मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वन्यान् भृगूद्वहान्।<br>जमदग्निर्बिदश्चैव पौलस्त्यो बैजभृत् तथा॥ ३०<br>ऋषिश्चोभयजातश्च कायनिः शाकटायनः।<br>और्वेया मारुताश्चैव सर्वेषां प्रवराः शुभाः॥ ३१ | इसके बाद भृगुवंशमें उत्पन्न अन्य ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जमदग्नि, बिद, पौलस्त्य, बैजभृत, उभयजात, कायनि, शाकटायन, और्वेय और मारुत। इनके तीन शुभ प्रवर हैं— | | भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२ | भृगु, च्यवन और आप्नुवान। इन ऋषियोंमें परस्पर विवाहका निषेध है। | | भृगुदासो मार्गपथो ग्राम्यायणिकटायनी।<br>आपस्तम्बिस्तथा बिल्विर्नैकशिः कपिरेव च॥ ३३<br>आष्टिषेणो गार्दभिश्च कार्दमायनिरेव च।<br>आश्वायनिस्तथा रूपिः पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ३४<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>आष्टिषेणस्तथारूपिः प्रवराः पञ्च कीर्तिताः॥ ३५ | भृगुदास, मार्गपथ, ग्राम्यायणि,कटायनि, आपस्तम्बि, बिल्वि, नैकशि, कपि, आष्टिषेण, गार्दभि, कार्दमायनि, आश्वायनि तथा रूपि। इनके प्रवर ये पाँच हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, आष्टिषेण तथा रूपि। | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>यस्को वा वीतिहव्यो वा मथितस्तु तथा दमः॥ ३६ | इन पाँच प्रवरवालोंमें भी विवाहकर्म निषिद्ध है। यस्क, वीतिहव्य, मथित, | | जैवन्तायनिर्मौञ्जश्च पिलिश्चैव चलिस्तथा।<br>भागिलो भागवित्तिश्च कौशापिस्त्वथ काश्यपिः॥ ३७<br>बालपिः श्रमदागेपिः सौरस्तिथिस्तथैव च।<br>गार्गीयस्त्वथ जाबालिस्तथा पौष्णायनो ह्यृषिः॥ ३८<br>रामोदश्च तथैतेषामार्षेयाः प्रवरा मताः।<br>भृगुश्च वीतिहव्यश्च तथा रैवसवैवसौ॥ ३९ | दम, जैवन्तायनि, मौञ्ज, पिलि, चलि, भागिल, भागवित्ति, कौशापि, काश्यपि, बालपि, श्रमदागेपि, सौर, तिथि, गार्गीय, जाबालि, पौष्णायन और रामोद। इन वंशोंमें ये प्रवर हैं—भृगु, वीतिहव्य, रेवस और वैवस। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते। | | परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शालायनिः शाकटाक्षो मैत्रेयः खाण्डवस्तथा॥ ४०<br>द्रौणायनो रौक्मायणिरापिशिश्चापिकायनिः।<br>हंसजिह्वस्तथैतेषां मार्षेयाः प्रवरा मताः॥ ४१ | शालायनि, शाकटाक्ष, मैत्रेय, खाण्डव, द्रौणायन, रौक्मायणि, आपिशि, आपिकायनि और हंसजिह्व। इनके प्रवर इन ऋषियोंके हैं— | | भृगुश्चैवाथ वध्र्यश्वो दिवोदासस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२ | भृगु, वध्र्यश्व और दिवोदास। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। | | एकायनो यज्ञपतिर्मत्स्यगन्धस्तथैव च।<br>प्रत्यहश्च तथा सौरिश्चौक्षिश्चैवं कार्दमायनिः॥ ४३<br>तथा गृत्समदो राजन् सनकश्च महर्षिः।<br>प्रवरास्तु तथोक्तानामार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ ४४ | राजन्! एकायन, यज्ञपति, मत्स्यगन्ध, प्रत्यह, सौरि, ओक्षि, कार्दमायनि, गृत्समद और महर्षि सनक। इन वंशोंके दो ऋषियोंके प्रवर हैं— | | भृगुर्गृत्समदश्चैव आर्षेवेतौ प्रकीर्तितौ।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ४५ | भृगु तथा गृत्समद। इन वंशोंमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। |