भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 856

८४६ | * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मञ्जरीं सहकारस्य कान्ताचञ्च्वाग्रखण्डिताम्।<br>स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा वने॥ ११वनमें तरुण पुंस्कोकिल अनेक पुष्पोंके रहते हुए भी अपनी प्रियतमाकी चोंचके अग्रभागसे खण्डित हुई आम्र-मञ्जरीका स्वाद ले रहा है।
काकः प्रसूतां वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चञ्चुना।<br>काकीं सम्भावयत्येष पक्षाच्छादितपुत्रिकाम्॥ १२कौआ वृक्षके अग्रभागपर बैठकर पंखोंसे बच्चेको छिपाकर बैठी हुई अपनी प्रसूता पत्नीको चोंचके अग्रभागसे आनन्दित कर रहा है।
भूभागं निम्नमासाद्य दयितासहितो युवा।<br>नाहारमपि चादत्ते कामाक्रान्तः कपिंजलः॥ १३अपनी पत्नीके साथ कामदेवसे अभिभूत हुआ तरुण कपिंजल (तीतर) निचले भूभागपर बैठा हुआ आहार भी नहीं ग्रहण कर रहा है।
कलविंकस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्गं समास्थितः।<br>मुहुर्मुहुर्विशालाक्षि उत्कण्ठयति कामिनः॥ १४विशालनेत्रे ! चटक (गौरैया) अपनी प्रियाकी गोदमें स्थित हो बारम्बार रमण करता हुआ कामीजनॉंको उत्कण्ठित कर रहा है।
वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया।<br>भरेण लम्बयञ् शाखां करोति सफलामिव॥ १५अपनी प्रियाके साथ वृक्षकी डालीपर बैठा हुआ यह शुक पंजेसे शाखाको खींचता हुआ उसे फलयुक्त-सा कर रहा है।
वनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः।<br>शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी॥ १६इस वनमें मांसाहारसे तृप्त युवा सिंह निद्रामें लीन हो सो रहा है और उसकी प्रियतमा उसके पैरोंके मध्यभागमें शयन कर रही है।
व्याघ्रयोर्मिथुनं पश्य शैलकन्दरसंस्थितम्।<br>ययोर्नेत्रप्रभालोके गुहा भिन्नेव लक्ष्यते॥ १७पर्वतकी कन्दरामें बैठे हुए व्याघ्र-दम्पतिको देखो, जिनके नेत्रोंकी कान्तिसे गुफा भिन्न-सी दिखायी दे रही है।
अयं द्वीपी प्रियां लेढि जिह्वाग्रेण पुनः पुनः।<br>प्रीतिमायाति च तया लिह्यमानः स्वकान्तया॥ १८यह गैंडा अपनी प्रियाको जीभके अग्रभागसे बारम्बार चाट रहा है और अपनी उस प्रियाद्वारा चाटे जानेपर आनन्दका अनुभव कर रहा है।
उत्सङ्गकृतमूर्धानं निद्रापहृतचेतसम्।<br>जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी॥ १९वह वानरी अपनी गोदमें सिर रखकर गाढ़ निद्रामें सोते हुए पतिको जूक आदि जन्तुओंको निकालकर सुख दे रही है।
भूमौ निपतितां रामां मार्जारो दर्शितोदरीम्।<br>नखैर्दन्तैर्दशत्येष न च पीडयते तथा॥ २०वह बिडाल पृथ्वीपर लेटकर पेटको दिखाती हुई अपनी प्रियतमाको नखों और दाँतोंसे काट रहा है, परंतु वास्तवमें वह पीड़ा नहीं दे रहा है॥ ११–२०॥
शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे।<br>संलीनगात्रचरणे कर्णैर्व्यक्तिमुपागते॥ २१ये खरगोश-दम्पति पीड़ित होकर अपने पैरोंको शरीरमें छिपाकर सो रहे हैं। ये कानोंद्वारा ही जाने जा सकते हैं।
स्नात्वा सरसि पद्माढ्ये नागस्तु मदनप्रियः।<br>सम्भावयति तन्वङ्गि मृणालकवलैः प्रियाम्॥ २२सूक्ष्माङ्गि ! कामार्त हाथी कमलयुक्त सरोवरमें स्नान कर कमल-डंठलोंके ग्रासोंसे प्रियाको संतुष्ट कर रहा है।
कान्तप्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी।<br>करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा॥ २३पीछे-पीछे चलनेवाले अपने बच्चोंसे घिरी हुई शूकरी प्रियतमके मार्गपर चलती हुई प्रियतमके द्वारा उखाड़े गये मोथोंको खाती जा रही है।
दृढाङ्गसंधिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने।<br>अनुव्रजति धावन्तीं प्रियामुद्धतमुत्सुकः॥ २४इस वनमें दृढ़ अङ्गोंवाला एवं शरीरमें कीचड़ पोते हुए कामार्त महिष भागती हुई प्रियाके पीछे दौड़ रहा है।
पश्य चार्वङ्गि सारङ्गं त्वं कटाक्षविभावनैः।<br>सभार्यं मां हि पश्यन्तं कौतूहलसमन्वितम्॥ २५सुन्दरि! अपनी प्रियाके सहित इस मृगको देखो, जो कुतूहलवश मुझे मनोहर कटाक्षोंसे देख रहा है।
पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम्।<br>स्नेहार्द्रभावात् कर्षन्ती भर्तारं शृङ्गकोटिना॥ २६देखो, वह मृगी स्नेहयुक्त हो अपने सींगोंके अग्रभागसे प्रियतमको ढकेलती हुई पिछले पैरसे मुखको खुजला रही है। अरे, उस