मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय २१७ * | ८६७ |
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| प्रदेशवाक्यमुदितो न सम्भावयतेऽन्यथा।<br>आराधनासु सर्वासु सुंसवच्च विचेष्टते ॥ ३१<br><br>कथासु दोषं क्षिपति वाक्यभङ्गं करोति च।<br>लक्ष्यते विमुखश्चैव गुणसंकीर्तनेऽपि च॥ ३२<br><br>दृष्टिं क्षिपति चान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि।<br>विरक्तलक्षणं चैतच्छृणु रक्तस्य लक्षणम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाक्यं गृह्णाति चादरात्।<br>कुशलादिपरिपश्नं सम्प्रयच्छति चासनम्॥ ३४<br><br>विविक्तदर्शने चास्य रहस्येनं न शङ्कते।<br>जायते हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य तु तत्कथाम्॥ ३५<br><br>अप्रियाण्यपि वाक्यानि तदुक्तान्यभिनन्दते।<br>उपायनं च गृह्णाति स्तोकमप्यादरात्तथा॥ ३६<br><br>कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा।<br>इति रक्तस्य कर्तव्या सेवा रविकुलोद्भव।<br>आपत्सु न त्यजेत् पूर्वं विरक्तमपि सेवितम्॥ ३७<br><br>मित्रं न चापत्सु तथा च भृत्यं<br>त्यजन्ति ये निर्गुणमप्रमेयम्।<br>विभुं विशेषेण च ते व्रजन्ति<br>सुरेन्द्रधामामरवृन्दजुष्टम् ॥ ३८ | उच्छेद कर देता है। प्रसंगकी बातोंसे प्रसन्न होकर भी वह पूर्ववत् सम्मान नहीं करता, सभी सेवाओंमें उपेक्षा व्यक्त करता है। कोई बात छिड़नेपर बीचमें दोष प्रकट करता है और वहीं वाक्यको काट देता है। गुणोंका कीर्तन करनेपर भी विमुख ही लक्षित होता है। काम करते समय दृष्टि दूसरी ओर घुमा लेता है—ये सभी विरक्त राजाके लक्षण हैं। अब अनुरक्त राजाके लक्षण सुनिये॥ २६—३३॥<br><br>अनुरक्त राजा भृत्योंको देखकर प्रसन्न होता है, उसकी बातको आदरपूर्वक ग्रहण करता है और कुशलमङ्गल पूछकर आसन देता है। एकान्तमें अथवा अन्तःपुरमें भी उसे देखकर कभी संशय नहीं करता और उसकी कही हुई बातें सुनकर प्रसन्न होता है। उसके द्वारा कही हुई अप्रिय बातोंका भी अभिनन्दन करता है और उसकी थोड़ी-सी भी भेंट आदरपूर्वक स्वीकार करता है। दूसरी कथाके प्रसङ्गपर उसका स्मरण करता है और सर्वदा उसे देखकर प्रसन्न रहता है। सूर्यकुलोत्पन्न! ऐसे अनुरक्त राजाकी सेवा करनी चाहिये। किंतु पूर्वकालमें सेवा किये गये विरक्त राजाका भी आपत्तिकालमें त्याग नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य अपने निर्गुण एवं अनुपम मित्र, भृत्य तथा विशेषरूपसे स्वामीको आपत्तिके अवसरपर नहीं छोड़ते, वे देवता-वृन्दोंके द्वारा सेवित देवराज इन्द्रके धामको जाते हैं॥ ३४-३८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मेऽनुजीविवृत्तं नाम षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रसंगमें भृत्य-व्यवहार नामक दो सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१६॥
दो सौ सतरहवाँ अध्याय
दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| राजा सहायसंयुक्तः प्रभूतयवसेन्धनम्।<br>रम्यमानतसामन्तं मध्यमं देशमावसेत्॥ १<br><br>वैश्यशूद्रजनप्रायमनाहार्यं तथा परैः।<br>किञ्चिद् ब्राह्मणसंयुक्तं बहुकर्मकरं तथा॥ २ | राजन्! जहाँ प्रचुर मात्रामें घास-भूसा और लकड़ी वर्तमान हो, स्थान रमणीय हो, पड़ोसी राजा विनम्र हो, वैश्य और शूद्रलोग अधिक मात्रामें रहते हों, जो शत्रुओंद्वारा हरण किये जाने योग्य न हो एवं कुछ विप्रों तथा अधिकांश कर्मकरोंसे संयुक्त हो, |
२१९- विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय
८६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अदेवमातृकं रम्यमनुरक्तजनान्वितम्।<br>करैरपीडितं चापि बहुपुष्पफलं तथा॥ ३<br>अगम्यं परचक्राणां तद्वासगृहमापदि।<br>समदुःखसुखं राज्ञः सततं प्रियमास्थितम्॥ ४<br>सरीसृपविहीनं च व्याघ्रतस्करवर्जितम्।<br>एवंविधं यथालाभं राजा विषयमावसेत्॥ ५<br>तत्र दुर्गं नृपः कुर्यात् षण्णामेकतमं बुधः।<br>धन्वदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च॥ ६<br>वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च पार्थिव।<br>सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्गं प्रशस्यते॥ ७<br>दुर्गं च परिखोपेतं वप्राट्टालकसंयुतम्।<br>शतघ्नीयन्त्रमुख्यैश्च शतशश्च समावृतम्॥ ८<br>गोपुरं सकपाटं च तत्र स्यात् सुमनोहरम्।<br>सपताकं गजारूढो येन राजा विशेत् पुरम्॥ ९ | देवस्थान रहित सुन्दर हो, अनुरक्तजनोंसे समन्वित हो, जहाँके निवासी करके भारसे पीड़ित न हों, पुष्प और फलकी बहुतायत हो, आपत्तिके समय वह वासस्थान शत्रुओंके लिये अगम्य हो, जहाँ निरन्तर समानरूपसे राजाके सुख-दुःखके भागी एवं प्रेमीजन निवास करते हों, जो सर्प, बाघ और चोरसे रहित हो तथा सरलतासे उपलब्ध हो, इस प्रकारके देशमें राजाको अपने सहायकोंसहित निवास करना चाहिये। वहाँ बुद्धिमान् राजाको धन्व या धनुदुर्ग (जहाँ चारों ओरसे मरुभूमि हो), महीदुर्ग नरदुर्ग, वृक्षदुर्ग, जलदुर्ग तथा पर्वतदुर्ग—इन छः दुर्गोंमेंसे किसी एककी रचना करनी चाहिये। राजन्! इन सभी दुर्गोंमें गिरि (पर्वत) दुर्ग श्रेष्ठ माना गया है*। वह गिरिदुर्ग खाई, चहारदीवारी तथा ऊँची अट्टालिकाओंसे युक्त एवं तोप आदि सैकड़ों प्रधान यन्त्रोंसे घिरा होना चाहिये। उसमें किंवाड़सहित मनोहर फाटक लगा हो, जिससे हाथीपर बैठा हुआ पताकासमेत राजा नगरमें प्रविष्ट हो सके॥ १–९॥ |
| चतस्रश्च तथा तत्र कार्यास्त्वायतवीथयः।<br>एकस्मिंस्तत्र वीथ्यग्रे देववेश्म भवेद् दृढम्॥ १०<br>वीथ्यग्रे च द्वितीये च राजवेश्म विधीयते।<br>धर्माधिकरणं कार्यं वीथ्यग्रे च तृतीयके॥ ११<br>चतुर्थे त्वथ वीथ्यग्रे गोपुरं च विधीयते।<br>आयतं चतुरग्रं वा वृत्तं वा कारयेत् पुरम्॥ १२<br>मुक्तिहीनं त्रिकोणं च यवमध्यं तथैव च।<br>अर्धचन्द्रप्रकारं च वज्राकारं च कारयेत्॥ १३<br>अर्धचन्द्रं प्रशंसन्ति नदीतीरेषु तद्वसन्।<br>अन्यत्र तन्न कर्तव्यं प्रयत्नेन विजानता॥ १४ | वहाँ चार लम्बी-चौड़ी गलियाँ बनवानी चाहिये। जिनमें एक गलीके अग्रभागमें सुदृढ़ देव-मन्दिरका निर्माण कराये। दूसरी गलीके आगे राजमहल बनानेका विधान है। तीसरी गलीके अग्रभागमें धर्माधिकारीका आवासस्थान हो। चौथी गलीके अग्रभागमें दुर्गका मुख्य प्रवेशद्वार हो। उस दुर्गको चौकोना, आयताकार, गोलाकार, मुक्तिहीन, त्रिकोण, यवमध्य, अर्धचन्द्राकार अथवा वज्राकार बनवाना चाहिये। नदी-तटपर बनाये गये अर्धचन्द्राकार दुर्गको उत्तम माना जाता है। विद्वान् राजाको अन्य स्थानोंपर ऐसे दुर्गका निर्माण नहीं करना चाहिये। |
| राज्ञा कोशगृहं कार्यं दक्षिणे राजवेश्मनः।<br>तस्यापि दक्षिणे भागे गजस्थानं विधीयते॥ १५<br>गजानां प्राङ्मुखी शाला कर्तव्या वाप्युदङ्मुखी।<br>आग्नेये च तथा भागे आयुधागारमिष्यते॥ १६<br>महानसं च धर्मज्ञ कर्मशालास्तथापराः।<br>गृहं पुरोधसः कार्यं वामतो राजवेश्मनः॥ १७ | राजाको राजमहलके दाहिने भागमें कोशगृह बनवाना चाहिये। उसके भी दाहिने भागमें गजशाला बनवानेका विधान है। गजोंकी शाला पूर्व अथवा उत्तराभिमुखी होनी चाहिये। अग्निकोणमें आयुधागार बनवाना उचित है। धर्मज्ञ! उसी दिशामें रसोईघर तथा अन्यान्य कर्मशालाओंकी भी रचना करे। राजभवनकी बायीं ओर पुरोहितका भवन होना चाहिये |
* गिरिदुर्ग चारों ओरसे पर्वतोंसे घिरे हुए पर्वतोंके मध्य किसी चौरस पर्वतपर ही स्थित होता है। इसके भी चारों ओर मरुभूमि, जलराशि, खाई, वृक्षादिके दुर्ग होते हैं। मनुनिर्मित रोहिताश्वदुर्ग तथा कलिंजर, चरणाद्रिके दुर्ग ऐसे ही हैं। मनु० ७।७०-७७ आदिमें इनका विस्तृत उल्लेख है।
- अध्याय २१७ * | ८६९ ---|---
| मन्त्रिवेदविदां चैव चिकित्साकर्तुरेव च।<br>तत्रैव च तथा भागे कोष्ठागारं विधीयते॥ १८<br>गवां स्थानं तथैवात्र तुरगाणां तथैव च।<br>उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ १९<br>दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु गर्हिताः।<br>तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ २०<br>कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।<br>धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ २१<br>अजांश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा।<br>गोगजाश्वादिशालासु तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ २२<br>अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे।<br>तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥ २३<br>दद्यादावसथस्थानं सर्वेषामनुपूर्वशः।<br>योधानां शिल्पिनां चैव सर्वेषामविशेषतः॥ २४<br>दद्यादावसथान् दुर्गे कालमन्त्रविदां शुभान्।<br>गोवैद्यानश्ववैद्यांश्च गजवैद्यांस्तथैव च॥ २५<br>आहरेत भृशं राजा दुर्गे हि प्रबला रुजः।<br>कुशीलवानां विप्राणां दुर्गे स्थानं विधीयते॥ २६<br>न बहूनामतो दुर्गे विना कार्ये तथा भवेत्।<br>दुर्गे च तत्र कर्तव्या नानाप्रहरणान्विताः॥ २७<br>सहस्रघातिनो राजंस्तैस्तु रक्षा विधीयते।<br>दुर्गे द्वाराणि गुप्तानि कार्याण्यपि च भूभुजा॥ २८<br>संचयश्चात्र सर्वेषामायुधानां प्रशस्यते।<br>धनुषां क्षेपणीयानां तोमराणां च पार्थिव॥ २९<br>शराणामथ खङ्गानां कवचानां तथैव च।<br>लगुडानां गुडानां च हुडानां परिघैः सह॥ ३०<br>अश्मनां च प्रभूतानां मुद्गराणां तथैव च।<br>त्रिशूलानां पट्टिशानां कुठाराणां च पार्थिव॥ ३१<br>प्रासानां च सशूलानां शक्तीनां च नरोत्तम।<br>परश्वधानां चक्राणां वर्मणां चर्मभिः सह॥ ३२<br>कुद्दाररज्जुवेत्राणां पीठकानां तथैव च।<br>तुषाणां चैव दात्राणामङ्गाराणां च संचयः॥ ३३<br>सर्वेषां शिल्पिभाण्डानां संचयश्चात्र चेष्यते ।