मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अदेवमातृकं रम्यमनुरक्तजनान्वितम्।<br>करैरपीडितं चापि बहुपुष्पफलं तथा॥ ३<br>अगम्यं परचक्राणां तद्वासगृहमापदि।<br>समदुःखसुखं राज्ञः सततं प्रियमास्थितम्॥ ४<br>सरीसृपविहीनं च व्याघ्रतस्करवर्जितम्।<br>एवंविधं यथालाभं राजा विषयमावसेत्॥ ५<br>तत्र दुर्गं नृपः कुर्यात् षण्णामेकतमं बुधः।<br>धन्वदुर्गं महीदुर्गं नरदुर्गं तथैव च॥ ६<br>वार्क्षं चैवाम्बुदुर्गं च गिरिदुर्गं च पार्थिव।<br>सर्वेषामेव दुर्गाणां गिरिदुर्गं प्रशस्यते॥ ७<br>दुर्गं च परिखोपेतं वप्राट्टालकसंयुतम्।<br>शतघ्नीयन्त्रमुख्यैश्च शतशश्च समावृतम्॥ ८<br>गोपुरं सकपाटं च तत्र स्यात् सुमनोहरम्।<br>सपताकं गजारूढो येन राजा विशेत् पुरम्॥ ९ | देवस्थान रहित सुन्दर हो, अनुरक्तजनोंसे समन्वित हो, जहाँके निवासी करके भारसे पीड़ित न हों, पुष्प और फलकी बहुतायत हो, आपत्तिके समय वह वासस्थान शत्रुओंके लिये अगम्य हो, जहाँ निरन्तर समानरूपसे राजाके सुख-दुःखके भागी एवं प्रेमीजन निवास करते हों, जो सर्प, बाघ और चोरसे रहित हो तथा सरलतासे उपलब्ध हो, इस प्रकारके देशमें राजाको अपने सहायकोंसहित निवास करना चाहिये। वहाँ बुद्धिमान् राजाको धन्व या धनुदुर्ग (जहाँ चारों ओरसे मरुभूमि हो), महीदुर्ग नरदुर्ग, वृक्षदुर्ग, जलदुर्ग तथा पर्वतदुर्ग—इन छः दुर्गोंमेंसे किसी एककी रचना करनी चाहिये। राजन्! इन सभी दुर्गोंमें गिरि (पर्वत) दुर्ग श्रेष्ठ माना गया है*। वह गिरिदुर्ग खाई, चहारदीवारी तथा ऊँची अट्टालिकाओंसे युक्त एवं तोप आदि सैकड़ों प्रधान यन्त्रोंसे घिरा होना चाहिये। उसमें किंवाड़सहित मनोहर फाटक लगा हो, जिससे हाथीपर बैठा हुआ पताकासमेत राजा नगरमें प्रविष्ट हो सके॥ १–९॥ |
| चतस्रश्च तथा तत्र कार्यास्त्वायतवीथयः।<br>एकस्मिंस्तत्र वीथ्यग्रे देववेश्म भवेद् दृढम्॥ १०<br>वीथ्यग्रे च द्वितीये च राजवेश्म विधीयते।<br>धर्माधिकरणं कार्यं वीथ्यग्रे च तृतीयके॥ ११<br>चतुर्थे त्वथ वीथ्यग्रे गोपुरं च विधीयते।<br>आयतं चतुरग्रं वा वृत्तं वा कारयेत् पुरम्॥ १२<br>मुक्तिहीनं त्रिकोणं च यवमध्यं तथैव च।<br>अर्धचन्द्रप्रकारं च वज्राकारं च कारयेत्॥ १३<br>अर्धचन्द्रं प्रशंसन्ति नदीतीरेषु तद्वसन्।<br>अन्यत्र तन्न कर्तव्यं प्रयत्नेन विजानता॥ १४ | वहाँ चार लम्बी-चौड़ी गलियाँ बनवानी चाहिये। जिनमें एक गलीके अग्रभागमें सुदृढ़ देव-मन्दिरका निर्माण कराये। दूसरी गलीके आगे राजमहल बनानेका विधान है। तीसरी गलीके अग्रभागमें धर्माधिकारीका आवासस्थान हो। चौथी गलीके अग्रभागमें दुर्गका मुख्य प्रवेशद्वार हो। उस दुर्गको चौकोना, आयताकार, गोलाकार, मुक्तिहीन, त्रिकोण, यवमध्य, अर्धचन्द्राकार अथवा वज्राकार बनवाना चाहिये। नदी-तटपर बनाये गये अर्धचन्द्राकार दुर्गको उत्तम माना जाता है। विद्वान् राजाको अन्य स्थानोंपर ऐसे दुर्गका निर्माण नहीं करना चाहिये। |
| राज्ञा कोशगृहं कार्यं दक्षिणे राजवेश्मनः।<br>तस्यापि दक्षिणे भागे गजस्थानं विधीयते॥ १५<br>गजानां प्राङ्मुखी शाला कर्तव्या वाप्युदङ्मुखी।<br>आग्नेये च तथा भागे आयुधागारमिष्यते॥ १६<br>महानसं च धर्मज्ञ कर्मशालास्तथापराः।<br>गृहं पुरोधसः कार्यं वामतो राजवेश्मनः॥ १७ | राजाको राजमहलके दाहिने भागमें कोशगृह बनवाना चाहिये। उसके भी दाहिने भागमें गजशाला बनवानेका विधान है। गजोंकी शाला पूर्व अथवा उत्तराभिमुखी होनी चाहिये। अग्निकोणमें आयुधागार बनवाना उचित है। धर्मज्ञ! उसी दिशामें रसोईघर तथा अन्यान्य कर्मशालाओंकी भी रचना करे। राजभवनकी बायीं ओर पुरोहितका भवन होना चाहिये |
* गिरिदुर्ग चारों ओरसे पर्वतोंसे घिरे हुए पर्वतोंके मध्य किसी चौरस पर्वतपर ही स्थित होता है। इसके भी चारों ओर मरुभूमि, जलराशि, खाई, वृक्षादिके दुर्ग होते हैं। मनुनिर्मित रोहिताश्वदुर्ग तथा कलिंजर, चरणाद्रिके दुर्ग ऐसे ही हैं। मनु० ७।७०-७७ आदिमें इनका विस्तृत उल्लेख है।