भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 899
* अध्याय २२७ *८८९

दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय

दण्डनीतिका निरूपण

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
निक्षेपस्य समं मूल्यं दण्ड्यो निक्षेपभुक् तथा।<br>वस्त्रादिकसमस्तस्य तदा धर्मो न हीयते॥ १<br>यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।<br>तावुभौ चोरवच्छास्यौ दाप्यौ वा द्विगुणं धनम्॥ २<br>उपधाभिश्च यः कश्चित् परद्रव्यं हरेन्नरः।<br>ससहायः स हन्तव्यः प्रकामं विविधैर्वधैः॥ ३<br>यो याचितं समादाय न तद् दद्याद् यथाक्रमम्।<br>स निगृह्य बलाद् दाप्यो दण्ड्यो वा पूर्वसाहसम्॥ ४<br>अज्ञानाद् यदि वा कुर्यात् परद्रव्यस्य विक्रयम्।<br>निर्दोषो ज्ञानपूर्वं तु चोरवद् वधमर्हति॥ ५<br>मूल्यमादाय यो विद्यां शिल्पं वा न प्रयच्छति।<br>दण्ड्यः स मूल्यं सकलं धर्मज्ञेन महीक्षिता॥ ६<br>द्विजभोज्ये तु सम्प्राप्ते प्रतिवेशममभोजयन्।<br>हिरण्यमाषकं दण्ड्यः पापे नास्ति व्यतिक्रमः॥ ७<br>आमन्त्रितो द्विजो यस्तु वर्तमानश्च स्व गृहे।<br>निष्कारणं न गच्छेद यः स दाप्योऽष्टशतं दमम्।<br>प्रतिश्रुत्याप्रदातारं सुवर्णं दण्डयेन्नृपः॥ ८<br>भृत्यश्चाज्ञां न कुर्याद् यो दर्पात् कर्म यथोदितम्।<br>स दण्ड्यः कृष्णालान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥ ९<br>संगृहीतं न दद्याद् यः काले वेतनमेव च।<br>अकाले तु त्यजेद् भृत्यं दण्ड्यः स्याच्छतमेव च॥ १०राजन्! (रत्न-धन-) वस्त्रादि धरोहरको हड़प जानेवाले व्यक्तिको उसके मूल्यके अनुरूप दण्ड देनेपर राजाका धर्म नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति रखी हुई धरोहरको वापस नहीं करता और जो बिना धरोहर रखे ही माँगता है, वे दोनों ही चोरके समान दण्डनीय हैं। उनसे मूल्यसे दुगुना धन दिलाना चाहिये। जो कोई उपधा<sup></sup>-डाँका डालकर या छल-कपटसे दूसरेके धनको चुरा लेता है, उसे अनेकों वधोपायोंद्वारा सहायकोंसहित प्राण-दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति दूसरेसे माँगकर ली गयी वस्तुको समयपर वापस नहीं करता तो उसे बलपूर्वक पकड़कर वह वस्तु दिला देने अथवा पूर्वसाहस<sup></sup>का दण्ड देनेका विधान है। जो कोई अनजानमें किसी दूसरेकी वस्तुको बेंच देता है, वह तो निर्दोष है, किंतु जो जानते हुए दूसरेकी वस्तुको बेचता है वह चोरके समान दण्डनीय है। जो मूल्य लेकर विद्या या शिल्पज्ञानको नहीं देता, उसे धर्मज्ञ राजाको रकमवापसीका दण्ड देना चाहिये। जो ब्रह्मभोजका अवसर प्राप्त होनेपर अपने पड़ोसियोंको भोजन नहीं कराता उसे एक माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। अपराधियोंको दण्ड देनेमें व्यतिक्रमका विधान नहीं है। जो निमन्त्रित ब्राह्मण अपने घरपर रहते हुए भी बिना किसी कारणके भोजन करने नहीं जाता उसे एक सौ आठ माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो किसी वस्तुको देनेकी प्रतिज्ञा कर उसे नहीं देता; उसे राजा एक सुवर्ण-मुद्राका दण्ड दे। जो नौकर अभिमानवश आज्ञापालन तथा कहा हुआ कर्म नहीं करता, उसे राजा आठ कृष्णलक<sup></sup> दण्ड दे और उसका वेतन भी रोक दे। जो स्वामी अपने नौकरको उसके संचित धन तथा वेतनको समयपर नहीं देता और कुसमयमें उसे छोड़ देता है, उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये॥ १-१०॥

१. कामन्दक आदिने उपधाको छल, साहस (डाँका) आदि भेदसे चार प्रकारका बतलाया है।
२. दण्डनीति एवं मन्वादि धर्मशास्त्रोंके अनुसार वध (फाँसी), वनवास, अग्निचिह्नपूर्वक देशनिष्कासन अथवा सहस्रपणका दण्ड पूर्व या उत्तमसाहस दण्ड कहलाता है।
३. १ ३/८ दाने जौकी स्वर्णमुद्रा (कौटलीय अर्थशास्त्र, लीलावती आदि)।