भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 911

* अध्याय २२७ * । ९०१

| कर्षकेभ्योऽर्थमादाय यः कुर्यात् करमन्यथा।<br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्॥ १५७<br><br>ये नियुक्ताः स्वकार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम्।<br>निर्घृणाः क्रूरमनसः सर्वे कर्मापराधिनः॥ १५८<br><br>धनोष्मणा पच्यमानांस्तान् निःस्वान् कारयेन्नृपः।<br>कूटशासनकर्तृंश्च प्रकृतीनां च दूषकान्॥ १५९<br><br>स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च वध्यात् तत्सेविनस्तथा।<br>अमात्यः प्राड् विवाको वा यः कुर्यात् कार्यमन्यथा॥ १६०<br><br>तस्य सर्वस्वमादाय तं राजा विप्रवासयेत्।<br>ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च तस्करो गुरुतल्पगः॥ १६१<br><br>एतान् सर्वान् पृथग्दिश्यान्महापातकिनो नरान्।<br>महापातकिनो वध्या ब्राह्मणं तु विवासयेत्॥ १६२<br><br>कृतचिह्नं स्वदेशाच्च शृणु चिह्नाकृतिं ततः।<br>गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने सुराध्वजः॥ १६३<br><br>स्तेने तु श्वपदं तद्वद् ब्रह्महन्यशिराः पुमान्।<br>असम्भाष्या ह्यसम्भाज्या असंवाह्या विशेषतः॥ १६४<br><br>त्यक्तव्याश्च तथा राजन्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः।<br>महापातकिनो वित्तमादाय नृपतिः स्वयम्॥ १६५<br><br>अप्सु प्रवेशयेद् दण्डं वरुणायोपपादयेत्।<br>सहोढं न विना चोरं घातयेद् धार्मिको नृपः॥ १६६<br><br>सहोढं सोपकरणं घातयेदविचारयन्।<br>ग्रामेष्वपि च ये केचिच्चोराणां भक्ष्यदायकाः॥ १६७<br><br>भाण्डावकाशादाश्चैव सर्वांस्तानपि घातयेत्।<br>राष्ट्रेषु राज्ञाधिकृताः सामन्ताश्चैव दूषकाः॥ १६८<br><br>अभ्याघातेषु मध्यस्थाः क्षिप्रं शास्यास्तु चोरवत्।<br>ग्रामघाते मठाभङ्गे पथि मोषाभिमर्दने॥ १६९<br><br>शक्तितो नाभिधावन्तो निर्वास्याः सपरिच्छदाः।<br>राज्ञः कोषापहर्तूंश्च प्रतिकूलेषु संस्थितान्॥ १७० | लेते हैं या किसानोंसे कर लेकर उसे दूसरे कार्योंमें लगा देते हैं तो राजा उनका सर्वस्व छीनकर उन्हें निर्वासनका दण्ड दे। जो लोग अपने पदपर नियुक्त होकर अन्य कर्मचारियोंके कार्योंको हानि पहुँचाते हैं, वे सभी निर्दय, क्रूरात्मा, कर्मके अपराधी और धनकी गर्मीसे उन्मत्त हो जाते हैं, राजाको चाहिये कि उन्हें निर्धन बना दे। यदि राजाके सेवकगण कूटनीतिसे शासन करनेवाले, प्रजावर्गको राजाके विरुद्ध भड़कानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले हों तो राजा उन्हें प्राण-दण्ड दे। चाहे अमात्य हो या प्रधान न्यायकर्ता, यदि वह अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता तो राजा उसका सर्वस्व छीनकर उसे अपने देशसे बाहर निकाल दे। ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर तथा गुरु-स्त्रीगामी—इन महापातकी पुरुषोंको राजा पृथक्-पृथक् प्राण-दण्डकी व्यवस्था करे। ऐसे महापापियोंको राजा प्राण-दण्ड दे, किंतु ब्राह्मणको चिह्नित करके अपने देशसे निकाल दे। उक्त चिह्नका आकार बताता हूँ, सुनिये। यदि ब्राह्मण गुरुपत्नीके साथ समागम करता है तो उसके शरीरमें भगका आकार, मदिरापायी हो तो सुराध्वजका चिह्न, चोरीके अपराधमें कुत्तेके पैरोंका चिह्न तथा ब्रह्मघातीके शरीरमें बिना सिरके पुरुषका चिह्न बनाना चाहिये। राजन्! ऐसे घोर पापियोंके साथ उनकी जातिवाले, सम्बन्धी तथा भाई-बन्धुओंको विशेषतया सम्भाषण, सहभोज तथा विवाहादि-सम्बन्ध त्याग देना चाहिये॥ १५१—१६४ १/२ ॥<br><br>राजा महापापी पुरुषोंकी सम्पत्तिको अपने अधीन कर ले और उसमेंसे दण्डभागको वरुणके उद्देश्यसे जलमें छोड़ दे। धार्मिक राजाको सपत्नीक चोरको प्राण-दण्ड नहीं देना चाहिये, किंतु चुरायी हुई वस्तुके साथ ही यदि सपत्नीक चोर पकड़ा जाता है तो उसे भी राजा बिना किसी विचारके प्राण-दण्ड दे। ग्रामोंमें भी जो कोई चोरोंको भोजन, पात्र तथा रहनेका आश्रय देनेवाले हों तो इन सभीको प्राण-दण्ड देना चाहिये। राष्ट्रमें राजाके अधिकारी तथा अधीनस्थ सामन्तगण यदि दुष्ट हो गये हों या बुरे अवसरपर तटस्थ रहते हों तो वे भी चोरोंके समान दण्डके भागी होते हैं। ग्राममें किसी विनाशके उपस्थित होनेपर, किसी घर आदिके गिरनेके अवसरपर या मार्गमें किसी रमणीपर अत्याचार किये जानेपर राजाके जो अधिकारी या सामन्त अपनी शक्तिके अनुसार उसकी रक्षाके लिये नहीं दौड़ते, वे परिवार तथा साधनसहित निर्वासित कर देने योग्य हैं। राजाके कोशको अपहृत करनेवालों, |