<br>वादित्राणां च सर्वेषामोषधीनां तथैव च॥ ३४ | तथा उसी स्थलपर एवं उसी दिशामें मन्त्रियों और वैद्यका निवासस्थान एवं कोष्ठागार बनानेका विधान है। उसी स्थानके समीप गौओं तथा अश्वोंके निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये। अश्वोंकी पंक्ति उत्तराभिमुखी अथवा दक्षिणाभिमुखी हो सकती है, अन्य दिशाभिमुखी निन्दित मानी गयी है। जहाँ अश्व रखे जायें वहाँ रातभर दीपक जलते रहना चाहिये। अश्वशालामें मुर्गा, बंदर, मर्कट तथा बछड़ेसहित गौ भी रखनेका विधान है। अश्वोंका कल्याण चाहनेवाला अश्वशालामें बकरियोंको भी रखे। गौ, हाथी और अश्वादि शालाओंमें उनके गोबर निकालनेकी व्यवस्था सूर्य अस्त हो जानेपर नहीं करनी चाहिये। राजा उन-उन स्थानोंमें यथायोग्य समझकर क्रमशः सभी सारथियोंको आवासस्थान प्रदान करे। इसी प्रकार सबसे बढ़कर योद्धाओं, शिल्पियों और कालमन्त्रके वेत्ताओंको दुर्गमें उत्तम निवास-स्थान दे। इसी प्रकार राजाको गौ-वैद्य, अश्व-वैद्य तथा गज-वैद्यको भी रखना चाहिये; क्योंकि दुर्गमें कभी रोगोंकी प्रबलता हो सकती है। दुर्गमें चारणों, संगीतज्ञों और ब्राह्मणोंके स्थानका विधान है॥१०—२६॥<br><br>इनके अतिरिक्त दुर्गमें निरर्थक बहुत-से व्यक्तियोंको नहीं रखना चाहिये। राजन्! दुर्गमें विविध प्रकारके शस्त्रास्त्रसे युक्त एवं हजारोंको मारनेमें समर्थ योद्धाओंको रखना चाहिये; क्योंकि उन्हींसे रक्षा होती है। राजाको दुर्गमें गुप्तद्वार भी बनवाना चाहिये। राजन्! दुर्गमें सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहकी विशेष प्रशंसा की गयी है। नृपश्रेष्ठ राजन्! राजाको दुर्गमें धनुष, ढेलवाँस, तोमर, बाण, तलवार, कवच, लाठी, गुड (हाथीको फँसानेका एक फंदा), हुड (चोरोंको फँसानेका खूँटा), परिघ, पत्थर, बहुसंख्यक मुद्गर, त्रिशूल, पट्टिश, कुठार, प्रास (भाला), शूल, शक्ति, फरसा, चक्र, चर्मके साथ ढाल, कुदाल, रस्सी, बेंत, पीठक, भूसी, हँसिया, कोयला—इन सबका संचय करना चाहिये। दुर्गमें सभी प्रकारके शिल्पीय पात्रोंका भी संचय रहना चाहिये। वह सभी प्रकारके वाद्यों तथा ओषधियोंका भी संचय करे। |
२२०- राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन
| ८७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यवसानां प्रभूतानामिन्धनस्य च संचयः।<br>गुडस्य सर्वतैलानां गोरसानां तथैव च॥ ३५<br>वसानामथ मज्जानां स्नायूनामस्थिभिः सह।<br>गोचर्मपटहानां च धान्यानां सर्वतस्तथा॥ ३६<br>तथैवाभ्रपटानां च यवगोधूमयोरपि।<br>रत्नानां सर्ववस्त्राणां लोहानामप्यशेषतः॥ ३७<br>कलायमुद्गमाषाणां चणकानां तिलैः सह।<br>तथा च सर्वसस्यानां पांसुगोमययोरपि॥ ३८<br>शणसर्ज्रसं भूर्ज जतु लाक्षा च टङ्कणम्।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन॥ ३९<br>कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा।<br>मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम्॥ ४०<br>स्थानानि च विरुद्धानां सुगुप्तानि पृथक् पृथक्।<br>कर्तव्यानि महाभाग यत्नेन पृथिवीक्षिता॥ ४१<br>उक्तानि चाप्यनुक्तानि राजद्रव्याण्यशेषतः।<br>सुगुप्तानि पुरे कुर्याज्जनानां हितकाम्यया॥ ४२ | वहाँ प्रचुरमात्रामें घास-भूसा, ईंधन, गुड, सभी प्रकारके तेल तथा गोरसका भी संचय हो। राजाको दुर्गमें वसा, मज्जा, हड्डियोंसहित स्नायु, गोचर्मसे बने नगाड़े, धान्य, तम्बू, जौ, गेहूँ, रत्न, सभी प्रकारके वस्त्र, लौह, कुलथी, मूँग, उड़द, चना, तिल, सभी प्रकारके अन्न, धूल, गोबर, सन, भोजपत्र, जस्ता, लाह, पत्थर तोड़नेकी छेनी तथा अन्य भी जो कुछ पदार्थ हों, उनका संचय करना चाहिये। सर्पोंके विषसे भरे घड़े, साँप, सिंह आदि हिंसक जन्तु, मृग तथा पक्षी रखे जाने चाहिये, किंतु वे एक-दूसरेसे सुरक्षित रहें। महाभाग! राजाको विरोधी जीवोंकी रक्षाके लिये यत्नपूर्वक पृथक्-पृथक् स्थान बनवाना चाहिये। राजाको प्रजाकी कल्याण-भावनासे कही गयी अथवा न कही गयी सम्पूर्ण राजवस्तुओंको दुर्गमें गुप्तरूपसे संग्रहीत करना चाहिये॥२७—४२॥ |
| जीवकर्षभकाकोलमामलक्याटरूषकम् ।<br>शालपर्णी पृश्निपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च॥ ४३<br>माषपर्णी च मेदे द्वे शारिवे द्वे बलात्रयम्।<br>वीरा श्वसन्ती वृष्या च बृहती कण्टकारिका॥ ४४<br>शृङ्गी शृङ्गाटकी द्रोणी वर्षाभूर्दर्भ रेणुका।<br>मधुपर्णी विदार्यौ द्वे महाक्षीरा महातपाः॥ ४५<br>धन्वनः सहदेवाह्वा कटुकैरण्डकं विषः।<br>पर्णी शताह्वा मृद्वीका फल्गुखर्जूरयष्टिकाः॥ ४६<br>शुक्रातिशुक्रकाश्मर्यश्छत्रातिच्छत्रवीरणाः ।<br>इक्षुरिक्षुविकाराश्च फाणिताद्याश्च सत्तम॥ ४७<br>सिंही च सहदेवी च विश्वेदेवाश्वरोधकम्।<br>मधुकं पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका॥ ४८<br>शतावरीमधूके च पिप्पलं तालमेव च।<br>आत्मगुप्ता कट्फलाख्या दार्विका राजशीर्षकी॥ ४९<br>राजसर्षपधान्याकमृष्यप्रोक्ता तथोत्कटा।<br>कालशाकं पद्मबीजं गोवल्ली मधुवल्लिका॥ ५०<br>शीतपाकी कुलिङ्गाक्षी काकजिह्वोरुपुष्पिका।<br>पर्वतत्रपुसौ चोभौ गुञ्जातकपुनर्नवे॥ ५१ | जीवक, ऋषभक, काकोल, इमली, आटरूष, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, दोनों प्रकारकी मेदा, दोनों प्रकारकी शारिवा, तीनों बलाएँ (एक ओषधि), वीरा, श्वसन्ती, वृष्या, बृहती, कण्टकारिका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, कुश, रेणुका, मधुपर्णी, दोनों विदारी, महाक्षीरा, महातपा, धन्वन, सहदेवी, कटुक, रेड़, विष, शतपर्णी, मृद्वीका, फल्गु, खजूर, यष्टिका, शुक्र, अतिशुक्र, काश्मरी, छत्र, अतिच्छत्र, वीरण, ईख और ईखसे होनेवाली अन्य वस्तुएँ, फाणित आदि, सिंही, सहदेवी, विश्वदेव, अश्वरोधक, महुआ, पुष्पहंसा, शतपुष्पा, मधूलिका, शतावरी, महुआ, (दाख) पिप्पल, ताल, आत्मगुप्ता, कटफल, दार्विका, राजशीर्षकी, श्वेत सरसों, धनिया, ऋष्यप्रोक्ता, उत्कटा, कालशाक, पद्मबीज, गोवल्ली, मधुवल्लिका, शीतपाकी, कुलिंगाक्षी, काकजिह्वा, उरुपुष्पका, दोनों पर्वत और त्रपुष, गुंजातक, पुनर्नवा, |
* अध्याय २१७ * | ८७१
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
|---|---|
| कसेरुका तु काश्मीरी बिल्वशालूककेसरम्।<br>तुषधान्यानि सर्वाणि शमी धान्यानि चैव हि॥ ५२<br>क्षीरं क्षौद्रं तथा तक्रं तैलं मज्जा वसा घृतम्।<br>नीपश्चारिष्टकक्षोदवातामसोमबाणकम् ॥५३<br>एवमादीनि चान्यानि विज्ञेयो मधुरो गणः।<br>राजा संचिनुयात् सर्वं पुरे निरवशेषतः॥ ५४ | कसेरुका, काश्मीरी, बिल्व, शालूक, केसर, सभी प्रकारकी भूमियाँ, शमी, अन्न, दुग्ध, शहद, मट्ठा, तेल, मज्जा, वसा, घी, कदम्ब, अरिष्टक, अक्षोट, बादाम, सोम और बाणक—इन सबको तथा इसी प्रकार अन्य पदार्थोंको मधुर जानना चाहिये। राजा इन सबका पूर्णरूपसे दुर्गमें संग्रह करे॥ ४३-५४॥ |
| दाडिमाम्रातकौ चैव तिन्तिडीकाम्लवेतसम्।<br>भव्यकर्कन्धुलकुचकरमर्दकरूषकम् ॥५५<br>बीजपूरककण्डूरे मालती राजबन्धुकम्।<br>कोलद्वयपर्णानि द्वयोराम्रातयोरपि॥ ५६<br>पारावतं नागरकं प्राचीनारुकमेव च।<br>कपित्थामलकं चुक्रफलं दन्तशठस्य च॥५७<br>जाम्बवं नवनीतं च सौवीरकरुषोदके।<br>सुरासवं च मद्यानि मण्डतक्रदधीनि च॥ ५८<br>शुक्लानि चैव सर्वाणि ज्ञेयामम्लगणं द्विज।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ५९ | अनार, आम्रातक, इमली, अम्लवेतस, सुन्दर बेर, बड़हर, करमर्द, करूषक, बिजौरा, कण्डूर, मालती, राज-बन्धुक, दोनों कोलकों और अमड़ोंके पत्ते, पारावत, नागरक, प्राचीन अरुक, कैथ, आँवला, चुक्रफल, दन्तशठ, जामुन, मक्खन, सौवीरक, रुषोदक, सुरा, आसव आदि मद्य, माँड, मट्ठा, दही एवं ऐसे सभी प्रकारके श्वेत पदार्थोंको खट्टा समझना चाहिये। राजा इनका तथा ऐसे अन्यान्य पदार्थोंका अपने दुर्गमें संचय करे। |
| सैन्धवोद्भिदपाठेयपाक्यसामुद्रलोमकम् ।<br>कुप्यसौवर्चलाविल्वं बालकेयं यवाह्वकम्॥ ६०<br>औव क्षारं कालभस्म विज्ञेयो लवणो गणः।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ६१ | सैन्धव, उद्भिद, पाठेय, पाक्य, सामुद्र (साँभर), लोमक, कुप्य, सौवर्चल, अविल्व, बालकेय, यव, भौम, क्षार, कालभस्म—ये सभी लवणके भेदोपभेद हैं। राजा इन सबका तथा अन्य लवणोंका दुर्गमें संग्रह करे। |
| पिप्पली पिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम्।<br>कुबेरकं च मरिचं शिग्रुभल्लातसर्षपाः॥ ६२<br>कुष्ठाजमोदा किणिही हिङ्गुमूलकधान्यकम्।<br>कारवी कुञ्चिका याज्या सुमुखा कालमालिका॥ ६३<br>फणिज्झकोऽथ लशुनं भूस्तृणं सुरसं तथा।<br>कायस्था च वयःस्था च हरितालं मनःशिला॥ ६४<br>अमृता च रुदन्ती च रोहिषं कुङ्कुमं तथा।<br>जया एरण्डकाण्डीरं शल्लकी हिङ्गिका तथा॥ ६५<br>सर्वपित्तानि मूत्राणि प्रायो हरितकानि च।<br>संगतानि च मूलानि यष्टिश्चातिविषाणि च।<br>फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मैला हिङ्गुपत्रिका॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि गणः कटुकसंज्ञितः।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे प्रयत्नेन नृपोत्तम ॥ ६७ | पीपर, पीपरका मूल, चव्य, शीता, साँठ, कुबेरक, मिर्च, सहजना, भिलावा, सरसों, कुठ, अजमोदा, ओंगा, हींग, मूली, धनियाँ, सौंफ, अजवाइन, मंजीठ, जवीर, कलमालिका, फणिज्जक, लहसुन, पालाके आकारवाला जलीय तृण, हरड़, कायस्था, वयःस्था, हरताल, मैनसिल, गिलोय, रुदंती, रोहिष, केशर, जया, रेड़ी, नरकट, शल्लकी, भारंगी, सभी प्रकारके पित्त और मूत्र, हर्रै, आवश्यक मूल, मुलहठी, अतिविष, छोटी इलायची, तेजपात आदि कटु ओषधियाँ हैं। राजश्रेष्ठ! राजा दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक इनका संग्रह करे। |
