भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 827
* अध्याय १९५ *८१७
तस्यामस्य सुता जाता देवा द्वादश याज्ञिकाः।<br>भुवनो भौवनश्चैव सुजन्यः सुजनस्तथा॥ १२<br>ऋतुर्वसुश्च मूर्धा च त्याज्यश्च वसुदश्च ह।<br>प्रभवश्चाव्ययश्चैव दक्षोऽथ द्वादशस्तथा॥ १३<br>इत्येते भृगवो नाम देवा द्वादश कीर्तिताः।<br>पौलोम्यां जनयद् विप्रान् देवानां तु कनीयसः॥ १४<br>च्यवनं तु महाभागमाप्नुवानं तथैव च।<br>आप्नुवानात्मजश्चौर्वो जमदग्निस्तदात्मजः॥ १५<br>और्वो गोत्रकरस्तेषां भार्गवाणां महात्मनाम्।<br>तत्र गोत्रकरान् वक्ष्ये भृगोर्वै दीप्ततेजसः॥ १६<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च वात्स्यो दण्डिर्नडायनः॥ १७<br>वैगायनो वीतिहव्यः पैलश्चात्र शौनकः।<br>शौनकायनजीवन्विरायेदः कार्षिणिस्तथा॥ १८<br>वैहीनरिर्विरूपाक्षो रौहित्यायनिरेव च।<br>वैश्वानरिस्तथा नीलो लुब्धः सावर्णिकश्च सः॥ १९<br>विष्णुः पौरोऽपि बालाकिरैलिकोऽनन्तभागिनः।<br>मृगमार्गेयमार्केण्डजविनो नीतिनस्तथा॥ २०<br>मण्डमाण्डव्यमाण्डूकफेनपाः स्तनितस्तथा।<br>स्थलपिण्डः शिखावर्णः शार्कराक्षिस्तथैव च॥ २१<br>जालधिः सौधिकः क्षुभ्यः कुत्सोऽन्यो मौद्गलायनः।<br>माङ्कायनो देवपतिः पाण्डुरोचिः सगालवः॥ २२<br>सांस्कृत्यश्चातकिः सर्पिर्यज्ञपिण्डायनस्तथा।<br>गार्ग्यायणो गायनश्च ऋषिर्गार्हायणस्तथा॥ २३<br>गोष्ठायनो वाह्रायनो वैशम्पायन एव च।<br>वैकणिर्निः शार्ङ्गरवो याज्ञेयिर्भ्राष्ट्रकायणिः॥ २४<br>लालाटिर्नाकुलिश्चैव लौक्षिण्योपरिमण्डलौ।<br>आलुकिः सौचकिः कौत्सस्तथान्यः पैङ्गलायनिः॥ २५<br>सात्यायनिर्मलयनिः कौटिलिः कौचहस्तिकः।<br>सौहः सोक्तिः सकौवाक्षिः कौसिश्चान्द्रमसिस्तथा॥ २६<br>नैकजिह्वो जिह्वकश्च व्याधाज्यो लौहवैरिणः।<br>शारद्वतिकनेतिष्यौ लोलाक्षिश्चलकुण्डलः॥ २७<br>वागायनिश्चानुमतिः पूर्णिमागतिकोऽसकृत्।<br>सामान्येन यथा तेषां पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २८<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २९उस पत्नीसे उनके यज्ञ करनेवाले बारह देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम हैं—भुवन, भौवन, सुजन्य, सुजन, क्रतु, वसु, मूर्धा, त्याज्य, वसुद, प्रभव, अव्यय तथा बारहवें दक्ष। इस प्रकार ये बारह 'देवभृगु' नामसे विख्यात हैं। इसके बाद भृगुने पौलोमीके गर्भसे देवताओंसे कुछ निम्नकोटिके ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—महाभाग्यशाली च्यवन और आप्नुवान। आप्नुवानके पुत्र और्व हैं। और्वके पुत्र जमदग्नि हुए॥५—१५॥<br><br>और्व उन महात्मा भार्गवोंके गोत्र-प्रवर्तक हुए। अब मैं दीप्त तेजस्वी भृगुके गोत्र-प्रवर्तकोंका वर्णन कर रहा हूँ—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व, जमदग्नि, वात्स्य, दण्डि, नडायन, वैगायन, वीतिहव्य, पैल, शौनक, शौनकायन, जीवन्ति, आयेद, कार्षिणि, वैहिनरि, विरूपाक्ष, रौहित्यायनि, वैश्वानरि, नील, लुब्ध, सावर्णिक, विष्णु, पौर, बालाकि, ऐलिक, अनन्तभागिन, मृग, मार्गेय, मार्केण्ड, जबिन, नीतिन, मण्ड, माण्डव्य, माण्डूक, फेनप,, स्तनित, स्थलपिण्ड, शिखावर्ण, शार्कराक्षि, जालधि, सौधिक, क्षुभ्य, कुत्स, मौद्लायन, माङ्कायन, देवपति, पाण्डुरोचि, गालव, सांकृत्य, चातकि, सर्पि, यज्ञपिण्डायन, गार्ग्यायण, गायन, गार्हायण, गोष्ठायन, बाह्रायन, वैशम्पायन, वैकर्णिनि, शार्ङ्गरव, याज्ञेयि, भ्राष्ट्रकायणि, लालाटि, नाकुलि, लौक्षिण्य, उपरिमण्डल, आलुकि, सौचकि, कौत्स, पँगलायनि, सात्यायनि, मलयनि, कौटिलि, कौचहस्तिक, सौह, सोक्ति, सकौवाक्षि, कौसि, चान्द्रमसि, नैकजिह्व, जिह्वक, व्याधाज्य, लौहवैरिण, शारद्वतिक, नेतिष्य, लोलाक्षि, चलकुण्डल, वागायनि, आनुमति, पूर्णिमागतिक और असकृत्। साधारणरूपसे इन ऋषियोंमें ये पाँच प्रवर कहे जाते हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व और जामदग्नि॥१६—२९॥