मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १९४ * | ८१५ |
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| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कौशिकीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४०<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः ।<br>उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः ॥ ४१<br><br>एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया ।<br>सर्वतीर्थाभिषेकं तु यः पश्येत् सागरेश्वरम् ॥ ४२<br><br>योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नावर्ते संस्थितः शिवः ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न संशयः ॥ ४३<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्रः स गच्छति ।<br>नर्मदासंगमं यावद् यावच्चामरकण्टकम् ॥ ४४<br><br>अत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्मृताः ।<br>तीर्थात्तीर्थान्तरं यत्र ऋषिकोटिनिषेवितम् ॥ ४५<br><br>साग्निहोत्रैस्तु विद्वद्भिः सर्वैर्ध्यानपरायणैः ।<br>सेविनानेन राजेन्द्र त्वीप्सितार्थप्रदायिका ॥ ४६<br><br>यस्त्विदं वै पठेन्नित्यं शृणुयाद् वापि भावतः ।<br>तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिषिञ्चन्ति पाण्डव ॥ ४७<br><br>नर्मदा च सदा प्रीता भवेद् वै नात्र संशयः ।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् रुद्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ४८<br><br>वन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुर्भगा सुभगा भवेत् ।<br>कन्या लभेत भर्तारं यश्च वाञ्छेत् तु यत्फलम् ।<br>तदेव लभते सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ४९<br><br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत् ।<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम् ॥ ५०<br><br>मूर्खस्तु लभते विद्यां त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।<br>नरकं च न पश्येत् तु वियोगं च न गच्छति ॥ ५१ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ कौशिकीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ उपवासपूर्वक स्नान करने और नियमित भोजन करके एक रात निवास करनेसे मनुष्य इस तीर्थके प्रभावसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। जो सागरेश्वरका दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है। वहाँसे एक योजनके भीतर वर्तुलस्थानमें शिवजी संस्थित हैं, अतः उनका दर्शन कर लेनेसे सभी तीर्थोंका दर्शन हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। वह मानव सभी पापोंसे मुक्त होकर जहाँ रुद्र रहते हैं, वहाँ चला जाता है। महाराज! नर्मदा-सङ्गमसे लेकर अमरकण्टकके मध्यमें दस करोड तीर्थ बतलाये जाते हैं। वहाँ एक तीर्थसे दूसरे तीर्थके मध्यमें करोड़ों ऋषिगण निवास करते हैं। राजेन्द्र! सभी ध्यानपरायण अग्निहोत्री विद्वानोंद्वारा सेवित यह तीर्थ-परम्परा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है। पाण्डव! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इन तीर्थोंका पाठ करता है या श्रवण करता है, उसे सभी तीर्थोंमें अभिषेक करनेका फल प्राप्त होता है और उसपर नर्मदा सदा प्रसन्न होती है—इसमें संदेह नहीं है। साथ ही उसपर महामुनि मार्कण्डेय एवं रुद्र प्रसन्न होते हैं। (इस तीर्थके प्रभावसे) वन्ध्याको पुत्रकी प्राप्ति होती है, अभागिनी सौभाग्यवती हो जाती है, कन्या पतिको प्राप्त करती है तथा अन्य जो कोई जिस फलको चाहता है, उसे वह सब फल प्राप्त हो जाता है—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। ब्राह्मण वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन प्राप्त करता है और शूद्रको अच्छी गति प्राप्त होती है तथा मूर्ख विद्याको प्राप्त करता है। जो मनुष्य तीनों संध्याओंमें इसका पाठ करता है उसे न तो नरकका दर्शन होता है और न प्रियजनोंका वियोग ही प्राप्त होता है॥ ४०–५१ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्यं नाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९४॥