भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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८६० * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परम्परागतो यः स्यादष्टाङ्गे सुचिकित्सिते ।<br>अनाहार्यः स वैद्यः स्याद् धर्मात्मा च कुलोद्गतः ॥ ३४<br>प्राणाचार्यः स विज्ञेयो वचनं तस्य भूभुजा ।<br>राजन् राज्ञा सदा कार्यं यथा कार्यं पृथग्जनैः ॥ ३५<br>हस्तिशिक्षाविधानज्ञो वनजातिविशारदः ।<br>क्लेशक्षमस्तथा राज्ञो गजाध्यक्षः प्रशस्यते ॥ ३६<br>एतैरेव गुणैर्युक्तः स्थविरश्च विशेषतः ।<br>गजारोही नरेन्द्रस्य सर्वकर्मसु शस्यते ॥ ३७<br>हयशिक्षाविधानज्ञश्चिकित्सितविशारदः ।<br>अश्वाध्यक्षो महीभर्तुः स्वासनश्च प्रशस्यते ॥ ३८<br>अनाहार्यश्च शूरश्च तथा प्राज्ञः कुलोद्गतः ।<br>दुर्गाध्यक्षः स्मृतो राज्ञ उद्युक्तः सर्वकर्मसु ॥ ३९<br>वास्तुविद्याविधानज्ञो लघुहस्तो जितश्रमः ।<br>दीर्घदर्शी च शूरश्च स्थपतिः परिकीर्तितः ॥ ४०<br>यन्त्रमुक्ते पाणिमुक्ते विमुक्ते मुक्तधारिते ।<br>अस्त्राचार्यो निरुद्वेगः कुशलश्च विशिष्यते ॥ ४१<br>वृद्धः कुलोद्गतः सूक्तः पितृपैतामहः शुचिः ।<br>राज्ञामन्तःपुराध्यक्षो विनीतश्च तथेष्यते ॥ ४२वंशपरम्परासे आनेवाला, आठों अङ्गोंकी चिकित्साको अच्छी तरह जाननेवाला, स्वामिभक्त, धर्मात्मा एवं सत्कुलोत्पन्न हो, ऐसे व्यक्तिको वैद्य बनाना चाहिये। राजन्! उसे प्राणाचार्य जानना चाहिये और सर्वसाधारणकी भाँति उसके वचनोंका सदा पालन करना चाहिये। जो जंगली जातिवालोंके रीति-रस्मोंका ज्ञाता, हस्तिशिक्षाका विशेषज्ञ, सहिष्णुतामें समर्थ हो, ऐसा व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ गजाध्यक्ष हो सकता है। उपर्युक्त गुणोंसे युक्त तथा अवस्थामें वृद्ध व्यक्ति राजाका गजारोही होकर सभी कार्योंमें श्रेष्ठ कहा गया है। अश्व-शिक्षाके विधानमें प्रवीण, उनकी चिकित्सामें विशारद तथा स्थिर आसनसे बैठनेवाला व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ अश्वाध्यक्ष कहा गया है। जो स्वामि-भक्त, शूर-वीर, बुद्धिमान्, कुलीन, सभी कार्योंमें उद्यत हो, वह राजाका दुर्गाध्यक्ष कहा गया है। वास्तुविद्याके विधानमें प्रवीण, फुर्तीला, परिश्रमी, दीर्घदर्शी एवं शूर व्यक्तिको श्रेष्ठ कारीगर कहा गया है। यन्त्रमुक्त (तोप-बन्दूक) आदि, पाणिमुक्त (शक्ति आदि), विमुक्त, मुक्तधारित आदि अस्त्रोंके परिचालनकी विशेषताओंमें सुनिपुण, उद्वेगरहित व्यक्ति श्रेष्ठ अस्त्राचार्य कहा गया है। वृद्ध, सत्कुलोत्पन्न, मधुरभाषी, पिता-पितामहके समयसे उसी कार्यपर नियुक्त होनेवाले, पवित्र एवं विनीत व्यक्तिको राजाओंके अन्तःपुरके अध्यक्ष-पदपर नियुक्त करना उचित है॥ ३३—४२॥
एवं सप्ताधिकारेषु पुरुषाः सप्त ते पुरे ।<br>परीक्ष्य चाधिकार्याः स्यू राज्ञा सर्वेषु कर्मसु ।<br>स्थापनाजातितत्त्वज्ञाः सततं प्रतिजागृताः ॥ ४३<br>राज्ञः स्यादायुधागारे दक्षः कर्मसु चोद्यतः ।<br>कर्माण्यपरिमेयानि राज्ञो नृपकुलोद्वह ॥ ४४<br>उत्तमाधममध्यानि बुद्ध्वा कर्माणि पार्थिवः ।<br>उत्तमाधममध्येषु पुरुषेषु नियोजयेत् ॥ ४५<br>नरकर्मविपर्यासाद्राजा नाशमवाप्नुयात् ।<br>नियोगं पौरुषं भक्तिं श्रुतं शौर्यं कुलं नयम् ॥ ४६<br>ज्ञात्वा वृत्तिर्विधातव्या पुरुषाणां महीक्षिता ।<br>पुरुषान्तरविज्ञानतत्त्वसारनिबन्धनात् ॥ ४७इस प्रकार राजाको इन सात अधिकार-पदोंपर सभी कार्योंमें भलीभाँति परीक्षा कर सातों व्यक्तियोंको अधिकारी बनाना चाहिये। कार्योंमें नियुक्त किये गये व्यक्तियोंको उद्योगशील, जागरूक तथा पटु होना चाहिये। राजकुलोत्पन्न! राजाओंके अस्त्रागारमें दक्ष तथा उद्यमशील व्यक्ति होना चाहिये। राजाके कार्योंकी गणना नहीं की जा सकती, अतः राजाको उत्तम, मध्यम तथा अधम कार्योंको भलीभाँति समझ-बूझकर वैसे ही उत्तम, मध्यम एवं अधम पुरुषोंको सौंपना चाहिये। सौंपे गये कार्योंमें परिवर्तन अर्थात् अधमको उत्तम और उत्तमको अधम कार्य सौंप देनेसे राजाका विनाश हो जाता है। राजाको चाहिये कि अपने पुरुषोंके निश्चय, पौरुष, भक्ति, शास्त्रज्ञान, शूरता, कुल और नीतिको जानकर उनका वेतन निश्चित करे। कोई दूसरा व्यक्ति न जान सके—इस अभिप्रायसे