| ८७२ | * मत्स्यपुराण * |
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| मुस्तं चन्दनह्रीबेरकृतमालकदारवः।<br>हरिद्रानलदोशीरनक्तमालकदम्बकम् ॥ ६८<br>दूर्वा पटोलकटुका दन्तीत्वक् पत्रकं वचा।<br>किराततिक्तभूतुम्बी विषा चातिविषा तथा॥ ६९<br>तालीसपत्रतगरं सप्तपर्णविकङ्कताः।<br>काकोदुम्बरिका दिव्यास्तथा चैव सुरोद्भवा॥ ७०<br>षड्ग्रन्था रोहिणी मांसी पर्पटश्चाथ दन्तिका।<br>रसाञ्जनं भृङ्गराजं पतङ्गी परिपेलवम् ॥ ७१<br>दुःस्पर्शा गुरुणी कामा श्यामाकं गन्धनाकुली।<br>रूपपर्णी व्याघ्रनखं मञ्जिष्ठा चतुरङ्गुला॥ ७२<br>रम्भा चैवाङ्कुरास्फीता तालास्फीता हरेणुका।<br>वेत्राग्रवेतसस्तुम्बी विषाणी लोध्रपुष्पिणी ॥ ७३<br>मालती करकृष्णाख्या वृश्चिका जीविता तथा।<br>पर्णिका च गुडूची च स गणस्तिक्तसंज्ञकः ॥ ७४<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे।<br>अभयाममलके चोभे तथैव च बिभीतकम् ॥ ७५<br>प्रियङ्गुधातकीपुष्पं मोचाख्या चार्जुनासनाः।<br>अनन्ता स्त्री तुवरिका श्योणाकं कट्फलं तथा॥ ७६<br>भूर्जपत्रं शिलापत्रं पाटलापत्रलोमकम्।<br>समङ्गात्रिवृतामूलकार्पासगैरिकाञ्जनम् ॥ ७७<br>विद्रुमं समधूच्छिष्टं कुम्भिका कुमुदोत्पलम्।<br>न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकिंशुकाः शिंशपा शमी॥ ७८<br>प्रियालपीलुकासारिशिरीषाः पद्मकं तथा।<br>बिल्वोऽग्निमन्थः प्लक्षश्च श्यामाकं च बको धनम् ॥ ७९<br>राजादनं करीरं च धान्यकं प्रियकस्तथा।<br>कङ्कोलाशोकबदराः कदम्बखदिरद्वयम्॥ ८०<br>एषां पत्राणि साराणि मूलानि कुसुमानि च।<br>एवमादीनि चान्यानि कषायाख्यो गणो मतः ॥ ८१<br>प्रयत्नेन नृपश्रेष्ठ राजा संचिनुयात् पुरे।<br>कीटाश्च मारणे योग्या व्यङ्गतायां तथैव च॥ ८२<br>वातधूमाम्बुमार्गाणां दूषणानि तथैव च।<br>धार्याणि पार्थिवैर्दुर्गे तानि वक्ष्यामि पार्थिव ॥ ८३ | नागरमोथा, चन्दन, हीबेर, कृतहारक, दारुहल्दी, हल्दी, नलद, खश, नक्तमाल, कदम्ब, दूर्वा, परवल, तेजपात, वच, चिरायता, भूतुम्बी, विषा, अतिविषा, तालीसपत्र, तगर, छितवन, खैर, काली गूलर, दिव्या, सुरोद्भवा, षड्ग्रन्थी, रोहिणी, जटामासी, पर्पट, दन्ती, रसांजन, भृंगराज, पतंगी, परिपेलव, दुःस्पर्शा, अगुरुद्रव्य, कामा, श्यामाक, गंधनाकुली, तुषपर्णी, व्याघ्रनख, मंजीठ, चतुरंगुला, केला, अंकुरास्फीता, तालास्फीता, रेणुकबीज, बेतका अग्रभाग, बेत, तुम्बी, केंकरासींगी, लोध्रपुष्पिणी, मालती, करकृष्णा, वृश्चिका, जीविता, पर्णिका तथा गुडूच—यह तिक्त औषधियोंका समूह है। राजा इनका तथा इसी प्रकारके अन्य तिक्त पदार्थोंका दुर्गमें संग्रह रखे॥ ५५—७४ १/२ ॥<br><br>हर्रें, बहेड़ा, आँवला, मालकागुन, धायके फूल, मोचरस, अर्जुन, असन, अनन्ता, कामिनी, तुबरिका, श्योणाक, जायफल, भोजपत्र, शिलाजीत, पाटलवृक्ष, लोहबान, समंगा, त्रिवृता, मूल, कपास, गेरु, अंजन, विद्रुम, शहद, जलकुम्भी, कुमुदिनी, कमल, बरगद, गूलर, पीपल, पालाश, शीशम, शमी, प्रियाल, पीलु, कासारि, शिरीष, पद्म, बेल, अरणी, पाकड़, श्यामाक, बक, धन, राजादन, करीर, धनिया, प्रियक, कंकोल, अशोक, बेर, कदंब, दोनों प्रकारके खैर—इन वृक्षोंके पत्ते, सारभाग (सत्त्व), मूल तथा पुष्प काषाय माने गये हैं। राजश्रेष्ठ! राजाको ये काषाय ओषधियाँ दुर्गमें रखनी चाहिये। राजन्! मारने एवं घायल करनेवाले कीट-पतंग तथा वायु, धूम, जल तथा मार्गको दूषित करनेवाली ओषधियोंको, जिन्हें मैं आगे बतलाऊँगा, राजाको दुर्गमें रखनी चाहिये। |
- अध्याय २१८ * | ८७३ ---|---
| विषणं धारणं कार्यं प्रयत्नेन महीभुजा।<br>विचित्राश्चागदा धार्या विषस्य शमनास्तथा॥ ८४<br>रक्षोभूतपिशाचघ्नाः पापघ्नाः पुष्टिवर्धनाः।<br>कलाविदश्च पुरुषाः पुरे धार्याः प्रयत्नतः॥ ८५<br>भीतान् प्रमत्तान् कुपितांस्तथैव च विमानितान्।<br>कुभृत्यान् पापशीलांश्च न राजा वासयेत् पुरे॥ ८६<br>यन्त्रायुधाट्टालचयोपपन्नं<br>समग्रधान्यौषधिसम्प्रयुक्तम् ।<br>वणिग्जनैश्चावृतमावसेत<br>दुर्गं सुपुष्टं नृपतिः सदैव॥ ८७ | राजाको प्रयत्नपूर्वक सभी विषोंका संग्रह करना चाहिये तथा विष-प्रभावको शान्त करनेवाली विचित्र ओषधियोंको भी धारण करना उचित है। राक्षस, भूत तथा पिशाचोंके प्रभावको नष्ट करनेवाले, पापनाशक, पुष्टिकारक पदार्थों तथा कलाविज्ञ पुरुषोंको भी दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिये। राजाको चाहिये कि उस दुर्गमें डरकर भागे हुए, उन्मत्त, क्रुद्ध, अपमानित तथा पापी दुष्ट अनुचरोंको न ठहरने दे। सभी प्रकारके यन्त्र, अस्त्र तथा अट्टालिकाओंके समूहसे संयुक्त, सभी प्रकारके अन्न तथा ओषधियोंसे सुसम्पन्न और व्यवसायी जनोंसे परिपूर्ण दुर्गमें राजाको सदैव सुखपूर्वक निवास करना चाहिये॥ ७५—८७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे दुर्गनिर्माणौषध्यादिसंचयकथनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाओंके लिये दुर्गनिर्माण और ओषधि आदिके संचयका वर्णन नामक दो सौ सतरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१७॥
दो सौ अठारहवाँ अध्याय
दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन
| मनुरुवाच<br>रक्षोघ्नानि विषघ्नानि यानि धार्याणि भूभुजा।<br>अगदानि समाचक्ष्व तानि धर्मभृतां वर॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>बिल्वाटकी यवक्षारं पाटला बाहिकोष्णा।<br>श्रीपर्णी शल्लकीयूक्तो निष्क्वाथः प्रोक्षणं परम्॥ २<br>सविषं प्रोक्षितं तेन सद्यो भवति निर्विषम्।<br>यवसैन्धवपानीयवस्त्रशय्यासनोदकम् ॥ ३<br>कवचाभरणं छत्रं वालव्यजनवेश्मनाम्।<br>शेलुः पाटलातिविषा शिग्रु मूर्वा पुनर्नवा॥ ४<br>समङ्गा वृषमूलं च कपित्थवृषशोषितम्।<br>महादन्तशठं तद्वत् प्रोक्षणं विषनाशनम्॥ ५<br>लाक्षाप्रियङ्गुमञ्जिष्ठा सममेला हरेणुका।<br>यष्ट्याह्वा मधुरा चैव बभ्रुपित्तेन कल्पिताः॥ ६<br>निखनेद् गोविषाणस्थं समरात्रं महीतले।<br>ततः कृत्वा मणिं हेम्ना बद्धं हस्तेन धारयेत्॥ ७ | मनुने पूछा— धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको राक्षस, विष और रोगको दूरकर स्वस्थ करनेवाली जिन ओषधियोंका दुर्गमें संग्रह करना चाहिये, उनका वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>मत्स्यभगवान्ने कहा— बिल्वाटकी, जवाखार, पाटला, बाहिक, ऊषणा, श्रीपर्णी और शल्लकी—इन ओषधियोंका काढ़ा उत्तम प्रोक्षण है। विषग्रस्त प्राणीद्वारा उसका सेवन करनेसे वह तुरंत ही विषरहित हो जाता है। उसी प्रकार इनके द्वारा सेवन करनेसे यव, सैन्धव, पानीय, वस्त्र, शय्या, आसन, जल, कवच, आभरण, छत्र, चामर और गृह आदि विषरहित हो जाते हैं। शेलु, पाटली, अतिविषा, शिग्रु, मूर्वा, पुनर्नवा, समंगा, वृषमूल, कपित्थ, वृषशोषित तथा महादन्तशठ—इन ओषधियोंके काढ़ेका सेवन भी उसी प्रकार विषनाशक होता है। लाह, प्रियंगु, मंजीठ, समान भागमें इलायची, हर्रे, जेठीमधु और मधुरा—इन्हें नकुल-पित्तसे संयुक्त करके गायके सींगमें रखकर सात राततक पृथ्वीमें गाड़ दे। इसके बाद उसे सुवर्णजटित मणिकी अंगूठीमें रखकर हाथमें धारण कर |
२२१- दैव और पुरुषार्थका वर्णन
| ८७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्पृष्टं सविषं तेन सद्यो भवति निर्विषम्।<br>मनोह्वया शमीपत्रं तुम्बिका श्वेतसर्षपाः॥ ८<br>कपित्थकुष्ठमञ्जिष्ठाः पित्तेन श्लक्ष्णकल्पिताः।<br>शुनो गोः कपिलायाश्च सौम्याक्षिसोऽपरो गदः॥ ९<br>विषजित्परमं कार्यं मणिरत्नं च पूर्ववत्।<br>मूषिका जतुका चापि हस्ते बध्वा विषापहा॥ १० | ले। उसका स्पर्श करनेसे विषयुक्त प्राणी तुरंत ही निर्विष हो जाता है। जटामांसी, शमीके पत्ते, तुम्बी, श्वेत सरसों, कपित्थ, कुष्ठ और मंजीठ—इन ओषधियोंको कुत्ते अथवा कपिला गौके पित्तके साथ भावना दे। यह सौम्याक्षिस नामक दूसरी विषनाशक ओषधि है। इसे भी पूर्ववत् मणि एवं रत्ननिर्मित अंगूठीमें रखकर धारण करना चाहिये। इसी प्रकार मूषिका और लाहको भी हाथमें बाँधनेसे विषका शमन होता है॥९-१०॥ | | हरेणुमांसी मञ्जिष्ठा रजनी मधुका मधु।<br>अक्षत्वक् सुरसं लाक्षा श्लपितं पूर्ववद् भुवि॥ ११<br>वादिन्त्राणि पताकाश्च पिष्टैरेतैः प्रलेपिताः।<br>श्रुत्वा दृष्ट्वा समाघ्राय सद्यो भवति निर्विषः॥ १२ | हर्रें, जटामांसी, मंजिष्ठा, हरिद्रा, महुआ, मधु, अक्षत्वक्, सुरसा और लाह—इन्हें भी पूर्ववत् कुत्तेके पित्तसे संयुक्त करके पृथ्वीमें गाड़ दे। फिर इनके लेपसे वाजों तथा पताकाओंपर लेप कर दे तो (विषाक्त प्राणी) उन्हें सुनकर, देखकर और सूँघकर तुरंत विषरहित हो जाता है। | | त्र्यूषणं पञ्चलवणं मञ्जिष्ठा रजनीद्वयम्।<br>सूक्ष्मैला त्रिवृतापत्रं विडङ्गानीन्द्रवारुणी॥ १३<br>मधूकं वेतसं क्षौद्रं विषाणे च निधापयेत्।<br>तस्मादुष्णाम्बुना मात्रं प्रामुक्तं योजयेत् ततः॥ १४<br>विषभुक्तं ज्वरं याति निर्विषं पित्तदोषकृत्। | तीनों कटु (आँवला, हर्रे, बहेरा), पाँचों नमक, मंजीठ, दोनों रजनी, छोटी इलायची, त्रिवृताका पत्ता, बिडंग, इन्द्रवारुणि, मधूक, वेतस तथा मधु—इन सबको सींगमें स्थापित कर दे, फिर वहाँसे निकालकर गर्म जलमें मिला दे। इसके द्वारा विष-भक्षणसे उद्भूत पित्तदोष उत्पन्न करनेवाला ज्वर शान्त हो जाता है। | | शुक्लं सर्जरसोपेतं सर्षपा एलवालुकैः॥ १५<br>सुवेगा तस्करसुरौ कुसुमैरर्जुनस्य तु।<br>धूपो वासगृहे हन्ति विषं स्थावरजङ्गमम्॥ १६<br>न तत्र कीटा न विषं दर्दुरा न सरीसृपाः।<br>न कृत्या कर्मणां चापि धूपोऽयं यत्र दह्यते॥ १७ | श्वेत धूप, सरसों, एलवालुक, सुवेगा, तस्कर, सुर और अर्जुनके पुष्प—इन ओषधियोंका धूपवास करनेवाले घरमें स्थित स्थावर-जङ्गम सभी विषको नष्ट कर देता है। जहाँ वह धूप जलाया जाता है, वहाँ कीट, विष, मेढ़क, रेंगनेवाले सर्पादि जीव तथा कर्मोंकी कृत्या—ये कोई भी नहीं रह सकते। | | कल्पितैश्चन्दनक्षीरपलाशद्रुमवल्कलेः ।