भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 917
* अध्याय २२८ *९०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
याम्यां तु कारयेच्छान्तिं प्राप्ते तु नरके तथा।<br>धननाशे समुत्पन्ने कौबेरी शान्तिरिष्यते॥ १९<br>वृक्षाणां च तथार्थानां वैकृते समुपस्थिते।<br>भूतिकामस्तथा शान्तिं पार्थिवीं प्रतियोजयेत्॥ २०<br><br>प्रथमे दिनयामे च रात्रौ वा मनुजोत्तम।<br>हस्ते स्वातौ च चित्रायामादित्ये चाश्विने तथा॥ २१<br>अर्यम्णि सौम्यजातेषु वायव्यां त्वद्भुतेषु च।<br>द्वितीये दिनयामे तु रात्रौ च रविनन्दन॥ २२<br>पुष्याग्नेयविशाखासु पित्र्यासु भरणीषु च।<br>उत्पातेषु तथा भाग आग्नेयीं तेषु कारयेत्॥ २३<br>तृतीये दिनयामे च रात्रौ च रविनन्दन।<br>रोहिण्यां वैष्णवे ब्राह्मे वासवे वैश्वदेवते॥ २४<br>ज्येष्ठायां च तथा मैत्रे ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>ऐन्द्री तेषु प्रयोक्तव्या शान्ती रविकुलोद्भव॥ २५<br>चतुर्थे दिनयामे च रात्रौ वा रविनन्दन।<br>सार्पे पौष्णे तथाऽऽर्द्रायामहिर्बुध्न्ये च दारुणे॥ २६<br>मूले वरुणदैवत्ये ये भवन्त्यद्भुतास्तथा।<br>वारुणी तेषु कर्तव्या महाशान्तिर्महीक्षिता॥ २७<br>मित्रमण्डलवेलासु ये भवन्त्यद्भुताः क्वचित्।<br>तत्र शान्तिद्वयं कार्यं निमित्तेषु च नान्यथा।<br>निर्निमित्तकृता शान्तिर्निमित्तेनोपयुज्यते॥ २८<br>बाणप्रहारा न भवन्ति यद्वद्<br>राजन् नृणां सन्नहनैर्युतानाम्।<br>दैवोपघाता न भवन्ति तद्वद्<br>धर्मात्मनां शान्तिपरायणानाम्॥ २९मृत्युका भय होनेपर याम्या शान्ति कराये तथा धनका नाश उत्पन्न होनेपर कौबेरी शान्ति करानी चाहिये। ऐश्वर्यकामी मनुष्यको वृक्षों तथा सम्पत्तियोंका विनाश उपस्थित होनेपर पार्थिवी शान्तिका प्रयोग करना चाहिये॥ १९—२०॥<br><br>मानवश्रेष्ठ! दिनके या रात्रिके पहले पहरमें सूर्यके हस्त, स्वाती, चित्रा, पुनर्वसु या अश्विनी नक्षत्रमें जानेपर वायव्यकोणमें यदि अद्भुत उपद्रव दिखायी पड़े तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके अथवा रात्रिके दूसरे पहरमें सूर्यके पुष्य, भरणी, कृत्तिका, मघा और विशाखा नक्षत्रमें जानेपर आग्नेयकोण या दक्षिण दिशामें यदि कोई उत्पात दिखायी दे तो आग्नेयी शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिनके या रात्रिके तीसरे पहरमें रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर यदि ईशान, पूर्व या अग्निकोणमें कोई उत्पात दिखायी दे तो ऐन्द्री शान्ति करानी चाहिये। रविनन्दन! दिन या रात्रिके चौथे पहरमें आश्लेषा, रेवती, आर्द्रा, उत्तराभाद्र, शतभिषा या मूल नक्षत्रमें सूर्यके जानेपर पश्चिम दिशामें उत्पात दिखायी देनेपर राजाको वारुणी शान्ति करानी चाहिये। यदि मध्याह्नके समय कहींपर अद्भुत उत्पात होते हैं तो उस समय दोनों प्रकारकी शान्ति करानी चाहिये। इन उपर्युक्त कारणोंके उपस्थित होनेपर ही शान्ति करानी चाहिये, अन्यथा नहीं। बिना किसी कारणके की गयी शान्ति निष्फल हो जाती है। राजन्! जिस प्रकार कवचसे सुरक्षित शरीरवाले मनुष्योंको बाणोंका प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचाता, उसी प्रकार धर्मात्मा एवं शान्तिपरायण मनुष्योंको दैव-प्रहार किसी प्रकारकी हानि नहीं पहुँचा सकते॥ २१—२९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिर्नामाष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति नामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२८॥