भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८६२ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
संग्रामेष्वनिवर्त्तित्वं प्रजानां परिपालनम्।<br>शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां निःश्रेयसं परम्॥ ६१<br>कृपणानाथवृद्धानां विधवानां च पालनम्।<br>योगक्षेमं च वृत्तिं च तथैव परिकल्पयेत्॥ ६२<br>वर्णाश्रमव्यवस्थानां तथा कार्यं विशेषतः।<br>स्वधर्मप्रच्युतान् राजा स्वधर्मे स्थापयेत् तथा॥ ६३<br>आश्रमेषु तथा कार्यमन्नं तैलं च भाजनम्।<br>स्वयमेवानयेद् राजा सत्कृतान् नावमानयेत्॥ ६४<br>तापसे सर्वकार्याणि राज्यमात्मानमेव च।<br>निवेदयेत् प्रयत्नेन देववच्चिरमर्चयेत्॥ ६५<br>द्वे प्रज्ञे वेदितव्ये च ऋज्वी वक्रा च मानवैः।<br>वक्रां ज्ञात्वा न सेवेत प्रतिबाधेत चागताम्॥ ६६<br>नास्य छिद्रं परो विन्द्याद् विन्द्याच्छिद्रं परस्य तु।<br>गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः॥ ६७<br>न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।<br>विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥ ६८<br>विश्वासयेच्चाप्यपरं तत्त्वभूतेन हेतुना।<br>बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्॥ ६९<br>वृकवच्चाविलुम्पेत शशवच्च विनिक्षिपेत्।<br>दृढप्रहारी च भवेत् तथा शूकरवन्नृपः॥ ७०<br>चित्राकारश्च शिखिवद् दृढभक्तस्तथा श्ववत्।<br>तथा च मधुराभाषी भवेत् कोकिलवन्नृपः॥ ७१<br>काकशङ्की भवेन्नित्यमज्ञातवसतिं वसेत्।<br>नापरीक्षितपूर्वं च भोजनं शयनं व्रजेत्।<br>वस्त्रं पुष्पमलंकारं यच्चान्यन्मनुजोत्तम॥ ७२<br>न गाहेज्जनसम्बाधं न चाज्ञातजलाशयम्।<br>अपरीक्षितपूर्वं च पुरुषैराप्तकारिभिः॥ ७३<br>नारोहेत् कुञ्जरं व्यालं नादान्तं तुरगं तथा।<br>नाविज्ञातां स्त्रियं गच्छेन्नैव देवोत्सवे वसेत्॥ ७४<br>नरेन्द्रलक्ष्म्या धर्मज्ञ त्राता यत्तो भवेन्नृपः।<br>सद्भृत्याश्च तथा पुष्टाः सततं प्रतिमानिताः॥ ७५युद्धविमुख न होना, प्रजाओंका परिपालन तथा ब्राह्मणोंकी शुश्रूषा—ये तीनों धर्म राजाओंके लिये परम कल्याणकारी हैं। उसी प्रकार दुर्दशाग्रस्त, असहाय और वृद्धोंके तथा विधवा स्त्रियोंके योगक्षेम एवं जीविकाका प्रबन्ध करना चाहिये। राजाको वर्णाश्रमकी व्यवस्था विशेषरूपसे करनी चाहिये तथा अपने धर्मसे भ्रष्ट हुए लोगोंको पुनः अपने-अपने धर्मोंमें स्थापित करना चाहिये। चारों आश्रमोंपर भी उसी प्रकारकी देख-रेख रखनी चाहिये। राजाके लिये उचित है कि वह अतिथिके लिये अन्न, तैल और पात्रोंकी व्यवस्था स्वयं करे एवं सम्माननीय व्यक्तियोंका अपमान न करे तथा तपस्वीके लिये अपने सभी कर्मोंको तथा राज्य एवं अपने-आपको समर्पित कर दे और देवताके समान चिरकालतक उनकी पूजा करे। मनुष्यके द्वारा सरल (सुमति) और कुटिल (कुमति) दो प्रकारकी बुद्धियोंको जानना चाहिये। उनमें कुटिल बुद्धिको जान लेनेपर उसका सेवन न करे, किंतु यदि आ गयी हो तो उसे दूर हटा दे। राजाके छिद्रको शत्रु न जान सके, किंतु वह शत्रुके छिद्रको जान ले। वह कछुएकी भाँति अपने अङ्गोंको छिपाये रखे और अपने छिद्रकी रक्षा करे। अविश्वसनीय व्यक्तिका विश्वास न करे और विश्वसनीयका भी बहुत विश्वास न करे; क्योंकि विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मूलको भी काट डालता है॥ ५७—६८॥<br><br>राजाको चाहिये कि वह यथार्थ कारणको प्रकाशित करके दूसरोंको अपनेपर विश्वस्त करे। वह बगुलेकी भाँति अर्थका चिन्तन करे, सिंहकी तरह पराक्रम करे, भेडियेके समान लूट-पाट कर ले, खरगोशकी तरह छिपा रहे तथा शूकरके सदृश दृढ़ प्रहार करनेवाला हो। राजा मोरकी भाँति विचित्र आकारवाला, कुत्तेकी तरह अनन्यभक्त तथा कोकिलकी भाँति मृदुभाषी हो। नरश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह सर्वदा कौएकी भाँति सशङ्कित रहे। वह गुप्त स्थानपर निवास करे, पहले बिना परीक्षा किये भोजन, शय्या, वस्त्र, पुष्प, अलंकार एवं अन्यान्य सामग्रियोंको न ग्रहण करे। विश्वस्त पुरुषोंद्वारा पहले बिना परीक्षा किये हुए मनुष्योंकी भीड़ तथा अज्ञात जलाशयमें प्रवेश न करे। दुष्ट हाथी एवं बिना सिखाये घोड़ेपर न चढ़े, न बिना जानी हुई स्त्रीके साथ समागम करे और न देवोत्सवमें निवास करे। धर्मज्ञ! राजाको सर्वदा राजलक्ष्मी (चिह्न)-से सुसम्पन्न, दीनरक्षक और