भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९०२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अरीणामुपकर्तॄंश्च घातयेद् विविधैर्वधैः।<br>संधिं कृत्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः॥ १७१<br>तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णशूले निवेशयेत्।<br>तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन तु॥ १७२<br>यस्तु पूर्वं निविष्टं स्यात् तडागस्योदकं हरेत्।<br>आगमं चाप्यपां भिन्द्यात् स दाप्यः पूर्वसाहसम्॥ १७३<br>कोष्ठागारायुधागारदेवागारविभेदकान् ।<br>पापान् पापसमाचारान् पातयेच्छीघ्रमेव च॥ १७४शत्रु-पक्षसे मिले रहनेवालों तथा शत्रुओंका उपकार करनेवालोंको विविध वधोपायोंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो चोर रातमें सेंध लगाकर चोरी करते हैं, राजाको उनके हाथोंको काटकर तीखे शूलपर बैठा देना चाहिये। तड़ागका भेदन करनेवालेको राजा जलमें डुबोकर मृत्युदण्ड दे। जो व्यक्ति तालाबमें भरे हुए जलकी चोरी करता है या उसमें जलके आनेके मार्गोंको रोक देता है, उसे पूर्ववत् साहस-दण्ड देना चाहिये। कोष्ठागार, आयुधागार तथा देवागारोंको तोड़नेवाले पापाचारियों एवं पापयुक्त किंवदन्तीसे लिप्त पुरुषोंको राजा शीघ्र ही प्राण-दण्ड दे ॥१६५-१७४॥
समुत्सृजेद् राजमार्गं यस्त्वमेध्यमनापदि।<br>स हि कार्षापणं दण्ड्यस्तत्त्वमेध्यं च शोधयेत्॥ १७५<br>आपद्गतोऽथवा वृद्धो गर्भिणी बाल एव च।<br>परिभाषणमर्हन्ति न च शोध्यमिति स्थितिः॥ १७६जो किसी आपत्तिके न होनेपर भी सड़कपर मल आदि अपवित्र वस्तुओंको फेंकता है, उसे एक कार्षापणका दण्ड देना चाहिये और उसीसे उस गंदी वस्तुको हटवाना चाहिये। यदि आपत्तिग्रस्त, वृद्ध, गर्भिणी स्त्री अथवा बालक ऐसा अपराध करते हैं तो उन्हें कहकर मना कर दे, उनसे सफाई न कराये, ऐसी मर्यादा है।
प्रथमं साहसं दण्ड्यो यश्च मिथ्या चिकित्सते।<br>परुषे मध्यमं दण्डमुत्तमं च तथोत्तमे॥ १७७जो वैद्य झूठी दवा करता है या वैद्य न होकर भी दवा देता है, उसे प्रथम साहसका दण्ड देना चाहिये। जिसकी दवा निकृष्ट है, उसे मध्यम साहसका दण्ड तथा जिसकी दवा अत्यन्त अवगुणकारी है, उसे उत्तमसाहसका दण्ड देना चाहिये।
छत्रस्य ध्वजयष्टीनां प्रतिमानां च भेदकाः।<br>प्रतिकुर्युस्ततः सर्वे पञ्च दण्ड्याः शतानि च॥ १७८छत्र, ध्वजाके दण्डों तथा प्रतिमाओंको तोड़नेवालेको पाँच सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये और उन्हींसे इन सबका प्रतिशोध भी कराना चाहिये।
अदूषितानां द्रव्याणां दूषणे भेदने तथा।<br>मणीनामपि भेदेन दण्ड्यः प्रथमसाहसम्॥ १७९अदूषित वस्तुओंको दूषित करने या तोड़नेवालेको तथा मणि आदि मूल्यवान् वस्तुओंको नष्ट करनेवालेको प्रथमसाहसका दण्ड देना चाहिये।
समं च विषमं चैव कुरुते मूल्यतोऽपि वा।<br>समाप्नुयात् स वै पूर्वं दमं मध्यममेव च॥ १८०किसी वस्तुके मूल्यमें जो कमी या वृद्धि करता है, उसे क्रमशः पूर्व और मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये।
बन्धनानि च सर्वाणि राजमार्गे निवेशयेत्।<br>कर्षन्तो यत्र दृश्यन्ते विकृताः पापकारिणः॥ १८१राजाको अपराधियोंके सभी प्रकारके दण्डोंकी व्यवस्था मुख्य सड़कपर करनी चाहिये जिससे उस दण्डको भुगतनेवाले पापात्माको सभी लोग देख सकें।
प्राकारस्य च भेत्तारं परिखाणां च भेदकम्।<br>द्वाराणां चैव भेत्तारं क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात्॥ १८२दुर्गकी चहारदीवारी, खाइयों तथा दरवाजोंको तोड़नेवालेको राजा तुरंत अपने पुरसे बाहर निकाल दे।
मूलकर्मार्भिचारेषु कर्तव्यो द्विशतो दमः।<br>अबीजविक्रयी यश्च बीजोत्कर्षक एव च॥ १८३वशीकरण, अभिचार आदि करनेवालेको राजा दो सौ पणका दण्ड दे। घटिया बीज बेचनेवाले, बोये हुए खेतको जोतनेवाले
मर्यादाभेदकश्चापि विकृतं वधमाप्नुयात्।<br>सर्वसंकरपापिष्ठं हेमकारं नराधिप॥ १८४तथा खेतोंकी मेड़को तोड़नेवालेको विकृत मृत्युका दण्ड देना चाहिये। नराधिप! अच्छी धातुमें नकली धातु