मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ८०० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न जराव्यथितो मूको न चान्धो बधिरोऽथवा।<br>सुभगो रूपसम्पन्नः स्त्रीणां भवति वल्लभः॥ ८०<br>एवं तीर्थं महापुण्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>ये न जानन्ति राजेन्द्र वञ्चितास्ते न संशयः॥ ८१<br>गर्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात्॥ ८२<br>मोदते स्वर्गलोकस्थो यावदिन्द्राश्चतुर्दश।<br>समीपतः स्थितं तस्य नागेश्वरतपोवनम्॥ ८३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नागलोकमवाप्नुयात्।<br>बह्वीभिर्नागकन्याभिः क्रीडते कालमक्षयम्॥ ८४<br>कुबेरभवनं गच्छेत् कुबेरो यत्र संस्थितः।<br>कालेश्वरं परं तीर्थं कुबेरो यत्र तोषितः॥ ८५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वसम्पदमाप्नुयात्। | न तो वृद्धावस्था और रोगसे ही ग्रस्त होता है, न गूँगा, अंधा अथवा बहरा ही होता है, अपितु भाग्यशाली, रूपवान् और स्त्रियोंका प्रिय होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मार्कण्डेयजीने इस महान् पुण्यदायक तीर्थका वर्णन किया था। जो उस तीर्थको नहीं जानते, वे निःसंदेह वञ्चित ही हैं। इसके बाद गर्गेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे ही मानव स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है और चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक वह स्वर्गमें आनन्दपूर्वक निवास करता है। राजेन्द्र! उसीके समीपमें नागेश्वर नामक तपोवन है। वहाँ स्नानकर मनुष्य नागलोकको प्राप्त करता है और अनेकों नागकन्याओंके साथ अक्षय कालतक क्रीडा करता है। तदनन्तर कुबेरभवनमें जाय, जहाँ कुबेर विराजमान रहते हैं। जहाँ कुबेर सन्तुष्ट हुए थे। वह कालेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। राजेन्द्र! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं॥ ७६-८५ १/२॥ |
| ततः पश्चिमतो गच्छेन्मारुतालयमुत्तमम्॥ ८६<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा समाहितः।<br>काञ्चनं तु ततो दद्याद् यथाशक्ति सुबुद्धिमान्॥ ८७<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति। | तत्पश्चात् उससे पश्चिममें स्थित श्रेष्ठ मारुतालय-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजेन्द्र! जो बुद्धिमान् वहाँ स्नान करके पवित्र हो सावधानीपूर्वक यथाशक्ति सुवर्णका दान करता है, वह पुष्पकविमानद्वारा वायुलोकको चला जाता है। |
| यवतीर्थं ततो गच्छेन्माघमासे युधिष्ठिर॥ ८८<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>नक्तं भोज्यं ततः कुर्यान्न पश्येद् योनिसंकटम्॥ ८९ | युधिष्ठिर! तदुपरान्त माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको यवतीर्थमें जाकर स्नान करे और रातमें ही भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषको पुनः योनिसंकटका दर्शन नहीं करना पड़ता। |
| अहल्यातीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र ह्यप्सरोभिः प्रमोबते/प्रमोदते॥ ९०<br>अहल्या च तपस्तप्त्वा तत्र मुक्तिमुपागता। | इसके बाद अहल्यातीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव अप्सराओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। उस तीर्थमें अहल्याने तपस्या कर मुक्ति पायी थी। |
| चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी॥ ९१<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत्।<br>यत्र यत्र नरोत्पन्नो नरस्तत्र प्रियो भवेत्॥ ९२<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः। | चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथि एवं सोमवारको जो मनुष्य वहाँ अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-जहाँ जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ सभीका प्रिय होता है। वह दूसरे कामदेवके समान स्त्रियोंका प्रियपात्र एवं श्रीसम्पन्न होता है। |
| अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं रामस्य विश्रुतम्॥ ९३<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते। | श्रीरामके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। |
| सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९४<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं नृणाम्॥ ९५ | इसके बाद सोमतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे यही तीर्थ मनुष्यके सभी पापोंको नष्ट कर देता है। राजन्! |