्शन नहीं होता। वहीं पाण्डवेश-तीर्थ है, उसमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह देवताओंसे भी अवध्य होकर अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है और मरणोपरान्त विष्णुलोकमें जाकर भोगसे परिपूर्ण हो क्रीड़ा करता है तथा वहाँ उत्तम भोगोंका भोग कर मृत्युलोकमें राजा होता है। इसके बाद उत्तरायण आनेपर कठेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मानव जो इच्छा करता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है॥ ५४-६३ ½॥
चन्द्रभागां ततो गच्छेत् तत्र स्नानं समाचरेत्॥ ६४राजन्! इसके बाद चन्द्रभागा नदीपर जाकर वहाँ