मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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* अध्याय २१५ * ८५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सुरूपस्तरुणः प्रांशुर्दृढभक्तिः कुलोचितः।<br>शूरः क्लेशसहश्चैव खड्गधारी प्रकीर्त्तितः॥ १८<br><br>शूरश्च बलयुक्तश्च गजाश्वरथकोविदः।<br>धनुर्धारी भवेद् राज्ञः सर्वक्लेशसहः शुचिः॥ १९<br><br>निमित्तशकुनज्ञानी हयशिक्षाविशारदः।<br>हयायुर्वेदतत्त्वज्ञो भुवो भागविचक्षणः॥ २०<br><br>बलाबलज्ञो रथिनः स्थिरदृष्टिः प्रियंवदः।<br>शूरश्च कृतविद्यश्च सारथिः परिकीर्तितः॥ २१ | सुन्दर आकृतिवाले, लम्बे कदवाले, राज्यभक्त, कुलीन, शूर-वीर तथा कष्टसहिष्णुको खड्गधारी बनाना चाहिये। शूर, बलवान्, हाथी, घोड़े और रथकी विशेषताको जाननेवाला, सभी प्रकारके क्लेशोंको सहन करनेमें समर्थ तथा पवित्र व्यक्ति राजाका धनुर्धारी हो सकता है। शुभाशुभ शकुनको जाननेवाला, अश्वशिक्षामें विशारद, अश्वोंके आयुर्वेदविज्ञानको जाननेवाला, पृथ्वीके समस्त भागोंका ज्ञाता, रथियोंके बलाबलका पारखी, स्थिरदृष्टि, प्रियभाषी, शूर-वीर तथा विद्वान् पुरुष सारथिके योग्य कहा गया है॥ १९-२१॥ |
| अनाहार्यः शुचिर्दक्षश्चिकित्सितविदां वरः।<br>सूपशास्त्रविशेषज्ञः सूदाध्यक्षः प्रशस्यते॥ २२<br><br>सूदशास्त्रविधानज्ञाः पराभेद्याः कुलोद्गताः।<br>सर्वे महानसे धार्याः कृत्तकेशनखा नराः॥ २३<br><br>समः शत्रौ च मित्रे च धर्मशास्त्रविशारदः।<br>विप्रमुख्यः कुलीनश्च धर्माधिकरणो भवेत्॥ २४<br><br>कार्यास्तथाविधास्तत्र द्विजमुख्याः सभासदः।<br>सर्वदेशाक्षराभिज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २५<br><br>लेखकः कथितो राज्ञः सर्वाधिकरणेषु वै।<br>शीर्षोपेतान् सुसम्पूर्णान् समश्रेणिगतान् समान्॥ २६<br><br>अक्षरान् वै लिखेद् यस्तु लेखकः स वरः स्मृतः।<br>उपायवाक्यकुशलः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २७<br><br>बह्वर्थवक्ता चाल्पेन लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>वाक्याभिप्रायतत्त्वज्ञो देशकालविभागवित्॥ २८<br><br>अनाहार्यो भवेत्सक्तो लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>पुरुषान्तरतत्त्वज्ञाः प्रांशवश्चाप्यलोलुपाः॥ २९<br><br>धर्माधिकारिणः कार्या जना दानकरा नराः।<br>एवंविधास्तथा कार्या राज्ञा दौवारिका जनाः॥ ३०<br><br>लोहवस्त्राजिनादीनां रत्नानां च विधानवित्।<br>विज्ञाता फल्गुसाराणामनाहार्यः शुचिः सदा॥ ३१<br><br>निपुणश्चाप्रमत्तश्च धनाध्यक्षः प्रकीर्तितः॥ ३२ | दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाले, पवित्र, प्रवीण, ओषधियोंके गुण-दोषोंको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, भोजनकी विशेषताओंके जानकारको उत्तम भोजनाध्यक्ष कहा जाता है। जो भोजनशास्त्रके विधानोंमें कुशल, वंश-परम्परासे चले आनेवाले, दूसरोंद्वारा अभेद्य तथा कटे हुए नख-केशवाले हों, ऐसे सभी पुरुषोंको चौकेमें नियुक्त करना चाहिये। शत्रु और मित्रमें समताका व्यवहार करनेवाले, धर्मशास्त्रमें विशारद, कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मणको धर्माध्यक्षका पद सौंपना चाहिये। ऊपर कही हुई विशेषताओंसे युक्त ब्राह्मणोंको सभासद् नियुक्त करना चाहिये। जो सभी देशोंकी भाषाओंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पटु हो, ऐसा व्यक्ति सभी विभागोंमें राजाका लेखक कहा गया है। जो ऊपरकी शिरोरेखासे पूर्ण, पूर्ण अवयववाले, समश्रेणीमें प्राप्त एवं समान आकृतिवाले अक्षरोंको लिखता है, वह अच्छा लेखक कहा जाता है। नृपश्रेष्ठ! जो उपाययुक्त वाक्योंमें प्रवीण, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें विशारद तथा थोड़े शब्दोंमें अधिक प्रयोजनकी बात कहनेकी क्षमता रखता हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। नृपोत्तम! जो वाक्योंके अभिप्रायको जाननेवाला, देश-कालके विभागका ज्ञाता तथा अभेदज्ञ यानी भेद न करनेवाला हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। मनुष्योंके हृदयकी बातों तथा भावोंको परखनेवाले, दीर्घकाय, निर्लोभ एवं दानशील व्यक्तियोंको धर्माधिकारी बनाना चाहिये तथा राजाद्वारा इसी प्रकारके लोगोंको द्वारपालका पद भी सौंपा जाना चाहिये। लोह, वस्त्र, मृग-चर्मादि तथा रत्नोंकी परख करनेवाला, अच्छी-बुरी वस्तुओंका जानकार, दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाला, पवित्र, निपुण एवं सावधान व्यक्तिको धनाध्यक्ष बनाना चाहिये॥ २२-३२॥ |
| आयद्वारेषु सर्वेषु धनाध्यक्षसमा नराः।<br>व्ययद्वारेषु च तथा कर्तव्याः पृथिवीक्षिता॥ ३३ | राजाद्वारा आय तथा व्ययके सभी स्थानोंपर धनाध्यक्षके समान गुणवाले पुरुषोंको नियुक्त करना चाहिये। जो |