भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 811
* अध्याय १९१ *८०१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम्।<br>यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ ९६<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति।<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि ह्यनाशके॥ ९७<br>सोमतीर्थे मृतो यस्तु नासौ मर्त्येऽभिजायते।महान् फल देनेवाला यह सोमतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। नराधिप! उस तीर्थमें जो चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सभी पापोंसे विशुद्ध होकर सोमलोकको चला जाता है। जो अग्निमें प्रवेश कर, जलमें डूबकर या भोजनका परित्याग कर इस सोमतीर्थमें प्राणका त्याग करता है, वह पुनः मृत्युलोकमें जन्म नहीं ग्रहण करता॥ ९६–९७ १/२॥
शुभतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९८<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोके तु महीयते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्॥ ९९<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णुस्थानमनुत्तमम्।<br>असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः॥ १००<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०१<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>हरिणी व्याधसंत्रस्ता पतिता यत्र सा मृगी॥ १०२<br>जले प्रक्षिप्तगात्रा तु अन्तरिक्षं गता च सा।<br>व्याधो विस्मितचित्तस्तु परं विस्मयमागतः॥ १०३<br>तेन तापेश्वरं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ १०४<br>अमोहकमिति ख्यातं पितॄंश्चैवात्र तर्पयेत्।<br>पौर्णमास्याममायां तु श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि॥ १०५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृपिण्डं तु दापयेत्।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये प्रतिष्ठिता॥ १०६<br>तस्यां तु दापयेत् पिण्डं वैशाख्यां तु विशेषतः।<br>तृप्यन्ति पितरस्तत्र यावत् तिष्ठति मेदिनी॥ १०७<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र सिद्धेश्वरमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गणपत्यन्तिकं व्रजेत्॥ १०८तदनन्तर शुभतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य गोलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सर्वोत्तम विष्णूतीर्थकी यात्रा करे। विष्णुका यह सर्वश्रेष्ठ स्थान योधनीपुरके नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था, इसी कारण यह तीर्थस्थान बन गया। यहाँ जानेसे विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे यह ब्रह्महत्याके पापको नष्ट कर देता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ तापसेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ व्याधके भयसे डरी हुई मृगी गिर पड़ी थी और जलमें शरीरका परित्याग कर अन्तरिक्षमें चली गयी थी। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए व्याधको महान् विस्मय हुआ। इसी कारण इसका नाम तापेश्वरतीर्थ हुआ। इसके समान दूसरा तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ब्रह्मतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यह तीर्थ अमोहक नामसे भी प्रसिद्ध है। यहाँ पितरोंका तर्पण तथा पूर्णिमा और अमावास्याको यथाविधि श्राद्ध करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्यको पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वहाँ जलमें गजके आकारकी एक शिला प्रतिष्ठित है। उसी शिलापर विशेषतया वैशाखकी पूर्णिमाको पिण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे जबतक पृथ्वी स्थित रहती है, तबतक पितृगण तृप्त बने रहते हैं। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ सिद्धेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य गणपति के समीप पहुँच जाता है॥ ९८–१०८॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते॥ १०९राजेन्द्र! तत्पश्चात् जनार्दन-लिङ्गकी यात्रा करे। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें पूजित होता है।
नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>कामदेवः स्वयं तत्र तपोऽतप्यत वै महत्॥ ११०नर्मदाके दक्षिण तटपर परम रमणीय कुसुमेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्वयं कामदेवने कठोर तपस्या की थी। उसने एक