भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 829

* अध्याय १९६ * ८१९

एते तवोक्ता भृगुवंशजाता<br>महानुभावा नृप गोत्रकाराः।<br>एषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं विजहाति जन्तुः॥ ४६राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे भृगुवंशमें उत्पन्न महानुभाव गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंका कीर्तन करनेसे प्राणी सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ३०—४६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भृगुवंशप्रवरकीर्तनं नाम पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भृगुवंशप्रवरवर्णन नामक एक सौ पञ्चानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९५॥


एक सौ छानबेवाँ अध्याय

प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन

मत्स्य उवाच
मरीचितनया राजन् सुरूपा नाम विश्रुता।<br>भार्या चाङ्गिरसो देवास्तस्याः पुत्रा दश स्मृताः॥ १<br>आत्मायुर्दमनो दक्षः सदः प्राणस्तथैव च।<br>हविष्मांश्च गविष्ठश्च ऋतः सत्यश्च ते दश॥ २<br>एते चाङ्गिरसो नाम देवा वै सोमपायिनः।<br>सुरूपा जनयामास ऋषीन् सर्वेश्वरानिमान्॥ ३<br>बृहस्पतिं गौतमं च संवर्तमृषिमुत्तमम्।<br>उतथ्यं वामदेवं च अजस्यमृषिंजं तथा॥ ४<br>इत्येते ऋषयः सर्वे गोत्रकाराः प्रकीर्तिताः।<br>तेषां गोत्रसमुत्पन्नान् गोत्रकारान् निबोध मे॥ ५<br>उतथ्यो गौतमश्चैव तौलेयोऽभिजितस्तथा।<br>सार्धनेमिः सलौगाक्षिः क्षीरः कौष्टिकिरेव च॥ ६<br>राहुकर्णिः सौपुरिश्च कैरातिः सामलोमकिः।<br>पौषाजितिर्भार्गवतो हृषिश्चैरीडवस्तथा॥ ७<br>कारोटकः सजीवी च उपबिन्दुसुरैषिणौ।<br>वाहिनीपतिवैशाली क्रोष्टा चैवारुणायनिः॥ ८<br>सोमोऽत्रायनिकासोरुकौशल्याः पार्थिवस्तथा।<br>रौहिण्यायनिरेवाग्नी मूलपः पाण्डुरेव च॥ ९<br>क्षपाविश्वकरोऽरिश्च पारिकारारिरेव च।<br>आर्षेयाः प्रवराश्चैव तेषां च प्रवराञ्शृणु॥ १०<br>अङ्गिराः सुवचोतथ्य उशिजश्च महर्षिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ११**मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! महर्षि मरीचिकी कन्या सुरूपा नामसे विख्यात थी। वह महर्षि अङ्गिराकी पत्नी थी। उसके दस देव-तुल्य पुत्र थे। उनके नाम हैं—आत्मा, आयु, दमन, दक्ष, सद, प्राण, हविष्मान्, गविष्ठ, ऋत और सत्य। ये दस अङ्गिराके पुत्र सोमरसके पान करनेवाले देवता माने गये हैं। सुरूपाने इन सर्वेश्वर ऋषियोंको उत्पन्न किया था। बृहस्पति, गौतम, ऋषिश्रेष्ठ संवर्त, उतथ्य, वामदेव, अजस्य तथा ऋषिज—ये सभी ऋषि गोत्रप्रवर्तक कहे गये हैं। अब इनके गोत्रोंमें उत्पन्न हुए गोत्रप्रवर्तकोंको मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। उतथ्य, गौतम, तौलेय, अभिजित, सार्धनेमि, सलौगाक्षि, क्षीर, कौष्ठिकि, राहुकर्णि, सौपुरि, कैराति, सामलोमकि, पौषाजिति, भार्गवत, चैरीडव, कारोटक, सजीवी, उपबिन्दु, सुरैषिण, वाहिनीपति, वैशाली, क्रोष्टा, आरुणायनि, सोम, अत्रायनि, कासोरु, कौशल्य, पार्थिव, रौहिण्यायनि, रेवाग्नि, मूलप, पाण्डु, क्षपा, विश्वकर, अरि और पारिकारारि—ये सभी श्रेष्ठ ऋषि गोत्रप्रवर्तक हैं। अब इनके प्रवरोंको सुनिये—अङ्गिरा सुवचोतथ्य तथा महर्षि उशिज। इन ऋषियोंके वंशवाले आपसमें विवाह नहीं करते थे॥ १—११॥