भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 809
* अध्याय १९१ *७९९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नातमात्रो नरो राजन् सोमलोके महीयते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्॥ ६५<br>पूजितं देवराजेन देवैरपि नमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दानं दत्त्वा तु काञ्चनम्॥ ६६<br>अथवा नीलवर्णाभं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>वृषभस्य तु रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च॥ ६७<br>तावद्वर्षसहस्राणि नरो हरपुरे वसेत्।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान्॥ ६८<br>अश्वानां श्वेतवर्णानां सहस्त्राणां नराधिप।<br>स्वामी भवति मर्त्येषु तस्य तीर्थप्रभावतः॥ ६९<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजंस्तर्पयेत् पितृदेवताः॥ ७०<br>उपोष्‍य रजनीमेकां पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>कन्यागते तथाऽऽदित्ये अक्षयं स्यान्नराधिप॥ ७१<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् कपिलां यः प्रयच्छति॥ ७२<br>सम्पूर्णपृथिवीं दत्त्वा यत्फलं तदवाप्नुयात्।<br>नर्मदेशं परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति॥ ७३<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्॥ ७४<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत्।<br>तत्र सर्वोद्यतो राजा पृथिव्यामेव जायते॥ ७५<br>सर्वलक्षणसम्पूर्णः सर्वव्याधिविवर्जितः।<br>नार्मदे चोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्॥ ७६<br>आदित्यायतनं दिव्यमीश्वरेण तु भाषितम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दानं दत्त्वा तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण दत्तं भवति चाक्षयम्॥ ७७<br>दरिद्रा व्याधिनो ये तु ये तु दुष्कृतकर्मिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं तु यान्ति ते॥ ७८<br>माघमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षस्य सप्तमी।<br>वसेदायतने तत्र निराहारो जितेन्द्रियः॥ ७९स्नान करे। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! इसके बाद इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। वह तीर्थ साक्षात् देवराजद्वारा पूजित तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा वन्दित है। राजन्! वहाँ स्नानकर जो मनुष्य सुवर्णका दान देता है अथवा नीलवर्णवाले वृषभका उत्सर्ग करता है तो वह वृषभके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक अपने कुलमें उत्पन्न संततिके साथ शिवपुरमें निवास करता है। इसके बाद स्वर्गसे गिरनेपर वह पराक्रमी राजा होता है। नराधिप! उस तीर्थके प्रभावसे मृत्युलोकमें आकर वह श्वेतवर्णवाले हजारों अश्वोंका स्वामी होता है। राजन्! तदनन्तर ब्रह्मावर्त नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिये। नरेश्वर! सूर्यके कन्याराशिमें स्थित होनेपर जो वहाँ एक रात उपवास करके विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसका वह कर्म अक्षय हो जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर जो मनुष्य कपिला गौका दान करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मिल जाता है। नर्मदेश उत्तम तीर्थस्थान है। इसके समान तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजन्! उस तीर्थमें स्नानकर मानव अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर श्रेष्ठ सङ्गमेश्वर-तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य सभी यज्ञोंके फलको प्राप्त करता है और वह पृथ्वीपर सभी प्रकारके उद्यमोंसे सम्पन्न, सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा सभी प्रकारकी व्याधियोंसे रहित राजा होता है॥ ६४—७५ १/२॥<br><br>नर्मदाके उत्तर तटपर अत्यन्त मनोहर आदित्यायतन नामक दिव्य तीर्थ है, ऐसा महादेवजीने कहा है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें स्नान करके जो यथाशक्ति दान देता है, उसका वह दान उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो दरिद्र, रोगग्रस्त और दुष्कर्मी हैं, वे भी (यहाँ स्नान करनेसे) सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको चले जाते हैं। जो मनुष्य माघमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि आनेपर इन्द्रियोंका संयम कर और निराहार रहकर इस आदित्यायतन तीर्थमें निवास करता है, वह