भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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८९० * मत्स्यपुराण *

यो ग्रामदेशसस्यानां कृत्वा सत्येन संविदम्।<br>विसंवदेन्नरो लोभात् तं राष्ट्राद् विप्रवासयेत्॥ ११जो मनुष्य सत्यतापूर्वक किये गये देश, ग्राम और अन्नके बँटवारेको लोभके कारण पुनः असत्य बतलाता है, उसे देशसे निकाल देना चाहिये।
क्रीत्वा विक्रीय वा किंचिद् यस्येहानुशयी भवेत्।<br>सोऽन्तर्दशाहात् तत्साम्यं दद्याच्चैवाददीत वा॥ १२किसी वस्तुको खरीदने या बेंचनेके बाद यदि कुछ मूल्य शेष रह जाता है तो उसे दस दिनके भीतर दे देना या ले लेना चाहिये।
परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नैव दापयेत्।<br>आददद्विददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥ १३यदि दस दिन बीत जानेके बाद कोई शेष मूल्यको न देता है न दिलाता है तो राजा उन न देने और दिलानेवाले दोनोंको छः सौ मुद्राओंका दण्ड दे।
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति।<br>तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान्॥ १४जो व्यक्ति अपनी दोषसे युक्त कन्याको बिना दोष सूचित किये किसीको दान कर देता है तो स्वयं राजा उसे छियानबे पणोंका दण्ड दे।
अकन्यैवेति यः कन्यां ब्रूयाद् दोषेण मानवः।<br>स शतं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ १५जो मनुष्य बिना दोषके ही किसी दूसरेकी कन्याको दोषयुक्त बतलाता है और उस कन्याके दोषको दिखानेमें असमर्थ हो जाता है तो राजा उसे सौ मुद्राका दण्ड दे।
यस्त्वन्यां दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्यां प्रयच्छति।<br>उत्तमं तस्य कुर्वीत राजा दण्डं तु साहसम्॥ १६जो व्यक्ति अन्य कन्याको दिखलाकर वरको दूसरी कन्याका दान करता है तो राजाको उसे उत्तम साहसिक दण्ड देना चाहिये।
वरो दोषाननाख्याय यः कन्यां वरयेदिह।<br>दत्ताप्यदत्ता सा तस्य राज्ञा दण्ड्यः शतद्वयम्॥ १७जो वर अपने दोषको न बतलाकर किसी कन्याका पाणिग्रहण करता है तो वह कन्या देनेके बाद भी न दी हुईके समान है। राजाको उसपर दो सौ मुद्राओंका दण्ड लगाना चाहिये।
प्रदाय कन्यां योऽन्यस्मै पुनस्तां सम्प्रयच्छति।<br>दण्डः कार्यो नरेन्द्रेण तस्याप्युत्तमसाहसः॥ १८जो एक ही कन्याको किसीको दान कर देनेके बाद फिर किसी दूसरेको दान करता है, उसे भी राजाको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये।
सत्यंकारेण वा वाचा युक्तं पण्यमसंशयम्।<br>लुब्धो ह्यन्यत्र विक्रेता षट्शतं दण्डमर्हति॥ १९जो अपने मुखसे 'निश्चय ही मैं इतने मूल्यपर अमुक वस्तु आपको दे दूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर फिर लोभके कारण उसे दूसरेके हाथ बेंच देता है, वह छः सौ मुद्राओंके दण्डका भागी होता है।
दुहितुः शुल्कविक्रेता सत्यंकारात् तु संत्यजेत्।<br>द्विगुणं दण्डयेदेनमिति धर्मो व्यवस्थितः॥ २०जो व्यक्ति कन्याका मूल्य लेकर विक्रय नहीं करता या प्रतिज्ञासे हटता है तो उसे लिये हुए मूल्यसे दुगुने द्रव्यका दण्ड देना चाहिये, यह धर्मकी व्यवस्था है।
मूल्यैकदेशं दत्त्वा तु यदि क्रेता धनं त्यजेत्।<br>स दण्ड्यो मध्यमं दण्डं तस्य पण्यस्य मोक्षणम्॥ २१मूल्यका कुछ भाग देनेके पश्चात् यदि लेनेवाला व्यक्ति उसे लेना नहीं चाहता तो उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये और उसे दिये हुए द्रव्यको लौटा देना चाहिये।
दुह्याद् धेनुं च यः पालो गृहीत्वा भुक्तवेतनम्।<br>स तु दण्ड्यः शतं राज्ञा सुवर्णं चाप्यरक्षिता॥ २२जो गोपाल वेतन लेकर गायको दुहता है और उसकी ठीकसे रक्षा नहीं करता उसे राजाको सौ सुवर्ण मुद्राओंका दण्ड देना चाहिये।
दण्डं दत्त्वा तु विरमेत् स्वामितः कृतलक्षणः।<br>बद्धः कार्ष्णायसैः पाशैस्तस्य कर्मकरो भवेत्॥ २३राजा दण्ड देनेके बाद विराम ले ले। तदनन्तर राजाद्वारा चिह्नित अपराधीको काले लोहेकी जंजीरसे आबद्ध कर दिया जाय और पुनः किसी अपने ही कार्यपर नियुक्त कर लिया जाय॥११-२३॥
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