भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८९४ * मत्स्यपुराण *

| यथाशक्त्या च राजेन्द्र ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ २५<br>नर्मदाया जलं पीत्वा ह्यर्चयित्वा वृषध्वजम्।<br>दुर्गतिं च न पश्यन्ति तस्य तीर्थप्रभावतः॥ २६<br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो व्रजेद् वै यत्र शंकरः।<br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २७<br>हंसयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च हिमवांश्च महोदधिः॥ २८<br>गङ्गाद्याः सरितो यावत् तावत् स्वर्गे महीयते।<br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २९<br>गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायते पुमान्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र आषाढीतीर्थमुत्तमम्॥ ३० | राजेन्द्र! उसका वह सभी कर्म उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। जो लोग नर्मदाका जल पीकर शिवजीकी पूजा करते हैं, उन्हें उस तीर्थके प्रभावसे दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। जो इस तीर्थमें आकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर शंकरजीके समीप चला जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (करके प्राण-त्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है तथा जबतक चन्द्रमा, सूर्य, हिमालय, महासागर और गङ्गा आदि नदियाँ हैं, तबतक स्वर्गमें पूजित होता है। नराधिप! जो पुरुष उस तीर्थमें अनशन करता है, राजेन्द्र! वह पुनः गर्भमें वास नहीं करता॥१८—२९ ½॥ | | तत्र स्नात्वा नरो राजन्निन्द्रस्यार्धासनं लभेत्।<br>स्त्रियास्तीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम्॥ ३१<br>तत्रापि स्नातमात्रस्य ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः।<br>ऐरण्डीनर्मदयोश्च संगमं लोकविश्रुतम्॥ ३२<br>तच्च तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>उपवासपरो भूत्वा नित्यव्रतपरायणः॥ ३३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्॥ ३४<br>जामदग्न्यमिति ख्यातं सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>यत्रेष्ट्वा बहुभिर्यज्ञैरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत्॥ ३५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३६<br>पश्चिमस्योदधेः संधौ स्वर्गद्वारविघट्टनम्।<br>तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ ३७<br>आराधयन्ति देवेशं त्रिसंध्यं विमलेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३८<br>विमलेशात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>तत्रोपवासं कृत्वा ये पश्यन्ति विमलेश्वरम्॥ ३९<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा यान्ति शिवालयम्। | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ आषाढ़ीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य इन्द्रके आधे आसनको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् सभी पापोंके विनाशक स्त्री-तीर्थमें जाय। वहाँ भी स्नानमात्रसे निश्चय ही गाणेश्वरी गति प्राप्त होती है। ऐरण्डी और नर्मदाका संगम लोकप्रसिद्ध तीर्थ है, वह अतिशय पुण्यदायक तथा सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। राजेन्द्र! वहाँ उपवास और नित्य व्रतोंका सम्पादन करते हुए स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नर्मदा और समुद्रके संगमपर जाना चाहिये, जो जामदग्न्य नामसे प्रसिद्ध है। इसी तीर्थमें जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी तथा इन्द्र अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान कर देवताओंके अधीश्वर हुए। राजेन्द्र! उस नर्मदा और सागरके सङ्गममें स्नान कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञसे तिगुना फल प्राप्त करता है। पश्चिम समुद्रके संधि-स्थानपर स्वर्गद्वारविघट्टन तीर्थ है, वहाँ देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण तीनों संध्याओंमें विमलेश्वर महादेवकी आराधना करते हैं। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव रुद्रलोकमें पूजित होता है। विमलेश्वरसे बढ़कर तीर्थ न हुआ है और न होगा। उस तीर्थमें उपवास कर जो विमलेश्वरका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर शिवपुरीमें जाते हैं॥३०—३९ ½॥ |