<br>मूर्वैलावालुरसरानाकुलीतण्डुलीयकैः ॥ १८<br>क्वाथः सर्वोदकार्येषु काकमाचीयुतो हितः।<br>रोचनापत्रनेपालीकुङ्कुमैस्तिलकान् वहन्॥ १९<br>विषैर्न बाध्यतेऽस्माच्च नरनारीनृपप्रियः। | चन्दन, दुग्ध, पलाश-वृक्षकी छाल, मूर्वा, एलावालुक, सरसों, नाकुली, तण्डुलीय एवं काकमाचीका काढ़ा सभी प्रकारके विषयुक्त जलमें कल्याणकारी होता है। रोचनापत्र, नेपाली, केसरतिलक—इन ओषधियोंको धारण करनेसे मनुष्यको विषका कष्ट नहीं होता, विषदोष नष्ट हो जाता है और वह इसके प्रभावसे स्त्री, पुरुष और राजाका प्रिय हो जाता है॥११—१९३॥ | | चूर्णैर्हरिद्रामञ्जिष्ठाकिणिहीकणनिम्बजैः ॥ २०<br>दिग्धं निर्विषतामेति गात्रं सर्वविषार्दितम्।<br>शिरीषस्य फलं पत्रं पुष्पं त्वङ्न्मूलमेव च॥ २१<br>गोमूत्रघृष्टो ह्यगदः सर्वकर्मकरः स्मृतः। | हल्दी, मंजीठ, किणिही, पिप्पली और नीमके चूर्णका लेप करनेसे सभी प्रकारके विषसे पीड़ित शरीर विषरहित हो जाता है। शिरीष-वृक्षका फल, पत्ता, पुष्प, छाल और जड़—इन सबको गो-मूत्रमें घिसकर तैयार की गयी ओषधि सभी प्रकारके विषकर्ममें हितकारी कही गयी है। | | एकवीर महौषध्यः शृणु चातः परं नृप॥ २२<br>वन्ध्या कर्कोटकी राजन् विष्णुकान्ता तथोत्कटा।<br>शतमूली सितानन्दा बला मोचा पटोलिका॥ २३ | सर्वोत्कृष्ट शूरवीर राजन्! इसके उपरान्त सर्वश्रेष्ठ ओषधियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। राजन्! वन्ध्या, कर्कोटकी, विष्णुकान्ता, उत्कटा, शतमूली, सिता, आनन्दा, |
२२२- साम-नीतिका वर्णन
- अध्याय २१८ * ८७५
| सोमा पिण्डा निशा चैव तथा दग्धरुहा च या।<br>स्थले कमलिनी या च विशाली शङ्खमूलिका ॥ २४<br>चाण्डाली हस्तिमगधा गोऽजापर्णी करम्भिका।<br>रक्ता चैव महारक्ता तथा बर्हिशिखा च या॥ २५<br>कौशातकी नक्तमालं प्रियालं च सुलोचनी।<br>वारुणी वसुगन्धा च तथा वै गन्धनाकुली ॥ २६<br>ईश्वरी शिवगन्धा च श्यामला वंशनालिका।<br>जतुकाली महाश्वेता श्वेता च मधुयष्टिका ॥ २७<br>वज्रकः पारिभद्रश्च तथा वै सिन्धुवारकाः।<br>जीवानन्दा वसुच्छिद्रा नतनागरकण्टका ॥ २८<br>नालं जाली च जाती च तथा च वटपत्रिका।<br>कार्त्तस्वरं महानीला कुन्दुरुर्हंसपादिका ॥ २९<br>मण्डूकपर्णी वाराही द्वे तथा तण्डुलीयके।<br>सर्पाक्षी लवली ब्राह्मी विश्वरूपा सुखाकरा ॥ ३०<br>रुजापहा वृद्धितरी तथा चैव तु शल्यदा।<br>पत्रिका रोहिणी चैव रक्तमाला महौषधी ॥ ३१<br>तथामलकवृन्दाकं श्यामचित्रफला च या।<br>काकोली क्षीरकाकोली पीलुपर्णी तथैव च ॥ ३२<br>केशिनी वृश्चिकाली च महानागा शतावरी।<br>गरुडी च तथा वेगा जले कुमुदिनी तथा ॥ ३३<br>स्थले चोत्पलिनी या च महाभूमिलता च या।<br>उन्मादिनी सोमराजी सर्वरत्नानि पार्थिव ॥ ३४<br>विशेषान्मरकतादीनि कीटपक्षं विशेषतः।<br>जीवजाताश्च मणयः सर्वे धार्याः प्रयत्नतः ॥ ३५<br>रक्षोघ्नाश्च विषघ्नाश्च कृत्या वेतालनाशनाः।<br>विशेषान्नरनागाश्च गोखरोष्ट्रसमुद्भवाः ॥ ३६<br>सर्पतित्तिरगोमायुबभ्रुमण्डूकजाश्च ये।<br>सिंहव्याघ्रर्क्षमार्जारद्वीपिवानरसम्भवाः ।<br>कपिञ्जला गजा वाजिमहिषैषणभवाश्च ये॥ ३७<br>इत्येवमेतैः सकलैरुपेतै-<br>र्द्रव्यैः पराघ्यैः परिरक्षितः स्यात्।<br>राजा वसेत् तत्र गृहं सुशुभ्रं<br>गुणान्वितं लक्षणसम्प्रयुक्तम् ॥ ३८ | बला, मोचा, पटोलिका, सोमा, पिण्डा, निशा, दग्धरुहा, स्थलपद्म, विशाली, शंखमूलिका, चाण्डाली, हस्तिमगधा, गोपर्णी, अजापर्णी, करम्भिका, रक्ता, महारक्ता, बर्हिशिखा, कौशातकी, नक्तमाल, प्रियाल, सुलोचनी, वारुणी, वसुगन्धा, गन्धनाकुली, ईश्वरी, शिवगन्धा, श्यामला, वंशनालिका, जतुकाली, महाश्वेता, श्वेता, मधुयष्टिका, वज्रक, पारिभद्र, सिन्दुवारक, जीवानन्दा, वसुच्छिद्रा, नतनागर, कण्टकारि, नाल, जाली, जाती, वटपत्रिका, सुवर्ण, महानीला, कुन्दुरु, हंसपादिका, मण्डूकपर्णी, दोनों प्रकारकी वाराही, तण्डुलीयके, सर्पाक्षी (नकुलकंद), लवली, ब्राह्मी, विश्वरूपा, सुखाकरा, रुजापहा, वृद्धिकरी, शल्यदा, पत्रिका, रोहिणी, रक्तमाला, आमलक, वृन्दाक, श्यामा, चित्रफला, काकोली, क्षीरकाकोली, पीलुपर्णी, केशिनी, वृश्चिकाली, महानागा, शतावरी, गरुड़ी, वेगा, जलकुमुदिनी, स्थलोत्पल, महाभूमिलता, उन्मादिनी, सोमराजी, सभी प्रकारके रत्न—विशेषकर मरकत आदि बहुमूल्य रत्न, अनेक प्रकारकी कीटज मणियाँ, जीवोंसे उत्पन्न होनेवाली मणियाँ—इन सभीको प्रयत्नपूर्वक दुर्गमें संचित करे। इसी प्रकार राक्षस, विष, कृत्या, वैताल आदिकी नाशक—विशेषकर मनुष्य, सर्प, गौ, गर्दभ, ऊँट, साँप, तीतर, शृगाल, नेवला, मेढक, सिंह, बाघ, रीछ, बिलाव, गैंड़ा, वानर, कपिंजल, हस्ती, अश्व, महिष और हरिण आदि जीवोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपयोगी वस्तुओंका भी राजा संचय करे। इस प्रकार इन सभी बहुमूल्य पदार्थोंसे युक्त रहनेपर वह सुरक्षित रहता है। तब राजा उनमें बने हुए अत्यन्त निर्मल, उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न तथा गुणयुक्त भवनमें निवास करे॥ २०—३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽगदाध्यायो नामाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगदाध्याय नामक दो सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१८॥
२२३- नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन
८७६ * मत्स्यपुराण *
दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय
विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>राजरक्षारहस्यानि यानि दुर्गे निधापयेत्।<br>कारयेद् वा महीभर्ता ब्रूहि तत्त्वानि तानि मे॥ १ | **मनुने पूछा—**भगवन्! राजाको राज्यकी रक्षाके लिये जिन रहस्यपूर्ण साधनोंको दुर्गमें संगृहीत या प्रस्तुत करना चाहिये, उन तत्त्वोंका मुझसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| मत्स्य उवाच<br>शिरीषोदुम्बरशमीबीजपूरं घृतप्लुतम्।<br>क्षुद्योगः कथितो राजन् मासार्धस्य पुरातनैः॥ २ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! शिरीष, गूलर, शमी और बिजौरा नींबू—इनको घृतमें परिप्लुतकर पंद्रह दिनों बाद सेवन करे, प्राचीन लोग इसे 'क्षुद्योग' कहते हैं। |
| कशेरुफलमूलानि इक्षुमूलं तथा विषम्।<br>दूर्वाक्षीरघृतैर्मण्डः सिद्धोऽयं मासिकः परः॥ ३ | कशेरुके मूल भाग तथा फल, ईखके मूल भाग और विषको दूब, दूध और घीके साथ सिद्ध करनेसे बना हुआ पदार्थ मण्ड कहलाता है। एक मास बाद इसका सेवन करना चाहिये। |
| नरं शस्त्रहतं प्रासो न तस्य मरणं भवेत्।<br>कल्माषवेणुना तत्र जनयेत्तु विभावसुम्॥ ४ | इनके सेवनसे हथियारोंसे घायल हुआ मनुष्य मर नहीं सकता। वहाँ चितकबरे रंगवाले बाँसके टुकड़ेसे अग्नि उत्पन्न करे। राजन्! |
| गृहे त्रिरपसव्यं तु क्रियते यत्र पार्थिव।<br>नान्योऽग्निर्ज्वलते तत्र नात्र कार्या विचारणा॥ ५ | उस अग्निको जिस घरमें अपसव्य होकर तीन बार प्रदक्षिणा करे, वहाँ कोई अन्य अग्नि नहीं जल सकती—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। |
| कार्पासास्थ्ना भुजङ्गस्य तेन निर्मोचनं भवेत्।<br>सर्पनिर्वासने धूपः प्रशस्तः सततं गृहे॥ ६ | कपासके साथ सर्पकी हड्डी जलानेसे घरमेंसे सर्पोंका निष्कासन होता है। घरमें निरन्तर इस वस्तुकी धूप करना साँपको निकालनेके लिये विशेष प्रसिद्ध है। |
| सामुद्रसैन्धवयवा विद्युद्दग्धा च मृत्तिका।<br>तयानुलिप्तं यद्वेश्म नाग्निना दह्यते नृप॥ ७ | राजन्! समुद्री नमक, सेन्धा नमक और यवा—ये तीन प्रकारके लवण तथा विद्युत्से जली हुई मिट्टी—इन वस्तुओंसे जिस भवनकी लिपाई होती है, उसे अग्नि नहीं जला सकती। |
| दिवा च दुर्गे रक्ष्योग्निर्वाति वाते विशेषतः।<br>विषाच्च रक्ष्यो नृपतिस्तत्र युक्तिं निबोध मे॥ ८ | दुर्गमें दिनके समय विशेषकर जब वायुका प्रकोप हो, अग्निकी रक्षा करनी चाहिये। विषसे राजाकी रक्षा करनी चाहिये। उस विषयमें मैं युक्ति बतलाता हूँ, सुनिये। |
| क्रीडानििमत्तं नृपतिर्धारयेन्मृगपक्षिणः।<br>अन्नं वै प्राक् परीक्षेत वह्नौ चान्यतरेषु च॥ ९ | राजाको चाहिये कि दुर्गमें क्रीड़ाके लिये कुछ पशु तथा पक्षियोंको रखे। सर्वप्रथम उसे अग्निमें डालकर अथवा अन्य किन्हीं उपायोंसे अन्नकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। |
| वस्त्रं पुष्पमलङ्कारं भोजनाच्छादनं तथा।<br>नापरीक्षितपूर्वं तु स्पृशेदपि महीपतिः॥ १० | वस्त्र, पुष्प, आभरण, भोजन तथा आच्छादन (वस्त्र)—को राजा पहले परीक्षा किये बिना स्पर्श भी न करे। |
| स्याच्चासौ वक्त्रसंतप्तः सोद्वेगं च निरीक्षते।<br>विषदोऽथ विषं दत्तं यच्च तत्र परीक्षते॥ ११ | विष देनेवाले मनुष्यने यदि विष दे दिया है तो उसकी परीक्षाके ये निम्नलिखित लक्षण होते हैं—वह मलिनमुख, उद्वेगपूर्वक देखनेवाला, |
| स्रस्तोत्तरोयो विमनाः स्तम्भकुड्यादिभिस्तथा।<br>प्रच्छादयति चात्मानं लज्जते त्वरते तथा॥ १२ | खिसकती हुई चादरवाला, उदास, खम्भे और भीतकी आड़में अपनेको छिपानेकी चेष्टा करनेवाला, लज्जित तथा शीघ्रता |
२२४- दान-नीतिकी प्रशंसा
