मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| सुवर्णं च भवेद् दण्ड्यो गां व्रजन् मनुजोत्तम।<br>वेश्यागामी द्विजो दण्ड्यो वेश्याशुल्कसमं पणम्॥ १४४<br><br>गृहीत्वा वेतनं वेश्या 'लोभादन्यत्र गच्छति।<br>वेतनं द्विगुणं दद्याद् दण्डं च द्विगुणं तथा॥ १४५<br><br>अन्यमुद्दिश्य यो वेश्यां नयेदन्यस्य कारणात्।<br>तस्य दण्डो भवेद् राजन् सुवर्णस्य च माषकम्॥ १४६<br><br>नीत्वा भोगान्न यो दद्याद् दाप्यो द्विगुणवेतनम्।<br>राज्ञश्च द्विगुणं दण्डं तथा धर्मो न हीयते॥ १४७<br><br>बहूनां व्रजतामेकां सर्वे ते द्विगुणं दमम्।<br>दद्युः पृथक् पृथक् सर्वे दण्डं च द्विगुणं परम्॥ १४८<br><br>न माता न पिता न स्त्री न ऋत्विग् याज्यमानवाः।<br>अन्योन्यं पतितास्त्याज्या योगे दण्ड्याः शतानि षट्॥ १४९<br><br>पतिता गुरवस्त्याज्या न तु माता कथञ्चन।<br>गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी॥ १५०<br><br>अधीयानोऽप्यनध्याये दण्ड्यः कार्षापणत्रयम्।<br>अध्यापकश्च द्विगुणं तथाऽऽचारस्य लङ्घने॥ १५१<br><br>अनुक्तस्य भवेद् दण्डः सुवर्णस्य च कृष्णलम्।<br>भार्या पुत्रश्च दासश्च शिष्यो भ्राता च सोदरः॥ १५२<br><br>कृतापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा।<br>पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गं कथञ्चन॥ १५३<br><br>अतोऽन्यथा प्रहरतः प्राप्तं स्याच्चोरकिल्बिषम्।<br>दूतीं समाह्वयंश्चैव यो निषिद्धं समाचरेत्॥ १५४<br><br>प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा स दण्ड्यः पार्थिवेच्छया।<br>वासांसि फलकैः श्लक्ष्णैर्निर्णिज्याद् रजकः शनैः॥ १५५<br><br>अतोऽन्यथा हि कुर्वंस्तु दण्ड्यः स्याद् रुक्मभाषकम्।<br>रक्षास्वधिकृतैश्चैव प्रदेयं यैर्विलुप्यते॥ १५६ | मानवश्रेष्ठ! गौके साथ भोग करनेवाले व्यक्तिको सुवर्णका दण्ड लगाना चाहिये। वेश्याके साथ समागम करनेवाले ब्राह्मणको वेश्याको दिये गये शुल्कके बराबर अर्थ-दण्ड देना चाहिये। वेश्या यदि वेतन स्वीकार करनेके उपरान्त लोभवश अन्यत्र चली जाती है तो उसे दुगुना दण्ड देनेके उपरान्त लिये हुए शुल्कका दूना अर्थ-दण्ड भी देना चाहिये। राजन्! यदि कोई वेश्याको दूसरेके बहानेसे किसी दूसरेके पास लिवा जाता है तो उसे एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो वेश्याको लानेके बाद उसके साथ सम्भोगादि नहीं करता, उसे दूना दण्ड देकर उस वेश्याको दूना शुल्क दिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे राजाका धर्म क्षीण नहीं होता। यदि अनेक व्यक्ति एक वेश्याके साथ समागम करनेको उपस्थित हों तो राजा उनको दूना दण्ड दे और वे सब पृथक्-पृथक् उस वेश्याको दूना द्रव्य दण्डरूपमें अधिक दें। माता, पिता, स्त्री, पुरोहित और यजमान—ये पतित होनेपर भी नहीं छोड़े जाते, पर यदि कोई मनुष्य इनमेंसे किसीको छोड़ता है तो वह छः सौ सुवर्ण-मुद्राओंका दण्डभागी होता है। पतित होनेपर गुरुजन भी त्याज्य हो सकते हैं, किंतु माता नहीं छोड़ी जा सकती। गर्भकालमें धारण-पोषण करनेके कारण माताका गौरव गुरुजनोंसे भी अधिक है॥ १३९-१५०॥<br><br>अनध्यायके दिन भी अध्ययन करनेवाले ब्राह्मणको तीन कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और अध्यापकको दुगुना दण्ड देनेका विधान है। इसी प्रकार उन्हें अपने-अपने आचारोंका उल्लङ्घन करनेपर भी दण्ड देना चाहिये। जिन-जिन अपराधोंमें केवल दण्डकी चर्चा की गयी है और कोई परिमाण नहीं निश्चित किया गया है, वहाँ सुवर्णका एक कृष्णल दण्डरूपमें समझना चाहिये। स्त्री, पुत्र, सेवक, शिष्य तथा सगा भाई—ये यदि अपराध करते हैं तो इन्हें रस्सीसे बाँधकर बाँसकी छड़ीसे शरीरके पिछले भागपर दण्ड देना चाहिये; किंतु सिरपर किसी प्रकार भी चोट न लगने दे। इन कहे गये स्थानोंके अतिरिक्त अन्य स्थानोंपर प्रहार करनेवालेको चोरी करनेके समान पाप लगता है। जो दूतीको बुलाकर प्रकटरूपमें या गूप्तरूपमें निषिद्धाचरण करता है, उसके लिये राजा स्वेच्छानुसार दण्डकी व्यवस्था करे। धोबीको चाहिये कि वह कोमल काठके पीठकोंपर वस्त्रको धीरे-धीरे साफ करे। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे एक मासे सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। राजाकी ओरसे रक्षा आदि स्थानोंपर नियुक्त किये गये लोग यदि देय भागको हड़प |