भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 877, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 877
* अध्याय २१७ *८६७

| प्रदेशवाक्यमुदितो न सम्भावयतेऽन्यथा।<br>आराधनासु सर्वासु सुंसवच्च विचेष्टते ॥ ३१<br><br>कथासु दोषं क्षिपति वाक्यभङ्गं करोति च।<br>लक्ष्यते विमुखश्चैव गुणसंकीर्तनेऽपि च॥ ३२<br><br>दृष्टिं क्षिपति चान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि।<br>विरक्तलक्षणं चैतच्छृणु रक्तस्य लक्षणम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाक्यं गृह्णाति चादरात्।<br>कुशलादिपरिपश्नं सम्प्रयच्छति चासनम्॥ ३४<br><br>विविक्तदर्शने चास्य रहस्येनं न शङ्कते।<br>जायते हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य तु तत्कथाम्॥ ३५<br><br>अप्रियाण्यपि वाक्यानि तदुक्तान्यभिनन्दते।<br>उपायनं च गृह्णाति स्तोकमप्यादरात्तथा॥ ३६<br><br>कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा।<br>इति रक्तस्य कर्तव्या सेवा रविकुलोद्भव।<br>आपत्सु न त्यजेत् पूर्वं विरक्तमपि सेवितम्॥ ३७<br><br>मित्रं न चापत्सु तथा च भृत्यं<br>त्यजन्ति ये निर्गुणमप्रमेयम्।<br>विभुं विशेषेण च ते व्रजन्ति<br>सुरेन्द्रधामामरवृन्दजुष्टम् ॥ ३८ | उच्छेद कर देता है। प्रसंगकी बातोंसे प्रसन्न होकर भी वह पूर्ववत् सम्मान नहीं करता, सभी सेवाओंमें उपेक्षा व्यक्त करता है। कोई बात छिड़नेपर बीचमें दोष प्रकट करता है और वहीं वाक्यको काट देता है। गुणोंका कीर्तन करनेपर भी विमुख ही लक्षित होता है। काम करते समय दृष्टि दूसरी ओर घुमा लेता है—ये सभी विरक्त राजाके लक्षण हैं। अब अनुरक्त राजाके लक्षण सुनिये॥ २६—३३॥<br><br>अनुरक्त राजा भृत्योंको देखकर प्रसन्न होता है, उसकी बातको आदरपूर्वक ग्रहण करता है और कुशलमङ्गल पूछकर आसन देता है। एकान्तमें अथवा अन्तःपुरमें भी उसे देखकर कभी संशय नहीं करता और उसकी कही हुई बातें सुनकर प्रसन्न होता है। उसके द्वारा कही हुई अप्रिय बातोंका भी अभिनन्दन करता है और उसकी थोड़ी-सी भी भेंट आदरपूर्वक स्वीकार करता है। दूसरी कथाके प्रसङ्गपर उसका स्मरण करता है और सर्वदा उसे देखकर प्रसन्न रहता है। सूर्यकुलोत्पन्न! ऐसे अनुरक्त राजाकी सेवा करनी चाहिये। किंतु पूर्वकालमें सेवा किये गये विरक्त राजाका भी आपत्तिकालमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य अपने निर्गुण एवं अनुपम मित्र, भृत्य तथा विशेषरूपसे स्वामीको आपत्तिके अवसरपर नहीं छोड़ते, वे देवता-वृन्दोंके द्वारा सेवित देवराज इन्द्रके धामको जाते हैं॥ ३४-३८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मेऽनुजीविवृत्तं नाम षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रसंगमें भृत्य-व्यवहार नामक दो सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१६॥


दो सौ सतरहवाँ अध्याय

दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
राजा सहायसंयुक्तः प्रभूतयवसेन्धनम्।<br>रम्यमानतसामन्तं मध्यमं देशमावसेत्॥ १<br><br>वैश्यशूद्रजनप्रायमनाहार्यं तथा परैः।<br>किञ्चिद् ब्राह्मणसंयुक्तं बहुकर्मकरं तथा॥ २राजन्! जहाँ प्रचुर मात्रामें घास-भूसा और लकड़ी वर्तमान हो, स्थान रमणीय हो, पड़ोसी राजा विनम्र हो, वैश्य और शूद्रलोग अधिक मात्रामें रहते हों, जो शत्रुओं‌द्वारा हरण किये जाने योग्य न हो एवं कुछ विप्रों तथा अधिकांश कर्मकरोंसे संयुक्त हो,
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