- अध्याय २१९ * ८७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भुवं विलिखति ग्रीवां तथा चालयते नृप।<br>कण्डूयति च मूर्धानं परिलोड्याननं तथा॥ १३<br>क्रियासु त्वरितो राजन् विपरीतास्वपि ध्रुवम्।<br>एवमादीनि चिह्नानि विषदस्य परीक्षयेत्॥ १४<br>समीपैर्विक्षिपेद् वह्नौ तदन्नं त्वरान्वितः।<br>इन्द्रायुधसवर्णं तु रूक्षं स्फोटसमन्वितम्॥ १५<br>एकावर्तं तु दुर्गन्धि भृशं चटचटायते।<br>तद्धूमसेवनाजन्तोः शिरोरोगश्च जायते॥ १६ | करनेवाला होता है। राजन्! वह पृथ्वीपर रेखा खींचने लगता है, गर्दन हिलाने लगता है तथा मुखको मलकर सिर खुजलाने लगता है। राजन्! निश्चय ही वह विपरीत कार्योंमें भी शीघ्रता करनेकी चेष्टा करता है। विषदाताके ऐसे ही लक्षण होते हैं। राजाको उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसके द्वारा दिये गये अन्नको शीघ्रतापूर्वक समीपस्थ अग्निमें डाल देना चाहिये। विषैला अन्न अग्निमें पड़ते ही इन्द्रधनुष-जैसे रंगवाला हो जाता है तथा तुरंत ही सूख जाता है। उसमें स्फोट होने लगता है। वह एक ही ओरसे निकलता है, दुर्गन्धयुक्त होता है और अत्यन्त चटचटाने लगता है। उसके धुँएका सेवन करनेसे जीवके सिरमें रोग उत्पन्न हो जाता है ॥१२-१६॥ |
| सविषेऽन्ने निलीयन्ते न च पार्थिव मक्षिकाः।<br>निलीनाश्च विपद्यन्ते संस्पृष्टे सविषे तथा॥ १७<br>विरज्यति चकोरस्य दृष्टिः पार्थिवसत्तम।<br>विकृतिं च स्वरो याति कोकिलस्य तथा नृप॥ १८<br>गतिः स्खलति हंसस्य भृङ्गराजश्च कूजति।<br>क्रौञ्चो मदमथाभ्येति कृकवाकुर्विरौति च॥ १९<br>विक्रोशति शुको राजन् सारिका वमते ततः।<br>चामीकरोऽन्यतो याति मृत्युं कारण्डवस्तथा॥ २०<br>मेहते वानरो राजन् ग्लायते जीवजीवकः।<br>हृष्टरोमा भवेद् बभ्रुः पृषतश्चैव रोदिति॥ २१<br>हर्षमायाति च शिखी विषसंदर्शनान्नृप।<br>अन्नं च सविषं राजंश्चिरेण च विपद्यते॥ २२<br>तदा भवति निःश्राव्यं पक्षपर्युषितोपमम्।<br>व्यापन्नरसगन्धं च चन्द्रिकाभिस्तथा युतम्॥ २३<br>व्यञ्जनानां तु शुष्कत्वं द्रवाणां बुद्बुदोद्भवः।<br>ससैन्धवानां द्रव्याणां जायते फेनमालिता॥ २४<br>शस्यराजिश्च ताम्रा स्यान्नीला च पयसस्तथा।<br>कोकिलाभा च मद्यस्य तोयस्य च नृपोत्तम॥ २५<br>धान्याम्लस्य तथा कृष्णा कपिला कोद्रवस्य च।<br>मधुश्यामा च तक्रस्य नीला पीता तथैव च॥ २६ | राजन्! विषयुक्त अन्नके ऊपर मक्खियाँ नहीं बैठतीं, यदि बैठ गयीं तो विषसंयुक्त अन्नका स्पर्श होनेके कारण तुरंत ही मर जाती हैं। पार्थिवश्रेष्ठ! विषयुक्त अन्नको देखते ही चकोरकी दृष्टि विरक्त हो जाती है अर्थात् वह अपनी आँखें फेर लेता है, कोकिलका स्वर विकृत हो जाता है, हंसकी गति लड़खड़ाने लगती है, भौंर जोरसे गूँजने लगते हैं, क्रौंच (कुरर) मदमत्त हो जाता है और मुर्गा जोर-जोरसे बोलने लगता है। राजन्! शुक चें-चें करने लगता है, सारिका वमन करने लगती है, चामीकर भाग खड़ा होता है और कारण्डव मर जाता है। राजन्! वानर मूत्र-त्याग करने लगता है, जीवजीवक ग्लानियुक्त हो जाता है, नेवलेके रोएँ खड़े हो जाते हैं, पृषत् मृग रोने लगता है। राजन्! विषको देखते ही मयूर हर्षित हो जाता है; क्योंकि वह चिरकालसे विषयुक्त अन्नका भोजन करनेवाला है। राजन्! वह विषयुक्त अन्न कहने योग्य नहीं रह जाता, पंद्रह दिनके बासी अन्नकी तरह दीख पड़ता है। उसका रस तथा गन्ध नष्ट हो जाती है तथा ऊपरसे वह चन्द्रिकाओंसे युक्त रहता है। नृपोत्तम! विषके मिलनेसे बना हुआ व्यञ्जन सूख जाता है, द्रव वस्तुओंमें बुल्ले उठने लगते हैं, लवणसहित पदार्थोंमें फेन उठने लगते हैं। अन्नोंसे बना हुआ विषैला भोजन ताम्रवर्णका, दूधवाला नीले रंगका, मदिरा तथा जलयुक्त कोकिलके समान काला, अम्ल अन्नवाला काला, कोदोका कपिल तथा मट्ठायुक्त भोजन मधुके समान श्यामल, नीला और पीला हो जाता है॥ १७-२६॥ |
| घृतस्योदकसंकाशा कपोताभा च मस्तुनः।<br>हरिता माक्षिकस्यापि तैलस्य च तथारुणा॥ २७ | विषयुक्तघृतका वर्ण जलकी भाँति, विषमिश्रित छछका कबूतरकी तरह, मधुयुक्तका हरा और तेलमिश्रित विषका |
२२५- दण्डनीतिका वर्णन
८७८ * मत्स्यपुराण *
| फलानाम्प्यपक्वानां पाकः क्षिप्रं प्रजायते।<br>प्रकोपश्चैव पक्वानां माल्यानां म्लानता तथा॥ २८<br>मृदुता कठिनानां स्यान्मृदूनां च विपर्ययः।<br>सूक्ष्माणां रूपदलनं तथा चैवातिरङ्गता॥ २९<br>श्याममण्डलता चैव वस्त्राणां वै तथैव च।<br>लौहानां च मणीनां च मलपङ्कोपदिग्धता॥ ३०<br>अनुलेपनगन्धानां माल्यानां च नृपोत्तम।<br>विगन्धता च विज्ञेया वर्णानां म्लानता तथा।<br>पीतावभासता ज्ञेया तथा राजन् जलस्य तु॥ ३१<br>दन्ता ओष्ठौ त्वचः श्यामास्तनुसत्त्वास्तथैव च।<br>एवमादीनि चिह्नानि विज्ञेयानि नृपोत्तम॥ ३२<br>तस्माद् राजा सदा तिष्ठेन् मणिमन्त्रौषधागदैः।<br>उक्तैः संरक्षितो राजा प्रमादपरिवर्जकः॥ ३३<br>प्रजातारोमूलमिहावनीश-<br> स्तद्रक्षणाद् राष्ट्रमुपैति वृद्धिम्।<br>तस्मात् प्रयत्नेन नृपस्य रक्षा<br> सर्वेण कार्या रविवंशचन्द्र॥ ३४ | लाल रंग हो जाता है। विषके संसर्गसे न पके हुए फल शीघ्र ही पक जाते हैं और पका हुआ फल विकृत हो जाता है। पुष्प-मालाएँ मलिन हो जाती हैं। कठोर वस्तु कोमल तथा कोमल वस्तु कठोर हो जाती है। सूक्ष्म वस्तुओंका रूप नष्ट हो जाता है और रंग बदल जाता है। वस्त्रोंमें विशेषकर काले धब्बे पड़ जाते हैं। लोहे और मणियोंपर मैल जम जाती है। नृपश्रेष्ठ! शरीरमें लेपन किये जानेवाले द्रव्यों एवं उपयोगमें आनेवाली पुष्प-मालाओंमें दुर्गन्धि तथा रंगकी मलिनता समझनी चाहिये। राजन्! उसी प्रकार जलमें भी पीलेपनका आभास आने लगता है। नृपोत्तम! विषके सेवनसे दाँत, होंठ और चमड़े श्यामल वर्णके हो जाते हैं और शरीरमें क्षीणताका अनुभव होने लगता है—इस प्रकार ये लक्षण जानने चाहिये। इसलिये राजाको सर्वदा मणि, मन्त्र और उपर्युक्त ओषधियोंसे सुरक्षित तथा सावधान रहना चाहिये। सूर्यवंशके चन्द्र! इस पृथ्वीपर प्रजारूपी वृक्षकी जड़ राजा है, अतः उसीकी रक्षासे राष्ट्रकी वृद्धि होती है। इसलिये सभीको प्रयत्नपूर्वक राजाकी रक्षा करनी चाहिये॥ २७–३४॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे राजरक्षा नामैकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें राजरक्षा नामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१९॥
दो सौ बीसवाँ अध्याय
राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| राजन् पुत्रस्य रक्षा च कर्तव्या पृथिवीक्षिता।<br>आचार्यश्चात्र कर्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभिः॥ १ | राजन्! राजाको अपने पुत्रकी रक्षा करनी चाहिये। उसकी शिक्षाके लिये पहरेदारोंकी देख-रेखमें एक ऐसे आचार्यकी नियुक्ति करनी चाहिये, |
| धर्मकामार्थशास्त्राणि धनुर्वेदं च शिक्षयेत्।<br>रथे च कुञ्जरे चैनं व्यायामं कारयेत् सदा॥ २ | जो उसे धर्म, काम एवं अर्थशास्त्र, धनुर्वेद तथा रथ एवं हाथीकी सवारीकी शिक्षा दे और सदा व्यायाम कराये। साथ ही उसे शिल्पकलाएँ भी सिखलाये। उसपर ऐसा प्रभाव पड़े कि वह गुरुजनोंके सम्मुख असत्य एवं अप्रिय बात न बोले। उसके शरीरकी रक्षाके व्याजसे रक्षक नियुक्त कर दे। इसे क्रोधी, लोभी और तिरस्कृत व्यक्तियोंकी संगतिमें नहीं जाने देना चाहिये। उसे इस प्रकार जितेन्द्रिय बनाना चाहिये कि जिससे वह युवावस्था आनेपर |
| शिल्पानि शिक्षयेच्चैनं नास्र्मिमिथ्याप्रियं वदेत्।<br>शरीररक्षाव्याजेन रक्षिणोऽस्य नियोजयेत्॥ ३ | |
| न चास्य सङ्गो दातव्यः क्रुद्धलुब्धावमानितैः।<br>तथा च विनयेदेनं यथा यौवनगोचरे॥ ४ |
२२६- सामान्य राजनीतिका निरूपण
| * अध्याय २२० * | ८७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रियैर्नापकृष्येत सतां मार्गात् सुदुर्गमात्।<br>गुणाधानमशक्यं तु यस्य कर्तुं स्वभावतः॥ ५<br>बन्धनं तस्य कर्तव्यं गुप्तदेशे सुखान्वितम्।<br>अविनीतं कुमारं हि कुलमाशु विशीर्यते॥ ६<br>अधिकारेषु सर्वेषु विनीतं विनियोजयेत्।<br>आदौ स्वल्पे ततः पश्चात् क्रमेणाथ महत्स्वपि॥ ७<br>मृगयापानमक्षांश्च वर्जयेत् पृथिवीपतिः।<br>एतांस्तु सेवमानास्तु विनष्टाः पृथिवीक्षितः॥ ८<br>बहवो नृपशार्दूल तेषां संख्या न विद्यते।<br>वृथाटनं दिवास्वप्नं विशेषेण विवर्जयेत्॥ ९<br>वाक्पारुष्यं न कर्तव्यं दण्डपारुष्यमेव च।<br>परोक्षनिन्दा च तथा वर्जनीया महीक्षिता॥ १० | इन्द्रियोंद्वारा अत्यन्त दुर्गम सत्पुरुषोंके मार्गसे अपकृष्ट न किया जा सके। जिस राजकुमारमें स्वभाववश गुणाधान करना अशक्य हो उसे गुप्तस्थानमें सुखपूर्वक अवरुद्ध कर देना चाहिये, क्योंकि उद्दण्ड राजकुमारसे युक्त कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। राजाको सभी अधिकारोंपर सुशिक्षित व्यक्तिको नियुक्त करना चाहिये। प्रथमतः उसे छोटे पदपर नियुक्त करे, तत्पश्चात् क्रमशः अधिक शिक्षितकर ऊँचे पदोंपर भी पहुँचा दे। राजसिंह! राजाको शिकार, मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ाका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि पूर्वकालमें इनके सेवनसे बहुत-से राजा नष्ट हो चुके हैं, जिनकी गणना नहीं कही जा सकती। राजाके लिये व्यर्थ घूमना तथा विशेषकर दिनमें शयन करना वर्जित है। राजाको कटुवचन बोलना और कठोर दण्ड देना—ये दोनों कर्म नहीं करना चाहिये। राजाको परोक्षमें किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है॥ १–१०॥ |
