मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मुस्तं चन्दनह्रीबेरकृतमालकदारवः।<br>हरिद्रानलदोशीरनक्तमालकदम्बकम् ॥ ६८<br>दूर्वा पटोलकटुका दन्तीत्वक् पत्रकं वचा।<br>किराततिक्तभूतुम्बी विषा चातिविषा तथा॥ ६९<br>तालीसपत्रतगरं सप्तपर्णविकङ्कताः।<br>काकोदुम्बरिका दिव्यास्तथा चैव सुरोद्भवा॥ ७०<br>षड्ग्रन्था रोहिणी मांसी पर्पटश्चाथ दन्तिका।<br>रसाञ्जनं भृङ्गराजं पतङ्गी परिपेलवम् ॥ ७१<br>दुःस्पर्शा गुरुणी कामा श्यामाकं गन्धनाकुली।<br>रूपपर्णी व्याघ्रनखं मञ्जिष्ठा चतुरङ्गुला॥ ७२<br>रम्भा चैवाङ्कुरास्फीता तालास्फीता हरेणुका।<br>वेत्राग्रवेतसस्तुम्बी विषाणी लोध्रपुष्पिणी ॥ ७३<br>मालती करकृष्णाख्या वृश्चिका जीविता तथा।<br>पर्णिका च गुडूची च स गणस्तिक्तसंज्ञकः ॥ ७४<br>एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे।<br>अभयाममलके चोभे तथैव च बिभीतकम् ॥ ७५<br>प्रियङ्गुधातकीपुष्पं मोचाख्या चार्जुनासनाः।<br>अनन्ता स्त्री तुवरिका श्योणाकं कट्फलं तथा॥ ७६<br>भूर्जपत्रं शिलापत्रं पाटलापत्रलोमकम्।<br>समङ्गात्रिवृतामूलकार्पासगैरिकाञ्जनम् ॥ ७७<br>विद्रुमं समधूच्छिष्टं कुम्भिका कुमुदोत्पलम्।<br>न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकिंशुकाः शिंशपा शमी॥ ७८<br>प्रियालपीलुकासारिशिरीषाः पद्मकं तथा।<br>बिल्वोऽग्निमन्थः प्लक्षश्च श्यामाकं च बको धनम् ॥ ७९<br>राजादनं करीरं च धान्यकं प्रियकस्तथा।<br>कङ्कोलाशोकबदराः कदम्बखदिरद्वयम्॥ ८०<br>एषां पत्राणि साराणि मूलानि कुसुमानि च।<br>एवमादीनि चान्यानि कषायाख्यो गणो मतः ॥ ८१<br>प्रयत्नेन नृपश्रेष्ठ राजा संचिनुयात् पुरे।<br>कीटाश्च मारणे योग्या व्यङ्गतायां तथैव च॥ ८२<br>वातधूमाम्बुमार्गाणां दूषणानि तथैव च।<br>धार्याणि पार्थिवैर्दुर्गे तानि वक्ष्यामि पार्थिव ॥ ८३ | नागरमोथा, चन्दन, हीबेर, कृतहारक, दारुहल्दी, हल्दी, नलद, खश, नक्तमाल, कदम्ब, दूर्वा, परवल, तेजपात, वच, चिरायता, भूतुम्बी, विषा, अतिविषा, तालीसपत्र, तगर, छितवन, खैर, काली गूलर, दिव्या, सुरोद्भवा, षड्ग्रन्थी, रोहिणी, जटामासी, पर्पट, दन्ती, रसांजन, भृंगराज, पतंगी, परिपेलव, दुःस्पर्शा, अगुरुद्रव्य, कामा, श्यामाक, गंधनाकुली, तुषपर्णी, व्याघ्रनख, मंजीठ, चतुरंगुला, केला, अंकुरास्फीता, तालास्फीता, रेणुकबीज, बेतका अग्रभाग, बेत, तुम्बी, केंकरासींगी, लोध्रपुष्पिणी, मालती, करकृष्णा, वृश्चिका, जीविता, पर्णिका तथा गुडूच—यह तिक्त औषधियोंका समूह है। राजा इनका तथा इसी प्रकारके अन्य तिक्त पदार्थोंका दुर्गमें संग्रह रखे॥ ५५—७४ १/२ ॥<br><br>हर्रें, बहेड़ा, आँवला, मालकागुन, धायके फूल, मोचरस, अर्जुन, असन, अनन्ता, कामिनी, तुबरिका, श्योणाक, जायफल, भोजपत्र, शिलाजीत, पाटलवृक्ष, लोहबान, समंगा, त्रिवृता, मूल, कपास, गेरु, अंजन, विद्रुम, शहद, जलकुम्भी, कुमुदिनी, कमल, बरगद, गूलर, पीपल, पालाश, शीशम, शमी, प्रियाल, पीलु, कासारि, शिरीष, पद्म, बेल, अरणी, पाकड़, श्यामाक, बक, धन, राजादन, करीर, धनिया, प्रियक, कंकोल, अशोक, बेर, कदंब, दोनों प्रकारके खैर—इन वृक्षोंके पत्ते, सारभाग (सत्त्व), मूल तथा पुष्प काषाय माने गये हैं। राजश्रेष्ठ! राजाको ये काषाय ओषधियाँ दुर्गमें रखनी चाहिये। राजन्! मारने एवं घायल करनेवाले कीट-पतंग तथा वायु, धूम, जल तथा मार्गको दूषित करनेवाली ओषधियोंको, जिन्हें मैं आगे बतलाऊँगा, राजाको दुर्गमें रखनी चाहिये। |