मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २१७ * | ८७१
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
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| कसेरुका तु काश्मीरी बिल्वशालूककेसरम्।<br>तुषधान्यानि सर्वाणि शमी धान्यानि चैव हि॥ ५२<br>क्षीरं क्षौद्रं तथा तक्रं तैलं मज्जा वसा घृतम्।<br>नीपश्चारिष्टकक्षोदवातामसोमबाणकम् ॥५३<br>एवमादीनि चान्यानि विज्ञेयो मधुरो गणः।<br>राजा संचिनुयात् सर्वं पुरे निरवशेषतः॥ ५४ | कसेरुका, काश्मीरी, बिल्व, शालूक, केसर, सभी प्रकारकी भूमियाँ, शमी, अन्न, दुग्ध, शहद, मट्ठा, तेल, मज्जा, वसा, घी, कदम्ब, अरिष्टक, अक्षोट, बादाम, सोम और बाणक—इन सबको तथा इसी प्रकार अन्य पदार्थोंको मधुर जानना चाहिये। राजा इन सबका पूर्णरूपसे दुर्गमें संग्रह करे॥ ४३-५४॥ |
| दाडिमाम्रातकौ चैव तिन्तिडीकाम्लवेतसम्।<br>भव्यकर्कन्धुलकुचकरमर्दकरूषकम् ॥५५<br>बीजपूरककण्डूरे मालती राजबन्धुकम्।<br>कोलद्वयपर्णानि द्वयोराम्रातयोरपि॥ ५६<br>पारावतं नागरकं प्राचीनारुकमेव च।<br>कपित्थामलकं चुक्रफलं दन्तशठस्य च॥५७<br>जाम्बवं नवनीतं च सौवीरकरुषोदके।<br>सुरासवं च मद्यानि मण्डतक्रदधीनि च॥ ५८<br>शुक्लानि चैव सर्वाणि ज्ञेयामम्लगणं द्विज।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ५९ | अनार, आम्रातक, इमली, अम्लवेतस, सुन्दर बेर, बड़हर, करमर्द, करूषक, बिजौरा, कण्डूर, मालती, राज-बन्धुक, दोनों कोलकों और अमड़ोंके पत्ते, पारावत, नागरक, प्राचीन अरुक, कैथ, आँवला, चुक्रफल, दन्तशठ, जामुन, मक्खन, सौवीरक, रुषोदक, सुरा, आसव आदि मद्य, माँड, मट्ठा, दही एवं ऐसे सभी प्रकारके श्वेत पदार्थोंको खट्टा समझना चाहिये। राजा इनका तथा ऐसे अन्यान्य पदार्थोंका अपने दुर्गमें संचय करे। |
| सैन्धवोद्भिदपाठेयपाक्यसामुद्रलोमकम् ।<br>कुप्यसौवर्चलाविल्वं बालकेयं यवाह्वकम्॥ ६०<br>औव क्षारं कालभस्म विज्ञेयो लवणो गणः।<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे॥ ६१ | सैन्धव, उद्भिद, पाठेय, पाक्य, सामुद्र (साँभर), लोमक, कुप्य, सौवर्चल, अविल्व, बालकेय, यव, भौम, क्षार, कालभस्म—ये सभी लवणके भेदोपभेद हैं। राजा इन सबका तथा अन्य लवणोंका दुर्गमें संग्रह करे। |
| पिप्पली पिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम्।<br>कुबेरकं च मरिचं शिग्रुभल्लातसर्षपाः॥ ६२<br>कुष्ठाजमोदा किणिही हिङ्गुमूलकधान्यकम्।<br>कारवी कुञ्चिका याज्या सुमुखा कालमालिका॥ ६३<br>फणिज्झकोऽथ लशुनं भूस्तृणं सुरसं तथा।<br>कायस्था च वयःस्था च हरितालं मनःशिला॥ ६४<br>अमृता च रुदन्ती च रोहिषं कुङ्कुमं तथा।<br>जया एरण्डकाण्डीरं शल्लकी हिङ्गिका तथा॥ ६५<br>सर्वपित्तानि मूत्राणि प्रायो हरितकानि च।<br>संगतानि च मूलानि यष्टिश्चातिविषाणि च।<br>फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मैला हिङ्गुपत्रिका॥ ६६<br>एवमादीनि चान्यानि गणः कटुकसंज्ञितः।<br>राजा संचिनुयाद् दुर्गे प्रयत्नेन नृपोत्तम ॥ ६७ | पीपर, पीपरका मूल, चव्य, शीता, साँठ, कुबेरक, मिर्च, सहजना, भिलावा, सरसों, कुठ, अजमोदा, ओंगा, हींग, मूली, धनियाँ, सौंफ, अजवाइन, मंजीठ, जवीर, कलमालिका, फणिज्जक, लहसुन, पालाके आकारवाला जलीय तृण, हरड़, कायस्था, वयःस्था, हरताल, मैनसिल, गिलोय, रुदंती, रोहिष, केशर, जया, रेड़ी, नरकट, शल्लकी, भारंगी, सभी प्रकारके पित्त और मूत्र, हर्रै, आवश्यक मूल, मुलहठी, अतिविष, छोटी इलायची, तेजपात आदि कटु ओषधियाँ हैं। राजश्रेष्ठ! राजा दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक इनका संग्रह करे। |