मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २१५ * | ८६१ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| बहुभिर्मन्त्रयेत् कामं राजा मन्त्रं पृथक्-पृथक्।<br>मन्त्रिणामपि नो कुर्यान्मन्त्रिमन्त्रप्रकाशनम्॥ ४८<br>क्वचिन्न कस्य विश्वासो भवतीह सदा नृणाम्।<br>निश्चयस्तु सदा मन्त्रे कार्यो ऐकेन सूरिणा॥ ४९<br>भवेद् वा निश्चयावाप्तिः परबुद्ध्युपजीवनात्।<br>एकस्यैव महीभर्तुर्भूयः कार्यो विनिश्चयः॥ ५०<br>ब्राह्मणान् पर्युपासीत त्रयीशास्त्रसुनिश्चितान्।<br>नासच्छास्त्रवतो मूढांस्ते हि लोकस्य कण्टकाः॥ ५१<br>वृद्धान् हि नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदः शुचीन्।<br>तेभ्यः शिक्षेत विनयं विनीतात्मा च नित्यशः।<br>समग्रां वशगां कुर्यात् पृथिवीं नात्र संशयः॥ ५२<br>बहवोऽविनयाद् भ्रष्टा राजानः सपरिच्छदाः।<br>वनस्थाश्चैव राज्यानि विनयात् प्रतिपेदिरे॥ ५३<br>त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्।<br>आन्वीक्षिकीं त्वात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः॥ ५४<br>इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद् दिवानिशम्।<br>जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥ ५५<br>यजेत राजा बहुभिः ऋतुभिश्च सदक्षिणैः।<br>धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद् भोगान् धनानि च॥ ५६ | राजा अनेकों मन्त्रियोंके साथ अलग-अलग मन्त्रणा करे, परंतु एक मन्त्रीकी मन्त्रणाको दूसरे मन्त्रियोंपर प्रकट न होने दे। इस संसारमें मनुष्योंको सदा कहीं भी किसीका विश्वास नहीं होता, अतः राजाको एक ही विद्वान् मन्त्रीकी मन्त्रणाका निश्चय नहीं करना चाहिये। अन्यथा दूसरेकी बुद्धिके सहारे निश्चयकी प्राप्ति हो जाती है। उस अकेले किये गये निश्चयमें भी राजाको चाहिये कि फिरसे विचार कर ले। उसे त्रयीधर्ममें अटल निश्चय रखनेवाले ब्राह्मणोंकी सेवा करनी चाहिये। जो शास्त्रज्ञ नहीं हैं, उन मूर्खोंकी पूजा न करे; क्योंकि वे लोकके लिये कण्टकस्वरूप हैं। पवित्र आचरणवाले, वेदवेत्ता, वृद्ध ब्राह्मणोंकी नित्य सेवा करनी चाहिये और उन्हींसे सदा विनम्र होकर विनयकी शिक्षा लेनी चाहिये। ऐसा करनेसे वह (राजा) निःसंदेह सम्पूर्ण वसुन्धराको वशमें कर सकता है। बहुत-से राजा उद्दण्डताके कारण अपने परिजन एवं अनुचरोंके साथ नष्ट हो गये और अनेकों वनस्थ राजाओंने विनयसे पुनः राज्यश्रीको प्राप्त किया है। राजाओंको वेदवेत्ताओंसे तीनों वेद, शाश्वती दण्डनीति, आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र) तथा आत्मविद्या ग्रहण करनी चाहिये और सर्वसाधारणसे लौकिक वार्ताओंकी सूचना प्राप्त करनी चाहिये। राजाको दिन-रात इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेकी युक्ति करते रहना चाहिये; क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजाओंको वशमें रखनेमें समर्थ हो सकता है। राजाको दक्षिणायुक्त बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको धर्मकी प्राप्तिके लिये भोग्य सामग्रियाँ और धन देना चाहिये॥ ४३-५६॥ |
| सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद् बलिम्।<br>स्यात् स्वाध्यायपरो लोके वर्तेत पितृबन्धुवत्॥ ५७ | बुद्धिमान् कर्मचारियोंद्वारा राज्यसे वार्षिक कर वसूल कराये। उसे सर्वदा स्वाध्यायमें लीन तथा लोगोंके साथ पिता और भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये। |
| आवृत्तानां गुरुकुलाद् द्विजानां पूजको भवेत्।<br>नृणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते॥ ५८ | राजाको गुरुकुलसे लौटे हुए ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। राजाओंके लिये यह अक्षय ब्राह्म-निधि (कोश-खजाना) कही गयी है। |
| तं च स्तेना नवामित्रा हरन्ति न विनश्यति।<br>तस्माद् राज्ञा विधातव्यो ब्राह्मो वै ह्यक्षयो निधिः *॥ ५९ | चोर अथवा शत्रुगण उसका हरण नहीं कर सकते और न उसका विनाश ही होता है। इसलिये राजाको इस अक्षय ब्राह्म-निधि (खजाने)-का संचय अवश्य करना चाहिये। |
| समोत्तमाधमै राजा ह्याहूय पालयेत् प्रजाः।<br>न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्॥ ६० | राजाको चाहिये कि वह अपने उत्तम, मध्यम तथा अधम अनुचरोंद्वारा प्रजाको बुलाकर उनका पालन करे और अपने क्षात्रधर्मका स्मरण कर संग्रामसे कभी विचलित न हो। |
* ये सभी प्रायः २० श्लोक मनुयाज्ञवल्क्य-स्मृतिमें भी हैं। तदनुसार शुद्ध किये गये हैं।