| अर्थस्य दूषणं राजा द्विप्रकारं विवर्जयेत्।<br>अर्थानां दूषणं चैकं तथार्थेषु च दूषणम्॥ ११<br>प्राकाराणां समुच्छेदो दुर्गादीनामसत्क्रिया।<br>अर्थानां दूषणं प्रोक्तं विप्रकीर्णत्वमेव च॥ १२<br>अदेशकाले यद्दानमपात्रे दानमेव च।<br>अर्थेषु दूषणं प्रोक्तमसत्कर्मप्रवर्तनम्॥ १३<br>कामः क्रोधो मदो मानो लोभो हर्षस्तथैव च।<br>एते वर्ज्याः प्रयत्नेन सादरं पृथिवीक्षिता॥ १४<br>एतेषां विजयं कृत्वा कार्यों भृत्यजयस्ततः।<br>कृत्वा भृत्यजयं राजा पौरान् जानपदान् जयेत्॥ १५<br>कृत्वा च विजयं तेषां शत्रून् बाह्यांस्ततो जयेत्।<br>बाह्याश्च विविधा ज्ञेयास्तुल्याभ्यन्तरकृत्रिमाः॥ १६<br>गुरुवस्ते यथापूर्वं तेषु यत्नपरो भवेत्।<br>पितृपैतामहं मित्रममित्रं च तथा रिपोः॥ १७<br>कृत्रिमं च महाभाग मित्रं त्रिविधमुच्यते।<br>तथापि च गुरुः पूर्वं भवेत् तत्रापि चादृतः॥ १८<br>स्वाम्यमात्यौ जनपदो दुर्गं दण्डस्तथैव च।<br>कोशो मित्रं च धर्मज्ञ सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते॥ १९<br>सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलं स्वामी प्रकीर्तितः।<br>तन्मूलत्वात् तथाङ्गानां स तु रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ २० | राजाको दो प्रकारके अर्थदोषोंसे बचना चाहिये—एक अर्थका दोष और दूसरा अर्थ-सम्बन्धी दोष। अपने दुर्गके परकोटोंका तथा मूलदुर्ग आदिकी उपेक्षा और अस्तव्यस्तता—ये अर्थके दोष कहे गये हैं। उसी प्रकार कुदेश और कुसमयमें दिया गया दान, कुपात्रको दिया गया दान और असत्कर्मका प्रचार—ये अर्थ-सम्बन्धी दोष कहे गये हैं। राजाको आदरसहित काम, क्रोध, मद, मान, लोभ तथा हर्षका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। राजाको इनपर विजय प्राप्त करनेके पश्चात् अनुचरोंको जीतना चाहिये। इस प्रकार अनुचरोंको जीतनेके बाद पुरवासियों और देशवासियोंको अपने अधिकारमें करे। उनको जीतनेके पश्चात् बाहरी शत्रुओंको परास्त करे। तुल्य, आभ्यन्तर और कृत्रिम-भेदसे बाह्य शत्रुओंको अनेकों प्रकारका समझना चाहिये। उनमेंसे क्रमशः एक-एकको बढ़कर समझना चाहिये और उनको जीतनेमें यत्नशील रहे। महाभाग! मित्र तीन प्रकारके होते हैं—प्रथम वे हैं जो पिता-पितामह आदिके कालसे मित्रताका व्यवहार करते चले आ रहे हैं। दूसरे वे हैं, जो शत्रुके शत्रु हैं तथा तीसरे वे हैं, जो किन्हीं कारणोंसे पीछे मित्र बनते हैं। इन तीनों मित्रोंमें प्रथम मित्र उत्तम होता है, उसका आदर करना चाहिये। धर्मज्ञ! स्वामी, मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना, कोश तथा मित्र—ये राज्यके सात अङ्ग कहे गये हैं। इस सप्ताङ्गयुक्त राज्यका भी मूल स्वयं राजा कहा गया है। राज्यका तथा राज्याङ्गोंका मूल होनेके कारण वह प्रयत्नपूर्वक रक्षणीय है॥ ११–२०॥ |
८८० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| षडङ्गरक्षा कर्तव्या तथा तेन प्रयत्नतः।<br>अङ्गेभ्यो यस्त्वैकस्य द्रोहमाचरतेऽल्पधीः॥ २१<br>वधस्तस्य तु कर्तव्यः शीघ्रमेव महीक्षिता।<br>न राज्ञा मृदुना भाव्यं मृदुर्हि परिभूयते॥ २२<br>न भाव्यं दारुणेनातितीक्ष्णादुद्विजते जनः।<br>काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः॥ २३<br>राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वयं भवेत्।<br>भृत्यैः सह महीपालः परिहासं विवर्जयेत्॥ २४<br>भृत्याः परिभवन्तीह नृपं हर्षवशं गतम्।<br>व्यसनानि च सर्वाणि भूपतिः परिवर्जयेत्॥ २५<br>लोकसंग्रहणार्थाय कृतकव्यसनी भवेत्।<br>शौण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतसः॥ २६<br>जना विरागमायान्ति सदा दुःसेव्यभावतः।<br>स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सर्वस्यैव महीपतिः॥ २७<br>वध्येष्वपि महाभाग भ्रुकुटिं न समाचरेत्।<br>भाव्यं धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थूललक्ष्येण भूभुजा॥ २८<br>स्थूललक्ष्यस्य वशगा सर्वा भवति मेदिनी।<br>अदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्थिवः॥ २९<br>दीर्घसूत्रस्य नृपतेः कर्महानिर्ध्रुवं भवेत्।<br>रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि॥ ३०<br>अप्रिये चैव कर्तव्ये दीर्घसूत्रः प्रशस्यते। | फिर राजाके द्वारा राज्यके शेष छः अङ्गोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जानी चाहिये। जो मूर्ख इन छः अङ्गोंमेंसे किसी एकके साथ द्रोह करता है उसे राजाको शीघ्र ही मार डालना चाहिये। राजाको कोमल वृत्तिवाला नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोमल वृत्तिवाला राजा पराजयका भागी होता है। साथ ही अधिक कठोर भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि अधिक कठोर शासकसे लोग उद्विग्न हो जाते हैं। जो लोकद्वयापेक्षी राजा समयपर मृदु तथा समयपर कठोर हो जाता है, वह दोनों लोकोंपर विजयी हो जाता है। राजाको अपने अनुचरोंके साथ परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि उस समय आनन्दमें निमग्न हुए राजाका अनुचरगण अपमान कर बैठते हैं। राजाको सभी प्रकारके व्यसनोंसे दूर रहना चाहिये, किंतु लोकसंग्रहके लिये उसे कुछ ऊपरसे अच्छी बातोंका व्यसन करना उचित है। गर्वीले एवं नित्य ही उद्धत स्वभाववाले राजासे लोग कठिनतासे अनुकूल होनेके कारण विरक्त हो जाते हैं, अतः राजाको सभीसे मुसकानपूर्वक बातें करनी चाहिये। महाभाग! यहाँतक कि प्राणदण्डके अपराधीको भी वह भ्रुकुटि न दिखलाये। धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको महान् लक्ष्ययुक्त होना चाहिये; क्योंकि सारी पृथ्वी स्थूललक्ष्य रखनेवाले राजाके अधीन हो जाती है। राजाको सभी कार्योंके निर्वाहमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि विलम्ब करनेवाले राजाके कार्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। केवल अनुराग, दर्प, आत्मसम्मान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कार्योंमें दीर्घसूत्री प्रशंसित माना गया है॥ २१—३० १/२॥ |
| राज्ञा संवृतमन्त्रेण सदा भाव्यं नृपोत्तम॥ ३१<br>तस्यासंवृतमन्त्रस्य राज्ञः सर्वापदो ध्रुवम्।<br>कृतान्येव तु कार्याणि ज्ञायन्ते यस्य भूपतेः॥ ३२<br>नारब्धानि महाभाग तस्य स्याद् वसुधा वशे।<br>मन्त्रमूलं सदा राज्यं तस्मान्मन्त्रः सुरक्षितः॥ ३३<br>कर्तव्यः पृथिवीपालैर्मन्त्रभेदभयात् सदा।<br>मन्त्रवित्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनां सुखावहः॥ ३४<br>मन्त्रच्छलेन बहवो विनष्टाः पृथिवीक्षितः।<br>आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च॥ ३५<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः।<br>न यस्य कुशलैस्तस्य वशे सर्वा वसुंधरा॥ ३६<br>भवतीह महीभर्तुः सदा पार्थिवनन्दन। | नृपोत्तम! राजाको सदा अपनी मन्त्रणा गुप्त रखनी चाहिये; क्योंकि प्रकट मन्त्रणावाले राजाको निश्चय ही सभी आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं। महाभाग! जिस राजाके कार्योंको आरम्भके समय नहीं, अपितु पूरा होनेपर ही लोग जान पाते हैं उसके वशमें वसुंधरा हो जाती है। मन्त्र ही सर्वदा राज्यका मूल है, अतः मन्त्रभेदके भयसे राजाओंको उसे सदा सुरक्षित रखना चाहिये। मन्त्रज्ञ मन्त्रीद्वारा दिया गया मन्त्र सभी सम्पत्तियों तथा सुखोंको देनेवाला होता है। मन्त्रके छलसे बहुत-से राजा विनष्ट हो चुके हैं। आकृति, संकेत, गति, चेष्टा, वचन, नेत्र तथा मुखके विकारोंसे अन्तःस्थित मनोभावोंका पता लगता है। राजपुत्र! जिस राजाके मनका इन उपर्युक्त उपायोंद्वारा कुशल लोग भी पता न लगा सकें, वसुंधरा उसके वशमें सदा बनी रहती है॥ ३१—३६ १/२॥ |
२२७- दण्डनीतिका निरूपण
* अध्याय २२० * ८८१
| नैकस्तु मन्त्रयेन्मन्त्रं राजा न बहुभिः सह॥ ३७ | राजाको कभी केवल एक व्यक्तिके या एक ही साथ अनेक लोगोंके साथ मन्त्रणा नहीं करनी चाहिये। |
| नारोहेद् विषमां नावमपरीक्षितनाविकाम्।<br>ये चास्य भूमिजयिनो भवेयुः परिपन्थिनः॥ ३८ | राजा जिसकी परीक्षा न की गयी हो ऐसी विषम नौकापर सवार न हो। राजाके जो भूमिविजेता शत्रु हों, |
| तानानयेद् वशे सर्वान् सामादिभिरुपक्रमैः।<br>यथा न स्यात् कृशीभावः प्रजानामनवेक्षया॥ ३९ | उन सबको सामादि उपायोंद्वारा वशमें लाना चाहिये। अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर राजाका यह कर्तव्य है कि वह उपेक्षाके कारण प्रजाओंको दुर्बल न होने दे। |
| तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्रं परिरक्षता।<br>मोहाद् राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया॥ ४० | जो अज्ञानवश असावधानीसे अपने राष्ट्रको दुर्बल कर देता है, |
| सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः।<br>भृतो वत्सो जातबलः कर्मयोग्यो यथा भवेत्॥ ४१ | वह शीघ्र ही भाई-बन्धुओंसहित राज्य एवं जीवनसे च्युत हो जाता है। महाभाग! जिस प्रकार पालतू बछड़ा बलवान् होनेपर कार्य करनेमें समर्थ होता है |
| तथा राष्ट्रं महाभाग भृतं कर्मसहं भवेत्।<br>यो राष्ट्रमनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षति॥ ४२ | उसी तरह पालन-पोषणकर समृद्ध किया हुआ राष्ट्र भी भविष्यमें कार्यक्षम हो जाता है। जो अपने राष्ट्रके ऊपर अनुग्रहकी दृष्टि रखता है, वस्तुतः वही राज्यकी रक्षा कर सकता है। |
| संजातमुपजीवेत् तु विन्दते स महत्फलम्।<br>राष्ट्राद्धिरण्यं धान्यं च महीं राजा सुरक्षिताम्॥ ४३ | जो उत्पन्न हुई प्रजाओंकी रक्षा करता है, वह महान् फलका भागी होता है। राजा राष्ट्रसे सुवर्ण, अन्न और सुरक्षित पृथ्वी प्राप्त करता है। |
| महता तु प्रयत्नेन स्वराष्ट्रस्य च रक्षिता।<br>नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च यथा माता यथा पिता॥ ४४ | माता और पिताके समान अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला नृपति विशेष प्रयत्नसे नित्यप्रति स्वकीय एवं परकीय दोनों ओरसे होनेवाली बाधाओंसे अपने राष्ट्रकी रक्षा करे। |
| गोपितानि सदा कुर्यात् संयतानीन्द्रियाणि च।<br>अजस्रमुपयोक्तव्यं फलं तेभ्यस्तथैव च॥ ४५ | अपनी इन्द्रियोंको संयत तथा गुप्त रखे और सर्वदा उनका प्रयोग गोपनीय रूपसे करे, तभी उनसे उत्तम फल प्राप्त होता है। |
| सर्वं कर्मेदमायत्तं विधाने दैवमानुषे।<br>तयोर्दैवमचिन्त्यं च पौरुषे विद्यते क्रिया॥ ४६ | जीवनके सभी कार्य दैव और पौरुष—इन दोनोंके अधिकारमें रहते हैं। उन दोनोंमें दैव तो अचिन्त्य है, किंतु पौरुषमें क्रिया विद्यमान रहती है। |
