भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 879
  • अध्याय २१७ * | ८६९ ---|---

| मन्त्रिवेदविदां चैव चिकित्साकर्तुरेव च।<br>तत्रैव च तथा भागे कोष्ठागारं विधीयते॥ १८<br>गवां स्थानं तथैवात्र तुरगाणां तथैव च।<br>उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ १९<br>दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु गर्हिताः।<br>तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ २०<br>कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।<br>धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ २१<br>अजांश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा।<br>गोगजाश्वादिशालासु तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ २२<br>अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे।<br>तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥ २३<br>दद्यादावसथस्थानं सर्वेषामनुपूर्वशः।<br>योधानां शिल्पिनां चैव सर्वेषामविशेषतः॥ २४<br>दद्यादावसथान् दुर्गे कालमन्त्रविदां शुभान्।<br>गोवैद्यानश्ववैद्यांश्च गजवैद्यांस्तथैव च॥ २५<br>आहरेत भृशं राजा दुर्गे हि प्रबला रुजः।<br>कुशीलवानां विप्राणां दुर्गे स्थानं विधीयते॥ २६<br>न बहूनामतो दुर्गे विना कार्ये तथा भवेत्।<br>दुर्गे च तत्र कर्तव्या नानाप्रहरणान्विताः॥ २७<br>सहस्रघातिनो राजंस्तैस्तु रक्षा विधीयते।<br>दुर्गे द्वाराणि गुप्तानि कार्याण्यपि च भूभुजा॥ २८<br>संचयश्चात्र सर्वेषामायुधानां प्रशस्यते।<br>धनुषां क्षेपणीयानां तोमराणां च पार्थिव॥ २९<br>शराणामथ खङ्गानां कवचानां तथैव च।<br>लगुडानां गुडानां च हुडानां परिघैः सह॥ ३०<br>अश्मनां च प्रभूतानां मुद्गराणां तथैव च।<br>त्रिशूलानां पट्टिशानां कुठाराणां च पार्थिव॥ ३१<br>प्रासानां च सशूलानां शक्तीनां च नरोत्तम।<br>परश्वधानां चक्राणां वर्मणां चर्मभिः सह॥ ३२<br>कुद्दाररज्जुवेत्राणां पीठकानां तथैव च।<br>तुषाणां चैव दात्राणामङ्गाराणां च संचयः॥ ३३<br>सर्वेषां शिल्पिभाण्डानां संचयश्चात्र चेष्यते ।<br>वादित्राणां च सर्वेषामोषधीनां तथैव च॥ ३४ | तथा उसी स्थलपर एवं उसी दिशामें मन्त्रियों और वैद्यका निवासस्थान एवं कोष्ठागार बनानेका विधान है। उसी स्थानके समीप गौओं तथा अश्वोंके निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये। अश्वोंकी पंक्ति उत्तराभिमुखी अथवा दक्षिणाभिमुखी हो सकती है, अन्य दिशाभिमुखी निन्दित मानी गयी है। जहाँ अश्व रखे जायें वहाँ रातभर दीपक जलते रहना चाहिये। अश्वशालामें मुर्गा, बंदर, मर्कट तथा बछड़ेसहित गौ भी रखनेका विधान है। अश्वोंका कल्याण चाहनेवाला अश्वशालामें बकरियोंको भी रखे। गौ, हाथी और अश्वादि शालाओंमें उनके गोबर निकालनेकी व्यवस्था सूर्य अस्त हो जानेपर नहीं करनी चाहिये। राजा उन-उन स्थानोंमें यथायोग्य समझकर क्रमशः सभी सारथियोंको आवासस्थान प्रदान करे। इसी प्रकार सबसे बढ़कर योद्धाओं, शिल्पियों और कालमन्त्रके वेत्ताओंको दुर्गमें उत्तम निवास-स्थान दे। इसी प्रकार राजाको गौ-वैद्य, अश्व-वैद्य तथा गज-वैद्यको भी रखना चाहिये; क्योंकि दुर्गमें कभी रोगोंकी प्रबलता हो सकती है। दुर्गमें चारणों, संगीतज्ञों और ब्राह्मणोंके स्थानका विधान है॥१०—२६॥<br><br>इनके अतिरिक्त दुर्गमें निरर्थक बहुत-से व्यक्तियोंको नहीं रखना चाहिये। राजन्! दुर्गमें विविध प्रकारके शस्त्रास्त्रसे युक्त एवं हजारोंको मारनेमें समर्थ योद्धाओंको रखना चाहिये; क्योंकि उन्हींसे रक्षा होती है। राजाको दुर्गमें गुप्तद्वार भी बनवाना चाहिये। राजन्! दुर्गमें सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहकी विशेष प्रशंसा की गयी है। नृपश्रेष्ठ राजन्! राजाको दुर्गमें धनुष, ढेलवाँस, तोमर, बाण, तलवार, कवच, लाठी, गुड (हाथीको फँसानेका एक फंदा), हुड (चोरोंको फँसानेका खूँटा), परिघ, पत्थर, बहुसंख्यक मुद्गर, त्रिशूल, पट्टिश, कुठार, प्रास (भाला), शूल, शक्ति, फरसा, चक्र, चर्मके साथ ढाल, कुदाल, रस्सी, बेंत, पीठक, भूसी, हँसिया, कोयला—इन सबका संचय करना चाहिये। दुर्गमें सभी प्रकारके शिल्पीय पात्रोंका भी संचय रहना चाहिये। वह सभी प्रकारके वाद्यों तथा ओषधियोंका भी संचय करे। |