मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९०६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विजिगीषोः परानेवमभियुक्तस्तथा परैः।<br>तथाभिचारशङ्कायां शत्रूणामभिनाHolder/शने॥ ४<br>भये महति सम्प्राप्ते अभया शान्तिरिष्यते।<br>राजयक्ष्माभिभूतस्य क्षतक्षीणस्य चाप्यथ॥ ५<br>सौम्या प्रशस्यते शान्तिर्यज्ञकामस्य चाप्यथ।<br>भूकम्पे च समुत्पन्ने प्राप्ते चान्नक्षये तथा॥ ६<br>अतिवृष्ट्यामनावृष्ट्यां शलभानां भयेषु च।<br>प्रमत्तेषु च चौरेषु वैष्णवी शान्तिरिष्यते॥ ७<br>पशूनां मारणे प्राप्ते नराणामपि दारुणे।<br>भूतेषु दृश्यमानेषु रौद्री शान्तिस्तथेष्यते॥ ८<br>वेदनाशे समुत्पन्ने जने जाते च नास्तिके।<br>अपूज्यपूजने जाते ब्राह्मी शान्तिस्तथेष्यते॥ ९<br>भविष्यत्यभिषेके च परचक्रभयेऽपि च।<br>स्वराष्ट्रभेदेऽरिवधे रौद्री शान्तिः प्रशस्यते॥ १० | हो, उस शत्रुओंपर विजय पानेके इच्छुक, शत्रुओंद्धारा आक्रान्त, आभिचारिक कर्मोंकी शङ्कासे युक्त, शत्रुओंको विनष्ट करनेके लिये उद्यत राजाके लिये महान् भय उपस्थित होनेपर अभया शान्ति कही गयी है। राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त, घावसे दुर्बल तथा यज्ञकी कामनावालेके लिये सौम्या शान्तिकी प्रशंसा की गयी है। भूकम्प आनेपर, अकाल पड़नेपर, अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं टिड्डियोंसे भय होनेपर, पागल और चोरसे भय उपस्थित होनेपर राजाको वैष्णवी शान्ति करानी चाहिये। पशुओं और मनुष्योंका भीषण संहार उपस्थित होनेपर तथा भूत-पिशाचादिके दिखायी देनेपर रौद्री शान्ति करानी चाहिये। वेदोंका विनाश उपस्थित होनेपर, लोगोंके नास्तिक हो जानेपर तथा अपूज्य लोगोंकी पूजा होनेपर, ब्राह्मी शान्ति करानी चाहिये। भावी अभिषेक, शत्रुसेनासे उत्पन्न भय, अपने राष्ट्रमें भेद तथा शत्रु-वधका अवसर प्राप्त होनेपर रौद्री शान्तिकी प्रशंसा की गयी है॥ २-१०॥ |
| त्र्यहातिरिक्ते पवने भक्ष्ये सर्वविगर्हिते।<br>वैकृते वातजे व्याधौ वायवी शान्तिरिष्यते॥ ११ | तीन दिनोंसे अधिक प्रबल वायुके चलनेपर, सभी भक्ष्य पदार्थोंके विकृत हो जानेपर तथा वातज व्याधिके बिगड़ जानेपर वायवी शान्ति करानी चाहिये। |
| अनावृष्टिभये जाते प्राप्ते विकृतिवर्षणे।<br>जलाशयविकारेषु वारुणी शान्तिरिष्यते॥ १२ | सूखा पड़ जानेका भय हो, वृष्टिसे अधिक हानि हो तथा जलाशयोंमें कोई विकार उत्पन्न हो गया हो तो ऐसे अवसरपर वारुणी शान्ति करानी चाहिये। |
| अभिशापभये प्राप्ते भार्गवी च तथैव च।<br>जाते प्रसववैकृत्ये प्राजापत्या महाभुज॥ १३ | महाबाहो! अभिशापका भय उपस्थित होनेपर, भार्गवी तथा स्त्रीके प्रसवमें विकार उत्पन्न होनेपर प्राजापत्या नामकी शान्ति करानी चाहिये। |
| उपस्कराणां वैकृत्ये त्वाष्ट्री पार्थिवनन्दन।<br>बालानां शान्तिकामस्य कौमारी च तथा नृप॥ १४ | पार्थिवनन्दन! गृह-सामग्रियोंमें विकार उत्पन्न होनेपर त्वाष्ट्री (विश्वकर्मासम्बन्धी) शान्ति करानी चाहिये। राजन्! बालकोंकी बाधा दूर करनेके लिये कौमारी शान्ति होनी चाहिये। |
| कुर्याच्छान्तिमथाग्नेयीं सम्प्राप्ते वह्निवैकृते।<br>आज्ञाभङ्गे तु संजाते तथा भृत्यादिसंक्षये॥ १५ | अग्नि-विकार उपस्थित होनेपर, आज्ञा-भङ्ग होनेपर तथा सेवकादिके विनाश होनेपर आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। |
| अश्वानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>अश्वानां कामयानस्य गान्धर्वी शान्तिरिष्यते॥ १६ | अश्वोंकी शान्ति-कामनासे उनमें रोग उत्पन्न होनेपर तथा अधिक संख्याकी अभिलाषासे गान्धर्वी शान्ति करानी चाहिये। |
| गजानां शान्तिकामस्य तद्विकारे समुत्थिते।<br>गजानां कामयानस्य शान्तिराङ्गिरसी भवेत्॥ १७ | हाथियोंकी शान्ति-कामनासे, उनमें रोग उपस्थित होनेपर तथा उनकी रक्षाकी भावनासे आङ्गिरसी शान्ति करानी चाहिये। |
| पिशाचादिभये जाते शान्तिर्वै नैर्ऋती स्मृता।<br>अपमृत्युभये जाते दुःस्वप्ने च तथा स्थिते॥ १८ | पिशाचादिका तथा अकालमृत्युका भय उपस्थित होनेपर और दुःस्वप्न देखनेपर नैर्ऋती शान्ति कही गयी है। |