| एवं महीं पालयतोऽस्य भर्तु-<br>र्लोकानुरागः परमो भवेत्।<br>लोकानुरागप्रभवा च लक्ष्मी-<br>र्लक्ष्मीवतश्चापि परा च कीर्तिः॥ ४७ | इस प्रकार पृथ्वीका पालन करनेवाले राजाके प्रति प्रजाका परम अनुराग हो जाता है। प्रजाके अनुरागसे राजाको लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मीवान् राजाको ही परम यशकी प्राप्ति होती है॥ ३७-४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मानुकीर्तने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजधर्मकीर्तन नामक दो सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२०॥
| ८८२ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय
दैव और पुरुषार्थका वर्णन
| मनुरुवाच | **मनुने पूछा—**देव! भाग्य और पुरुषार्थ—इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह मुझे बतलाइये। इस विषयमें मुझे संदेह है, अतः आप उसका सम्पूर्णरूपसे निवारण कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| दैवे पुरुषकारे च किं ज्यायस्तद् ब्रवीहि मे।<br>अत्र मे संशयो देव छेत्तुमर्हस्यशेषतः॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! अन्य जन्ममें अपने द्वारा किया गया पुरुषार्थ (कर्म) ही दैव कहा जाता है, इसी कारण इन दोनोंमें मनीषियोंने पौरुषको ही श्रेष्ठ माना है; क्योंकि माङ्गलिक आचरण करनेवाले एवं नित्य-प्रति अभ्युदयशील पुरुषोंका प्रतिकूल दुर्दैव भी पुरुषार्थद्वारा नष्ट हो जाता है। मानवश्रेष्ठ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें सात्त्विक कर्म किया है, उन्हींमें किन्हीं-किन्हींको पुरुषार्थके बिना भी अच्छे फलकी प्राप्ति देखी जाती है। लोकमें रजोगुणी पुरुषको कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति होती है और तमोगुणी पुरुषको कठिन कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति जाननी चाहिये॥ २—५॥ |
| स्वमेव कर्म दैवाख्यं विद्धि देहान्तरार्जितम्।<br>तस्मात् पौरुषमेवेह श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः॥ २ | |
| प्रतिकूलं तथा दैवं पौरुषेण विहन्यते।<br>मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यमुत्थानशालिनाम्॥ ३ | |
| येषां पूर्वकृतं कर्म सात्त्विकं मनुजोत्तम।<br>पौरुषेण विना तेषां केषांचिद् दृश्यते फलम्॥ ४ | |
| कर्मणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फलम्।<br>कृच्छ्रेण कर्मणा विद्धि तामसस्य तथा फलम्॥ ५ | |
| पौरुषेणाप्यते राजन् प्रार्थितव्यं फलं नरैः।<br>दैवमेव विजानन्ति नराः पौरुषवर्जिताः॥ ६ | राजन्! मनुष्योंको पुरुषार्थद्वारा अभिलषित पदार्थकी प्राप्ति होती है, किंतु जो लोग पुरुषार्थसे हीन हैं, वे दैवको ही सब कुछ मानते हैं। अतः तीनों कालोंमें पुरुषार्थयुक्त दैव ही सफल होता है। राजन्! भाग्ययुक्त मनुष्यका पुरुषार्थ समयपर फल देता है। पुरुषोत्तम! दैव, पुरुषार्थ और काल—ये तीनों संयुक्त होकर मनुष्यको फल देनेवाले होते हैं। कृषि और वृष्टिका संयोग होनेसे फलकी सिद्धियाँ देखी जाती हैं, किंतु वे भी समय आनेपर ही दिखायी पड़ती हैं, बिना समयके किसी प्रकार भी नहीं। इसलिये मनुष्यको सर्वदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ करना चाहिये। उसके इस लोकमें आपत्तियोंमें पड़ जानेपर भी परलोकमें उसे निश्चय ही फल प्राप्त होगा। आलसी और भाग्यपर निर्भर रहनेवाले पुरुषोंको अर्थोंकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे पुरुषार्थ करनेमें तत्पर रहना चाहिये। राजेन्द्र! लक्ष्मी भाग्यपर भरोसा रखनेवाले एवं आलसी पुरुषोंको छोड़कर पुरुषार्थ करनेवाले पुरुषोंको यत्नपूर्वक ढूँढ़कर वरण करती है, इसलिये सर्वदा पुरुषार्थशील होना चाहिये॥ ६—१२॥ |
| तस्मात् त्रिकालं संयुक्तं दैवं तु सफलं भवेत्।<br>पौरुषं दैवसम्पत्त्या काले फलति पार्थिव॥ ७ | |
| दैवं पुरुषकारश्च कालश्च पुरुषोत्तम।<br>त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितं स्यात् फलावहम्॥ ८ | |
| कृषेर्वृष्टिसमायोगाद् दृश्यन्ते फलसिद्धयः।<br>तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नैवाकाले कथञ्चन॥ ९ | |
| तस्मात् सदैव कर्तव्यं सधर्मं पौरुषं नरैः।<br>विपत्तावपि यस्येह परलोके ध्रुवं फलम्॥ १० | |
| नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न च दैवपरायणाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पौरुषे यत्नमाचरेत्॥ ११ | |
| त्यक्त्वाऽऽलसान् दैवपरान् मनुष्या-<br>नुत्थानयुक्तान् पुरुषान् हि लक्ष्मीः।<br>अन्विष्य यत्नाद्वृणुयान्नृपेन्द्र<br>तस्मात् सदोत्थानवता हि भाव्यम्॥ १२ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे दैवपुरुषकारवर्णनं नामैकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दैव-पुरुषका वर्णन नामक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२१॥
* अध्याय २२२ * ८८३
दो सौ बाईसवाँ अध्याय
साम-नीतिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा— महान् द्युतिशील भगवन्! अब आप साम आदि उपायोंका वर्णन कीजिये। देवश्रेष्ठ! साथ ही उनका लक्षण और प्रयोग भी बतलाइये॥ १॥ |
|---|---|
| उपायांस्त्वं समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते।<br>लक्षणं च तथा तेषां प्रयोगं च सुरोत्तम॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— मनुजेश्वर! (राजनीतिमें) साम (स्तुति-प्रशंसा), भेद, दान, दण्ड, उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल—ये सात प्रयोग बतलाये गये हैं। राजन्! उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनिये! साम तथ्य और अतथ्यभेदसे दो प्रकारका कहा गया है। उनमें भी अतथ्य (झूठी प्रशंसा) साधु पुरुषोंकी अप्रसन्नताका ही कारण बन जाती है। नरोत्तम! इसलिये सज्जन व्यक्तिको प्रयत्नपूर्वक तथ्य साम (सच्ची प्रशंसा)-से वशमें करना चाहिये। जो उन्नत कुलमें उत्पन्न, सरलप्रकृति, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय हैं, वे (तथ्य) सामसे ही साध्य होते हैं, अतः उनके प्रति अतथ्य सामका प्रयोग नहीं करना चाहिये। उनके प्रति तथ्य सामका प्रयोग, उनके कुल और शील-स्वभावका वर्णन, किये गये उपकारोंकी चर्चा तथा अपनी कृतज्ञताका कथन करना चाहिये। इसी युक्ति तथा इस प्रकारके सामसे धर्ममें तत्पर रहनेवालोंको अपने वशमें करना चाहिये। यद्यपि राक्षस भी साम-नीतिके द्वारा वशमें किये जाते हैं—ऐसी पराश्रुति है, तथापि असत्पुरुषोंके प्रति इसका प्रयोग उपकारी नहीं होता। दुर्जन पुरुष सामकी बातें करनेवालेको अतिशय डरा हुआ समझते हैं, इसलिये उनके प्रति इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। राजन्! जो पुरुष शुद्ध वंशमें उत्पन्न, सरलप्रकृतिवाले, विनम्र, धर्मिष्ठ, सत्यवादी, विनयी एवं सम्मानी हैं, वे ही निरन्तर सामद्वारा साध्य बतलाये गये हैं॥२—१०॥ |
| साम भेदस्तथा दानं दण्डश्च मनुजेश्वर।<br>उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव॥ २<br>प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु।<br>द्विविधं कथितं साम तथ्यं चातथ्यमेव च॥ ३<br>तत्राप्यतथ्यं साधूनामाक्रोशिवायैव जायते।<br>तत्र साधुः प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम॥ ४<br>महाकुलीना ऋजवो धर्मनित्या जितेन्द्रियाः।<br>सामसाध्या न चातथ्यं तेषु साम प्रयोजयेत्॥ ५<br>तथ्यं साम च कर्तव्यं कुलशीलादिवर्णनम्।<br>तथा तदुपचाराणां कृतानां चैव वर्णनम्॥ ६<br>अनयैव तथा युक्त्या कृतज्ञाख्यापनं स्वकम्।<br>एवं साम्ना च कर्तव्या वशगा धर्मतत्पराः॥ ७<br>साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा श्रुतिः।<br>तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्तं नोपकारकम्॥ ८<br>अतिशङ्कितमित्येवं पुरुषं सामवादिनम्।<br>असाधवो विजानन्ति तस्मात् तेषु वर्जयेत्॥ ९<br>ये शुद्धवंशा ऋजवः प्रणीता<br>धर्मे स्थिताः सत्यपरा विनीताः।<br>ते सामसाध्याः पुरुषाः प्रदिष्टा<br>मानोन्नता ये सततं च राजन्॥ १० |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे सामबोधो नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें सामबोध नामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२२॥
८८४ * मत्स्यपुराण *
दो सौ तेईसवाँ अध्याय
नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| परस्परं तु ये दुष्टाः क्रुद्धा भीतावमानिताः।<br>तेषां भेदं प्रयुञ्जीत भेदसाध्या हि ते मताः॥ १<br>ये तु येनैव दोषेण परस्मान्नापि बिभ्यति।<br>ते तु तद्दोषपातेन भेदनीया भृशं ततः॥ २<br>आत्मीयां दर्शयेदाशां परस्माद् दर्शयेद् भयम्।<br>एवं हि भेदयेद् भिन्नान् यथावद् वशमानयेत्॥ ३<br>संहता हि विना भेदं शक्रेणापि सुदुःसहा।<br>भेदमेव प्रशंसन्ति तस्मान्नयविशारदाः॥ ४<br>स्वमुखेनाश्रयेद् भेदं भेदं परमुखेन च।<br>परीक्ष्य साधु मन्येत भेदं परमुखाच्छ्रुतम्॥ ५<br>सद्यः स्वकार्यमुद्दिश्य कुशलैर्ये हि भेदिताः।<br>भेदितास्ते विनिर्दिष्टा नैव राज्ञाऽर्थवादिभिः॥ ६<br>अन्तःकोपो बहिःकोपो यत्र स्यातां महीक्षिताम्।<br>अन्तःकोपो महांस्तत्र नाशकः पृथिवीक्षिताम्॥ ७ | राजन्! जो परस्पर वैर रखनेवाले, क्रोधी, भयभीत तथा अपमानित हैं, उनके प्रति भेद-नीतिका प्रयोग करना चाहिये; क्योंकि वे भेदद्वारा साध्य माने गये हैं। जो लोग जिस दोषके कारण दूसरेसे भयभीत नहीं होते उन्हें उसी दोषके द्वारा भेदन करना चाहिये। उनके प्रति अपनी ओरसे आशा प्रकट करे और दूसरेसे भयकी आशङ्का दिखलाये। इस प्रकार उन्हें फोड़ ले तथा फूट जानेपर उन्हें अपने वशमें कर ले। संगठित लोग भेद-नीतिके बिना इन्द्रद्वारा भी दुःसाध्य होते हैं। इसीलिये नीतिज्ञलोग भेद-नीतिकी ही प्रशंसा करते हैं। इस नीतिको अपने मुखसे तथा दूसरेके मुखसे भेद्य व्यक्तिसे कहे या कहलाये, परंतु अपने विषयमें दूसरेके मुखसे सुनी हुई भेद-नीतिको परीक्षा करके ठीक मानना चाहिये। अपने कार्यके उद्देश्यसे सुनिपुण नीतिज्ञोंद्वारा जो तुरंत भेदित किये जाते हैं, वे ही सच्चे अर्थमें भेदित कहे जाते हैं, अर्थवादियों एवं राजाद्वारा किये गये नहीं। जहाँ राजाओंके सम्मुख आन्तरिक (दुर्गके अन्तर्गतका) कोप और बाहरी कोप—दोनों उपस्थित हों, वहाँ आन्तरिक कोप ही महान् है; क्योंकि वह राजाओंके लिये विनाशकारी होता है॥ १—७॥ |
