मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८६६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुष्कृतानि नरेन्द्रस्य न तु सङ्कीर्तयेत् क्वचित्।<br>वस्त्रमस्त्रमलंकारं राज्ञा दत्तं तु धारयेत्॥ १६<br>औदार्येण न तद् देयमन्यस्मै भूतिमिच्छता।<br>न चैवात्यशनं कार्यं दिवा स्वप्नं न कारयेत्॥ १७<br>नानिर्दिष्टे तथा द्वारे प्रविशेत् तु कथञ्चन।<br>न च पश्येत् तु राजानमयोग्यासु च भूमिषु॥ १८<br>राज्ञस्तु दक्षिणे पार्श्वे वामे चोपविशेत् तदा।<br>पुरस्ताच्च तथा पश्चादासनं तु विगर्हितम्॥ १९<br>जृम्भां निष्ठीवनं कासं कोपं पर्यस्तिकाश्रयम्।<br>भ्रुकुटिं वान्तमुद्गारं तत्समीपे विवर्जयेत्॥ २०<br>स्वयं तत्र न कुर्वीत स्वगुणाख्यापनं बुधः।<br>स्वगुणाख्यापने युक्त्या परमेव प्रयोजयेत्॥ २१<br>हृदयं निर्मलं कृत्वा परां भक्तिमुपाश्रितैः।<br>अनुजीविगणैर्भाव्यं नित्यं राज्ञामतन्द्रितैः॥ २२<br>शाठ्यं लौल्यं च पैशुन्यं नास्तिक्यं क्षुद्रता तथा।<br>चापल्यं च परित्याज्यं नित्यं राज्ञोऽनुजीविभिः॥ २३<br>श्रुतिविद्यासुशीलैश्च संयोज्यात्मानमात्मना।<br>राजसेवां ततः कुर्याद् भूतये भूतिवर्धनीम्॥ २४<br>नमस्कार्याः सदा चास्य पुत्रवल्लभमन्त्रिणः।<br>सचिवैश्चास्य विश्वासो न तु कार्यः कथञ्चन॥ २५ | राजाके दुष्कर्मकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये। राजाद्वारा दिये गये वस्त्र, अस्त्र और अलंकारको धारण करे। ऐश्वर्यकी कामना करनेवाले भृत्यको उन वस्त्रादि सामग्रियोंको उदारतावश दूसरेको नहीं देना चाहिये। (राजाके सम्मुख यदि कभी भोजन करनेका अवसर आये तो) न अधिक भोजन करे और न दिनमें शयन करे। जिससे प्रवेश करनेका निर्देश नहीं है, उस द्वारसे कभी प्रवेश न करे और अयोग्य स्थानपर स्थित राजाकी ओर न देखे। राजाके दाहिने या बायें पार्श्वमें बैठना चाहिये। सम्मुख या पीछेकी ओर बैठना निन्दित है। राजाके समीप जमुआई लेना, थूकना, खखारना, खाँसना, क्रोधित होना, आसनपर तकिया लगाकर बैठना, भ्रुकुटी चढ़ाना, वमन करना या उद्गार निकालना—ये सभी कार्य नहीं करने चाहिये। बुद्धिमान् भृत्य राजाके सम्मुख अपने गुणोंकी श्लाघा न करे। अपने गुणको सूचित करनेके लिये युक्तिपूर्वक दूसरेको ही प्रयुक्त करना चाहिये। अनुचरोंको हृदय निर्मल करके परम भक्तिके साथ राजाओंके प्रति नित्य सावधान रहना चाहिये। राजाके अनुचरोंको शठता, लोभ, छल, नास्तिकता, क्षुद्रता, चञ्चलता आदिका नित्य परित्याग कर देना चाहिये। शास्त्रज्ञ एवं विद्याभ्यासियोंसे स्वयं अपना सम्पर्क स्थापित करके ऐश्वर्य बढ़ानेवाली राजसेवाको अपनी समृद्धिके लिये करनी चाहिये। राजाके पुत्र, प्रिय परिजन और मन्त्रियोंको नमस्कार करना चाहिये, किंतु उनके मन्त्रियोंका कभी विश्वास न करे॥ ११—२५॥ |
| अपुष्टश्चास्य न ब्रूयात् कामं ब्रूयात्तथा यदि।<br>हितं तथ्यं च वचनं हितैः सह सुनिश्चितम्॥ २६ | बिना पूछे राजासे कुछ न कहे, यदि कहे भी तो जो राजाके हितके रूपमें सुनिश्चित हितकर और यथार्थ बात हो वह कहे। |
| चित्तं चैवास्य विज्ञेयं नित्यमेवानुजीविभिः।<br>भर्तुराराधनं कुर्याच्चित्तज्ञो मानवः सुखम्॥ २७ | अनुचरोंको नित्य राजाकी मनोदशाका पता लगाते रहना चाहिये। मनोभावोंको समझनेवाला अनुचर ही अपने स्वामीकी सुखपूर्वक सेवा कर सकता है। |
| रागापरागौ चैवास्य विज्ञेयौ भूतिमिच्छता।<br>त्यजेद् विरक्तं नृपतिं रक्ताद् वृत्तिं तु कारयेत्॥ २८ | अपने कल्याणकी कामना करनेवाले अनुचरको राजाके अनुराग और विरागका पता लगाते रहना चाहिये। विरक्त राजाको छोड़ दे और अनुरक्तकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये; |
| विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा।<br>आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च॥ २९ | क्योंकि विरक्त राजा उसका नाश कर विपक्षियोंको उन्नत बनाता है, आशाको बढ़ाकर उसके फलका नाश कर देता है, |
| अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः।<br>वाक्यं च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति वै॥ ३० | क्रोधका अवसर न रहनेपर भी वह क्रुद्ध ही दिखायी पड़ता है तथा प्रसन्न होकर भी कुछ फल नहीं देता, हर्षयुक्त बातें करता है और जीविकाका |