| सामन्तकोपो बाह्यस्तु कोपः प्रोक्तो महीभृतः।<br>महिषीयुवराजाभ्यां तथा सेनापतेर्नृप॥ ८<br>अमात्यमन्त्रिणां चैव राजपुत्रे तथैव च।<br>अन्तःकोपो विनिर्दिष्टो दारुणः पृथिवीक्षिताम्॥ ९<br>बाह्यकोपे समुत्पन्ने सुमहत्यपि पार्थिवः।<br>शुद्धान्तस्तु महाभाग शीघ्रमेव जयी भवेत्॥ १०<br>अपि शक्रसमो राजा अन्तःकोपेन नश्यति।<br>सोऽन्तःकोपः प्रयत्नेन तस्माद् रक्ष्यो महीभृता॥ ११<br>परतः कोपमुत्पाद्य भेदेन विजिगीषुणा।<br>ज्ञातीनां भेदनं कार्यं परेषां विजिगीषुणा॥ १२ | छोटे राजाओंका क्रोध राजाके लिये बाह्य क्रोध कहा गया है तथा रानी, युवराज, सेनापति, अमात्य, मन्त्री और राजकुमारके द्वारा किया गया क्रोध आन्तरिक कोप कहा गया है। इन सबोंका कोप राजाओंके लिये भयानक बतलाया गया है। महाभाग! अत्यन्त भीषण बाह्य कोपके उत्पन्न होनेपर भी यदि राजाका अन्तःपुर (दुर्गस्थ महारानी, युवराज, मन्त्री आदि प्रकृति) शुद्ध एवं अनुकूल है तो वह शीघ्र ही विजय-लाभ करता है। यदि राजा इन्द्रके समान हो तो भी वह अन्तः (दुर्गस्थ रानी, युवराज, मन्त्री आदिके)-कोपसे नष्ट हो जाता है। इसलिये राजाको प्रयत्नपूर्वक उस आन्तरिक कोपकी रक्षा करनी चाहिये। शत्रुओंको जीतनेकी इच्छावाले राजाको चाहिये कि दूसरेसे भेद-नीतिद्वारा क्रोध पैदा कराकर |
| * अध्याय २२४ * | ८८५ |
|---|
| रक्ष्यश्चैव प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तथात्मनः।<br>ज्ञातयः परितप्यन्ते सततं परितापिताः ॥ १३<br>तथापि तेषां कर्तव्यं सुगम्भीरेण चेतसा।<br>ग्रहणं दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो भयंकरः ॥ १४<br>न ज्ञातिमनुगृह्णन्ति न ज्ञातिं विश्वसन्ति च।<br>ज्ञातिभिर्भेदनीयास्तु रिपवस्तेन पार्थिवैः ॥ १५<br>भिन्ना हि शक्या रिपवः प्रभूताः<br> स्वल्पेन सैन्येन निहन्तुमाजौ।<br>सुसंहतानां हि तदस्तु भेदः<br> कार्यो रिपूणां नयशास्त्रविद्भिः ॥ १६ | उसकी जातिमें भेद उत्पन्न कर दे और प्रयत्नपूर्वक अपने जाति-भेदकी रक्षा करे। यद्यपि संतप्त भाई-बन्धु राजाकी उन्नति देखकर जलते रहते हैं, तथापि राजाको दान और सम्मानद्वारा उनको मिलाये रखना चाहिये; क्योंकि जातिगत भेद बड़ा भयंकर होता है। जातिवालोंपर प्रायः लोग अनुग्रहका भाव नहीं रखते और न उनका विश्वास ही करते हैं, इसलिये राजाओंको चाहिये कि जातिमें फूट डालकर शत्रुको उनसे अलग कर दें। इस भेद-नीतिद्वारा भिन्न किये गये शत्रुओंके विशाल समूहको भी संग्रामभूमिमें थोड़ी-सी सुसंगठित सेनासे ही नष्ट किया जा सकता है, अतएव नीतिकुशल लोगोंको सुसंगठित शत्रुओंके प्रति भी भेदनीतिका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ८—१६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे भेदप्रशंसा नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें भेद-प्रशंसा नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २२३ ॥
दो सौ चौबीसवाँ अध्याय
दान-नीतिकी प्रशंसा
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम्।<br>सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित् ॥ १ | दान सभी उपायोंमें सर्वश्रेष्ठ है। प्रचुर दान देनेसे मनुष्य दोनों लोकोंको जीत लेता है। |
| न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते।<br>दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम् ॥ २ | राजन्! ऐसा कोई नहीं है जो दानद्वारा वशमें न किया जा सके। दानसे देवतालोग भी सदाके लिये मनुष्योंके वशमें हो जाते हैं। |
| दानमेवोपजीवन्ति प्रजाः सर्वा नृपोत्तम।<br>प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैवोपजायते ॥ ३ | नृपोत्तम ! सारी प्रजाएँ दानके बलसे ही पालित होती हैं। दानी मनुष्य संसारमें सभीका प्रिय हो जाता है। |
| दानवानचिरेणैव तथा राजा परान् जयेत्।<br>दानवानेव शक्नोति संहतान् भेदितुं परान् ॥ ४ | दानशील राजा शीघ्र ही शत्रुओंको जीत लेता है। दानशील ही संगठित शत्रुओंका भेदन करनेमें समर्थ हो सकता है। |
| यद्यप्यलुब्धगम्भीराः पुरुषाः सागरोपमाः।<br>न गृह्णन्ति तथाप्येते जायन्ते पक्षपातिनः ॥ ५ | यद्यपि निर्लोभ तथा समुद्रके समान गम्भीर स्वभाववाले मनुष्य स्वयं दानको अङ्गीकार नहीं करते, तथापि वे (भी दानी व्यक्तिके) पक्षपाती हो जाते हैं। |
| अन्यत्रापि कृतं दानं करोत्यन्यान् यथा वशे।<br>उपायेभ्यः प्रशंसन्ति दानं श्रेष्ठतमं जनाः ॥ ६ | अन्यत्र किया गया दान भी अन्य लोगोंको अपने वशमें कर लेता है, इसलिये लोग सभी उपायोंमें श्रेष्ठतम दानकी प्रशंसा करते हैं। |
८८६ * मत्स्यपुराण *
| दानं श्रेयस्करं पुंसां दानं श्रेष्ठतमं परम्।<br>दानवानेव लोकेषु पुत्रत्वे ध्रियते सदा॥ ७<br>न केवलं दानपरा जयन्ति<br>भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः।<br>जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं<br>सुदुर्जयं यो विबुधाधिवासः॥ ८ | दान पुरुषोंका कल्याण करनेवाला तथा परम श्रेष्ठ है। लोकमें दानशील व्यक्तिकी सर्वदा पुत्रकी भाँति प्रतिष्ठा होती है। दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोकको ही अपने वशमें नहीं करते, प्रत्युत वे अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्रके लोकको भी, जो देवताओंका निवासस्थान है, जीत लेते हैं॥ १—८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मदानप्रशंसा नाम चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दान-प्रशंसा नामक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२४॥
दो सौ पचीसवाँ अध्याय
दण्डनीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु।<br>दण्डेन तान् वशीकुर्याद् दण्डो हि वशकृन्नृणाम्॥ १<br>सम्यक् प्रणयनं तस्य तथा कार्यं महीक्षिता।<br>धर्मशास्त्रानुसारेण सुसहायेन धीमता॥ २<br>तस्य सम्यक् प्रणयनं यथा कार्यं महीक्षिता।<br>वानप्रस्थांश्च धर्मज्ञान् निर्ममान् निष्परिग्रहान्॥ ३<br>स्वदेशे परदेशे वा धर्मशास्त्रविशारदान्।<br>समीक्ष्य प्रणयेद् दण्डं सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम्॥ ४<br>आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाथ गुरुर्महान्।<br>नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मेण तिष्ठति॥ ५<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>इह राज्यात् परिभ्रष्टो नरकं च प्रपद्यते॥ ६<br>तस्माद् राज्ञा विनीतेन धर्मशास्त्रानुसारतः।<br>दण्डप्रणयनं कार्यं लोकानुग्रहकाम्यया॥ ७<br>यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा।<br>प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति॥ ८<br>बालवृद्धातुरयतिद्विजस्त्रीविधवा यतः।<br>मात्स्यन्यायेन भक्ष्येरन् यदि दण्डं न पातयेत्॥ ९<br>देवदैत्योरगगणाः सर्वे भूतपतत्रिणः।<br>उत्क्रामयेयुर्मर्यादां यदि दण्डं न पातयेत्॥ १० | राजन्! जो (पूर्वोक्त सामादि) तीनों उपायोंके द्वारा वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें दण्डनीतिके द्वारा वशमें करे; क्योंकि दण्ड मनुष्योंको निश्चयरूपसे वशमें करनेवाला है। बुद्धिमान् राजाको सम्यक्-रूपसे उस दण्डनीतिका प्रयोग धर्मशास्त्रके अनुसार पुरोहित आदिकी सहायतासे करना चाहिये। उस दण्डनीतिका सम्यक् प्रयोग जिस प्रकार करना चाहिये, उसे सुनिये। राजाको अपने देशमें अथवा पराये देशमें वानप्रस्थाश्रमी, धर्मशील, ममतारहित, परिग्रहहीन और धर्मशास्त्रप्रवीण विद्वान् पुरुषोंकी परिषद्द्वारा भलीभाँति विचार कर दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये; क्योंकि सब कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। सभी आश्रमधर्मके व्यक्ति, ब्रह्मचारी, पूज्य, गुरु, महापुरुष तथा अपने धर्ममें स्थित रहनेवाला कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो राजाके द्वारा दण्डनीय न हो; किंतु अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीय पुरुषोंको दण्ड न देनेसे राजा इस लोकमें राज्यसे च्युत हो जाता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है। इसलिये विनयशील राजाको लोकानुग्रहकी कामनासे धर्मशास्त्रके अनुसार ही दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये। जिस राज्यमें श्यामवर्ण, लाल नेत्रवाला और पापनाशक दण्ड विचरण करता है तथा राजा ठीक-ठीक निर्णय करनेवाला होता है वहाँ प्रजाएँ कष्ट नहीं झेलतीं। यदि राज्यमें दण्डनीतिकी व्यवस्था न रखी जाय तो बालक, वृद्ध, आतुर, संन्यासी, ब्राह्मण, स्त्री और विधवा—ये सभी मात्स्यन्यायके अनुसार आपसमें एक-दूसरेको खा जायँ। यदि राजा दण्डकी व्यवस्था न करे तो सभी देवता, दैत्य, सर्पगण, प्राणी तथा पक्षी मर्यादाका उल्लङ्घन कर जायँगे॥ १—१०॥ |